हम पत्रकारों के लिए चुनावों का मौसम भारत दर्शन पर निकलने का मौसम होता है। सो पिछले सप्ताह सुबह-सबेरे उठकर मैं सड़क के रास्ते मथुरा की तरफ निकल पड़ी। मैंने मथुरा लोकसभा क्षेत्र चुना, क्योंकि हेमा मालिनी यहां से सांसद हैं। होली भी थी, तो सोचा कि इस प्राचीन नगर की होली इतनी रंगीन है कि मेरे इस चुनावी दौरे में थोड़ा रंग भी आ जाएगा। लेकिन मुझे अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि मथुरा तक मैं पहुंची ही नहीं, क्योंकि रास्ते में जिन गांवों में चुनाव के बारे में पूछने के लिए रुकी, उनका हाल देखकर होली के सारे रंग फीके पड़ गए।
इस क्षेत्र को मैं जानती हूं। मैं जन्माष्टमी मनाने वृंदावन गई हूं और बहुत बार मथुरा भी गई हूं। लेकिन पिछले कई वर्षों से इस तरफ जाना नहीं हुआ था, सो मुझे बिल्कुल जानकारी नहीं थी कि जहां कभी हरे-भरे खेत होते थे, वहां अब कचरे के खेत और गंदी, बेहाल बस्तियां हैं। मुझे मालूम नहीं था कि जिन छोटे मंदिरों और मस्जिदों को देखकर दिल खुश हो जाता था, वे भी छिप गए हैं गंदी बस्तियों के भीतर। बेहाल, गंदी बस्तियों का सिलसिला शुरू हुआ हरियाणा के पलवल शहर से। इस शहर के बीच से नया हाइवे निकल रहा है, सो एक मलबे भरे नाले ने उसको जैसे दो हिस्सों में बांट दिया है। उसके आसपास जहां तक नजर जाती है, कूड़े के ढेर दिखते हैं। इन ढेरों के बीच दिखते हैं रेस्टोरेंट, जिम और दुकानें।
इस किस्म के दृश्य मथुरा जनपद के हर कस्बे में दिखे और हाइवे से उतर कर मैं जब गांवों में गई, तो ऐसा लगा कि मैं नर्क में पहुंच गई हूं। कूड़े के इन विशाल खेतों को देखकर बहुत बुरा लगा, क्योंकि मुझे याद आया कि हेमा जी रोज टेलीविजन पर ‘केंट का शुद्ध पानी’ का प्रचार करती हुई दिखती हैं। क्या अपने कभी अपने चुनाव क्षेत्र का पानी पिया है, हेमा जी? क्या आपने उन गांवों का कभी दौरा किया है, जिनमें आपके मतदाता गंदी नालियों के कीड़ों की तरह जीवन व्यतीत करते हैं? क्या आपने प्रधानमंत्री मोदी के स्वच्छ भारत अभियान के बारे में कभी सुना भी है?
मैं पहले भी कह चुकी हूं, लेकिन यह ऐसी बात है, जिसको बार-बार दोहराया जाए, तो भी काफी नहीं : नरेंद्र मोदी ने लाल किले से स्वच्छता की बात करके इस देश पर सबसे बड़ा उपकार किया है। महात्मा गांधी के बाद वह पहले नेता हैं, जिन्होंने देश की गंदगी और गंदी आदतों की तरफ ध्यान दिलाया है। स्वच्छ भारत मोदी के इस कार्यकाल का सबसे सफल कार्यक्रम रहा है। ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं कि खुले में शौच करने की बुरी आदत पूरे देश में लगभग बंद हो गई है, बल्कि इसलिए भी कि जहां बंद नहीं हुई है, वहां कम से कम इतना हुआ है कि इस आदत से गंदगी और बीमारियां फैलने के बारे में लोग अच्छी तरह समझ गए हैं।
लेकिन ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी के अपने ही साथी इस योजना को विफल करने में लगे हुए हैं। मोदी जी, आपके सांसद और विधायक नहीं समझ पाए हैं कि आपको यह योजना कितनी प्रिय है। वे समझे होते, तो कम से कम इतना तो कर दिखाते कि अपने चुनाव क्षेत्रों में नगरपालिकाओं और पंचायतों को सावधान करते कि स्वच्छता के मामले में जरा भी कोताही न बरतें। शिवराज सिंह चौहान अगर इंदौर और भोपाल जैसे शहरों को साफ कर सकते हैं, तो पूरा देश भी साफ हो सकता है। सो उम्मीद है मोदी जी कि अगर आप दोबारा बनते हैं देश के प्रधानमंत्री, तो अपने सांसदों और विधायकों को स्वच्छता अभियान में जोड़ेंगे। भारत माता का बहुत बुरा हाल है।