आज 23 मार्च का दिन 20 वीं सदी के भारत की तीन यादगार घटनाओं के संगम का दिन है। इतिहास का संयोग देखिए कि आगामी चुनाव के संदर्भ में यह तीनों प्रतीक एक ही दिशा में संकेत करते हैं। इसलिए आज देश भर में सैकड़ों स्थानों पर 'देश मेरा, वोट मेरा, मुद्दा मेरा' के बैनर तले अनेक तरह के कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है।
आज के दिन वर्ष 1931 में शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को लाहौर जेल में फांसी दी गई थी। इसी दिन वर्ष 1910 में देशज समाजवाद के प्रणेता राम मनोहर लोहिया का जन्म हुआ था। संयोग से इसी दिन सन 1977 में इमरजेंसी की औपचारिक समाप्ति हुई थी और देश में लोकतंत्र की बहाली हुई थी। लेकिन वक्त की धूल जमने से यह तीनों प्रतीक महज शो-पीस बनते जा रहे हैं, जिन्हें सत्ता अपने ड्रॉइंग रूम में सजा कर रख सकती है। ऐसे पवित्र प्रतीकों को बचाए रखने का यही उपाय है कि इन्हें आज के संदर्भ में पुनः परिभाषित किया जाए।
देश में अधिकांश लोग 23 मार्च को शहीद दिवस के रूप में जानते हैं और भगत सिंह से जोड़कर देखते हैं। दुर्भाग्यवश भगत सिंह का संदेश उनकी तस्वीर और मूर्तियों पर पड़ी फूल मालाओं के बोझ तले दब गया है। भगत सिंह हिंसक क्रांति के पुजारी नहीं थे। वह अंग्रेजों के राज ही नहीं, पूंजीवादी व्यवस्था के शोषण को उखाड़ फेंकने के लिए व्यवस्था परिवर्तन की राजनीति में विश्वास करते थे। हर विचार की निर्मम आलोचना और आजाद सोच के हिमायती भगत सिंह के लिए आजादी का मतलब था, एक ऐसे समाज की रचना करना जिसमें मजदूर और किसान का शोषण बंद हो। आज के संदर्भ में भगत सिंह की शहादत को याद करने का मतलब है शहीदों का नाम ही नहीं, उनका संदेश भी याद रखना। शहीदों के नाम पर वोट मांगने के इस दौर में यह याद रखना जरूरी है कि शहीदों का सपना तभी पूरा होगा, जब देश में नौजवान, मजदूर और किसान के मुद्दों को सबसे आगे रखा जाए।
राम मनोहर लोहिया की याद को अक्सर गैर कांग्रेसवाद की छतरी से ढक दिया जाता है। इस बहाने नीतीश कुमार जैसे उनके नामलेवा भाजपा के साथ अपने गठबंधन को जायज ठहराते हैं। दरअसल आज के संदर्भ में राम मनोहर लोहिया की असली विरासत है सत्ता के अहंकार और अन्याय के विरुद्ध सतत संघर्ष। 'जिंदा कौमें पांच साल तक इंतजार नहीं करतीं' का नारा हमें इसी जज्बे की याद दिलाता है। लोहिया के समय सत्ता के जिस अहंकार और अन्याय का प्रतीक कांग्रेस थी आज भारतीय जनता पार्टी उसका प्रतीक है। अगर राममनोहर लोहिया आज हमारे बीच होते, तो आज की सत्ता के झूठ और पाखंड का पर्दाफाश करते हुए शायद गैर भाजपा गठबंधन या वैकल्पिक राजनीति की कोशिश कर रहे होते।
