बारहवीं कक्षा में हिंदी के मास्साब ने लेख लिखने के कुछ नुस्खे बताए थे। उन्होंने कई ऐसे वाक्य रटवा दिए थे, जिनसे कोई भी लेख आरंभ हो सकता था। कुछ वाक्य तो ऐसे थे, जिनकी बैसाखी लगाकर कई लेख चल पड़ते थे। जैसे, मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है वाले वाक्य से अनेकों विषयों की शुरुआत हो सकती थी।
किसी समस्या पर लेख आरंभ करने के लिए भारत एक कृषि प्रधान देश है-मौजूं वाक्य था। अब पंजाब में फसल काटने के बाद बैसाखी के त्योहार में भांगड़ा होता है। कृषिप्रधान होने का जिक्र करके लोकनृत्य, लोकसंगीत-जिस पर जी चाहे, लेख लिख डालिए। जश्न होगा, तो दारू भी पी जाएगी। लीजिए, मद्यपान के दुष्परिणाम पर लेख लिखने का मसाला भी मिल गया। फसल नष्ट हुई और किसानों ने आत्महत्याएं कीं, तो आत्महत्या पर लिखते हुए-भारत एक कृषिप्रधान देश है, से लेख का आरंभ हो सकता था।
पर बोर्ड परीक्षा की तैयारी करते एक लड़के को मैंने भारत एक कृषिप्रधान देश है का फॉर्मूला सुझाया, तो उसने पूछा, जमीन अधिग्रहण कानून के चलते भारत कृषिप्रधान देश रह पाएगा क्या? मैंने कहा, अगर अधिगृहीत जमीन पर नए उद्योग लगेंगे, तो भारत एक उद्योगप्रधान देश है से लेख की शुरुआत हो सकेगी।
बच्चा बोला, विरोधी दलों के दबाव और अन्ना के आंदोलन के कारण देश में इसका विरोध होगा, तो उद्योगों के लिए जमीन नहीं मिलेगी। मैंने कहा, फिर देश कृषिप्रधान बना रहेगा। वह बोला, किसान तो खेती से पीछा छुड़ाना चाहते हैं। ऐसे में देश न कृषिप्रधान रहेगा, न उद्योगप्रधान।
मैंने कहा, वैसे में बच्चे बेरोजगारी पर लेख लिखेंगे। वह बोला, सड़कों पर कारों का हुजूम देखिए। क्या आपको बेकारी दिखती है?
मैंने कहा, छोड़ो, तुम्हें लेख लिखना सिखाना मेरे बस की बात नहीं।
वह बोला, वैसे भी यह लेख लिखने का जमाना नहीं अंकल। फिर पुराने नुस्खों को क्यों याद करना!