प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगामी छह-सात जून को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ बांग्लादेश के दौरे पर होंगे। संभवतः मोदी-ममता की यह जोड़ी दोनों देशों के बीच संबंधों की संभावना का एक सर्वथा नया पन्ना खोलने की कोशिश करेगी। ऐसी एक संभावना तब भी बनी थी, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह 2011 में बांग्लादेश पहुंचे थे। लेकिन तब ममता बनर्जी ने उनके साथ बांग्लादेश जाने से इन्कार कर, सारी संभावनाओं पर पानी फेर दिया था। मगर इस बार आलम कुछ अलग है। मोदी और ममता, दोनों यह जान रहे हैं कि उनकी स्थानीय राजनीति की मांग है कि वे इस अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक पहल में साथ रहें। अगर मोदी-ममता का साथ बना रहा और भारत-बांग्लादेश के बीच संबंधों का नया पन्ना खुला, तो एशियाई राजनीति को नए सिरे से आकार देने का ऐतिहासिक अवसर भारत को मिलेगा।
नरेंद्र मोदी की अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की सबसे प्रीतिकर कोशिश मुझे वहां दिखाई देती है, जहां वह अपने एशियाई पड़ोसियों के साथ घरापा बनाने की पहल करते हैं! भूटान से शुरू करते हुए वह अब तक पाकिस्तान छोड़कर अपने सभी निकट पड़ोसी देशों में जा चुके हैं और सभी जगहों पर रिश्तों की नई संभावना जगाई है। हालांकि उन्हें कहीं कोई निश्चित सफलता मिली नहीं है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनय के अपने पहले वर्ष में उनका रिपोर्ट कार्ड बुरा भी नहीं है।
मोदी की बांग्लादेश यात्रा कई कारणों से महत्वपूर्ण हो गई है। दोनों देशों के बीच लंबे समय से अटके भू-सीमा समझौते (लैंड बाउंड्री एग्रीमेंट) पर हस्ताक्षर तो होंगे ही, कुछ अन्य मामले भी हैं, जिन पर बातचीत आगे बढ़ सकती है। लेकिन लंबित मामलों के निपटारे का सबसे बड़ा पेच यह है कि उसमें बांग्लादेश को नहीं, भारत को ही निर्णय लेना है कि वह क्या छोड़ने, क्या देने और किन बातों की तरफ से आंख फेर लेने को तैयार है। अगर सब कुछ ठीक चला, तो संभवत: इसी यात्रा में मोदी अपनी पहली स्थायी सफलता भी हासिल कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए भारत-बांग्लादेश मामलों के आला नौकरशाहों को मोदी के स्पष्ट निर्देशों की जरूरत होगी।
पिछले वर्षों में भारत सरकार ने अपने इन छोटे पड़ोसियों के बारे में एक ही नीति बना रखी थी-जितना मिले, उसमें खुश रहो : जितना न मिले, उस बारे में तुम जानो, तुम्हारी किस्मत जाने! इस अंधनीति का परिणाम यह हुआ कि बांग्लादेश हो या नेपाल या म्यांमार या श्रीलंका, सभी जगहों पर चीन ने पैठ बना ली। हमारे लिए यह समझना जरूरी है कि पड़ोस में किया गया हर निवेश क्या नकद वापस लाता है, इससे ज्यादा जरूरी है यह देखना कि वह भविष्य के कितने दरवाजे खोलता है। भारत-बांग्लादेश के बीच यदि लंबे समय से अटकी सड़क-संबंध संधि हो जाती है, तो बांग्लादेश-भूटान-भारत-नेपाल का चतुर्भुज असीम संभावनाओं के साथ खुलेगा और भारत को एशियाई महाद्वीप में एक बड़ी भूमिका निभाने का मौका मिलेगा। भारत ने काफी पहले सार्क मोटर गाड़ी सड़क संधि और सार्क रेलवे संधि का मसौदा सार्क देशों के सम्मुख पेश किया था, जिसे पाकिस्तान ने साकार नहीं होने दिया। इसलिए पाकिस्तान को अलग रखते हुए भारत ने 'मिनी सार्क' की रचना की है और इस यात्रा में उसकी संभावनाओं की जांच होगी।
बांग्लादेश-भारत सड़क संधि का एक नया मौका हमारे सामने है। भारत को इसे गंवाना नहीं चाहिए। यदि भारत की पहल से यह सड़क बन गई, तो दक्षिण-पूर्व एशिया का सारा सड़क-व्यापार बांग्लादेश की इसी सड़क से होने लगेगा और बांग्लादेश को वह अतिरिक्त आर्थिक आधार मिलेगा, जिसकी उसे बेहद जरूरत है। आज कोलकाता और अगरतला के बीच की हर व्यापारिक गतिविधि को 1,650 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। यह सड़क बन जाएगी, तो यह दूरी मात्र 350 किलोमीटर की होगी। न सिर्फ भारत के विभिन्न इलाकों में माल पहुंचाने में सहूलियत हो जाएगी, बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया तक माल पहुंचाना सरल हो जाएगा। इसका दूसरा फायदा यह होगा कि इस पूरे क्षेत्र की गतिविधियों पर भारत सीधी नजर रख सकेगा और उसे किसी हद तक नियंत्रित भी कर सकेगा। आतंकवादियों की घुसपैठ, तस्करी आदि पर नजर रखने के साथ-साथ पाकिस्तान और चीन को किसी हद तक इस चतुर्भुज से अलग-थलग करने में भी भारत कामयाब हो जाएगा और उनकी फौजी गतिविधियों की टोह भी ले सकेगा।
बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना हमारे प्रधानमंत्री मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में नहीं आई थीं, बल्कि अपना प्रतिनिधि भेजा था। इसके और जो भी कारण रहे हैं, एक बड़ा कारण यह भी हो सकता है कि नेपाल की तरह बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति की मांग है कि वहां के नेता भारत का पिछलग्गू नजर न आएं। पर कई मौकों पर शेख हसीना ने यह जताया है कि भारत उसका स्वाभाविक मित्र है। भारत की तरफ से इसका जवाब दिया जाना बाकी है। मोदी की एक जेब में इस सड़क-संधि की संभावना है, तो दूसरी जेब में तीस्ता नदी का पानी है।
हालांकि विदेश मंत्री ने साफ कर दिया है कि इस यात्रा में तीस्ता नदी के पानी के बंटवारे पर समझौता नहीं होने जा रहा है, लेकिन यह मामला पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश, दोनों के लिए बहुत नाजुक है। हमें तीस्ता नदी जल के बराबर-बराबर बंटवारे की मांग में ढील देनी चाहिए और 60:40 का फार्मूला स्वीकार करना चाहिए। बाढ़ के विनाश से हर वक्त जूझता बांग्लादेश पानी के सवाल पर भारत से सहायता मांग रहा है। भारत अपनी दिक्कतों का हल किन्हीं दूसरे स्रोतों से ढूंढकर अगर बांग्लादेश को यह सुविधा दे, तो वह एक तीर से कई शिकार करने की स्थिति में होगा। बड़ी राजनीति कभी छोटे लाभों पर टिकी नहीं रहती है। बड़े लाभ बड़ी राजनीति से ही मिलते हैं। शेख हसीना भारत के लिए जितनी अनुकूल हैं, भारत को उससे अधिक अनुकूल बनकर यह संधि पूरी करनी चाहिए।