इसी तरह से इमरजेंसी के विरुद्ध संघर्ष की स्मृति को केवल इंदिरा गांधी और कांग्रेस विरोध तक सीमित करने का प्रयास हो रहा है। विडंबना यह है कि देश में एक बार फिर लोकतंत्र को संकट में धकेलने वाली सरकार इमरजेंसी विरोध का ढिंढोरा पीटती है। आज देश में मीडिया की दुरावस्था किसी से छुपी नहीं है। सच बताने के बजाय मीडिया आज सच छिपाने का तंत्र बन गया है। पिछले पांच साल में सुप्रीम कोर्ट से लेकर चुनाव आयोग तक हर स्वायत्त संस्था कमजोर हुई है। इस संदर्भ में 23 मार्च हमें याद दिलाती है कि हमें घोषित ही नहीं आज की 'अघोषित इमरजेंसी' का भी विरोध करना होगा। मार्च 1977 का ऐतिहासिक चुनाव हमें भरोसा दिलाता है कि लोकतंत्र में जनता अहंकारी और तानाशाह नेताओं को सबक सिखा सकती है।
23 मार्च के तीनों सबक को जोड़ें, तो यह सीख मिलती है कि चुनाव को लोकतंत्र के संकट का मुकाबला करने का औजार बनाया जा सकता है, बिगड़ैल सत्ता को काबू में लाया जा सकता है, बशर्ते हम संघर्ष की धाराओं को जोड़ें और शहीदों के सपनों और उनके मुद्दों को सामने रखें।
इस सबक को 2019 के चुनाव से जोड़ने की जरूरत है। आज फिर देश में शहीदों के नाम पर राजनीति चल रही है। पुलवामा में शहीद हुए सीआरपीएफ के जवानों के बलिदान पर, बालाकोट में वायुसेना की स्ट्राइक के दम पर वोट मांगने का खेल चल रहा है। इसलिए इस शहीद दिवस पर हम मिल कर कहें : शहीदों के नाम पर वोट मांगना बंद करो। इस चुनाव के दौरान न तो कोई पार्टी या नेता हमारी सेना की बहादुरी का श्रेय ले, न ही कोई पार्टी राष्ट्रीय सुरक्षा के सवाल पर आलोचना करे। जो इस सवाल पर भी राजनीति करने से बाज नहीं आते वे राष्ट्रीय सुरक्षा नहीं, कुर्सी की सुरक्षा की लड़ाई लड़ रहे हैं।
आज चुनाव के मुद्दे को शहीदों के सपनों से जोड़ना है। जब कोई हमारा वोट मांगने आए, तो उससे पूछना है कि आपने क्या किया, आप आगे क्या करोगे? जो सरकार में हैं, उनसे पूछना है कि पिछले पांच साल में क्या किया उसका हिसाब दो। जो विपक्ष में उनसे पूछना है कि अगले पांच साल क्या करोगे उसका भरोसा दो। पूछना है उनसे किसान कि हालत पर, मजदूर के शोषण के बारे में, बेरोजगारी के बारे में, भ्रष्टाचार के बारे में। पूछना है बिजली-सड़क-पानी के बारे में, पूछना है स्कूल, अस्पताल और राशन दुकान के बारे में। जो शहीद जवानों की तस्वीर दिखा कर और उनके शौर्य का सेहरा अपने सिर बांधकर वोट मांगे उससे पूछना है : युद्ध लड़ रहे हो या चुनाव लड़ रहे हो? या कि युद्ध की आड़ में चुनाव लड़ रहे हो? शहीदों की अर्थी और जवानों के खून की ओट में वोट मांगना देशभक्ति नहीं, देशद्रोह है। इस चुनाव का अपहरण करने की कोशिश को विफल करने के लिए देश को खड़ा होकर कहना है : देश मेरा, वोट मेरा, मुद्दा मेरा। इस नारे के साथ आज देश भर के जन आंदोलन सैकड़ों कार्यक्रमों का आयोजन कर रहे हैं। इस कार्यक्रम का उद्देश्य है कि चुनाव को पटरी से उतारने की कोशिश का मुकाबला किया जाए और इस चुनाव को वापस जनता के असली मुद्दों पर लाया जाए। लोकतंत्र के पर्व को अंतिम व्यक्ति के मुद्दों से जोड़ना ही 23 मार्च की विरासत के साथ न्याय है।
-लेखक, स्वराज इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं