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तेल कंपनियों का विलय काफी नहीं

बी. के. चतुर्वेदी
Updated Mon, 24 Jul 2017 06:09 PM IST
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ओएनजीसी
कुछ दिनों पहले सरकार ने घोषणा की कि उसने हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) के साथ तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम लि. (ओएनजीसी) के विलय का फैसला किया है। वर्ष 2017-18 का बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री ने सार्वजनिक क्षेत्र में एक विशाल तेल कंपनी के विकास की नीतिगत मंशा जताई थी, जो निजी क्षेत्र के अंतरराष्ट्रीय और घरेलू तेल कंपनियों के प्रदर्शन की बराबरी करने में सक्षम होगी। समेकन, विलय और अधिग्रहण के जरिये केंद्रीय लोक उद्यमों के लिए नए अवसरों का सृजन उनके फैसले के औचित्य का आधार था। ताजा फैसला उसी नीति के तहत लिया गया है।


इस फैसले को एक निश्चित परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कुछ बड़ी तेल कंपनियां चीन की हैं। चीन की तीन बड़ी कंपनियों-सीएनपीसी, सिनोपेक और पेट्रो चाइना-का टर्नओवर करीब 400 अरब डॉलर है। शेल, सऊदी अराम्को और टोटल जैसी कुछ अन्य बड़ी तेल कंपनियों का टर्नओवर भी 300 अरब डॉलर से 400 अरब डॉलर है। ओएनजीसी एक लाभप्रद कंपनी है, पर इसका वार्षिक राजस्व प्रवाह पंद्रह से बीस अरब डॉलर ही है। यदि इसे एचपीसीएल के साथ एकीकृत किया जाता है, तो कुल टर्नओवर बढ़कर सालाना 50 अरब डॉलर होगा। दुनिया की बड़ी तेल कंपनियों से बराबरी करने के लिए उसे आगे भी एकीकरण करना होगा और पाइपलाइनों के विकास, गैस वितरण नेटवर्क को विदेशों में तेल एवं गैस परिसंपत्ति अधिगृहीत करने और अनुसंधान के लिए निवेश करना होगा।


इस फैसले को लागू करने के लिए कई तरह की चुनौतियों का सामना करना होगा। सबसे पहले, ऐसे प्रयासों के पिछले अनुभवों पर विचार करने के बाद नई कंपनी की संरचना का विकास करना विवेकपूर्ण होगा। बीती सदी के अस्सी के दशक में एसटीसी, एमएमटीसी और पीईसी की होल्डिंग कंपनी का प्रस्ताव सफल नहीं हुआ और अंत में इसे छोड़ देना पड़ा। हाल ही में इंडियन एयरलाइंस और एयर इंडिया का विलय कर एयर इंडिया जैसी बड़ी कंपनी बनाने का फैसला भी सुखद नहीं रहा है। कर्मचारियों से संबंधित कई बड़ी समस्याएं हैं, नई कंपनी वित्तीय रूप से कमजोर है और शेयरधारकों को इससे कोई फायदा नहीं हो रहा है। कंपनी को बचाने के लिए केंद्र सरकार को 20,000 करोड़ रुपये से ज्यादा देना पड़ा। खबरों के मुताबिक, विलय के बाद भी एचपीसीएल एक स्वतंत्र कंपनी होगी और ओएनजीसी की सहायक कंपनी बनकर रहेगी। शुरुआत के लिए यह एक अच्छा मॉडल प्रतीत होता है। पर मूल्य शृंखला का पूरा फायदा उठाने के लिए बाद में कुछ बदलाव की जरूरत होगी।


दूसरा, विलय के स्वरूप को तैयार करते वक्त इसके उद्देश्यों को भी ध्यान में रखना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण सवाल है-अधिग्रहण के लिए ओएनजीसी पूंजी कहां से लाएगी? खबरों के मुताबिक, ओएनजीसी सरकार के बहुसंख्यक शेयरों को खरीदकर एचपीसीएल का अधिग्रहण करेगी। एचपीसीएल के अधिग्रहण के लिए ओएनजीसी को चार से पांच अरब डॉलर की जरूरत होगी। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, ओएनजीसी के पास कुल नकद और निवेश संसाधनों का भंडार तीस से चालीस हजार करोड़ रुपये का है। यदि इसका उपयोग एचपीसीएल के शेयर खरीदने में किया जाएगा, तो ओएनजीसी वित्तीय रूप से कमजोर हो जाएगा और उसके पास नई कंपनी विकसित करने, अनुसंधान में निवेश करने, तेल एवं गैस प्राप्त करने और उपक्रम का विस्तार करने के लिए पैसे नहीं बचेंगे। यह ओएनजीसी के लिए विनाशकारी होगा और उसकी क्षमता घट जाएगी।


इस तरह अधिग्रहण से केवल एक उद्देश्य पूरा हो सकता है-ओएनजीसी के सभी भंडार सरकार को सौंप देना। इससे सरकार के बजटीय संसाधन मजबूत हो सकते हैं या उसके विनिवेश का लक्ष्य पूरा हो सकता है, पर ओएनजीसी और नई कंपनी के लिए यह बुरा होगा। वित्तीय संसाधनों और निवेश की क्षमता के अभाव में नई कंपनी नई गतिविधियों में निवेश नहीं कर पाएगी और वैश्विक स्तर की बड़ी तेल कंपनी नहीं बन पाएगी। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक, ओएनजीसी के पास इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन के शेयर बेचने और संसाधन बढ़ाने का एक अन्य विकल्प है। वह बाजार से भी पैसे उधार ले सकता है। लेकिन ये दोनों तरीके भी नई कंपनी को वित्तीय रूप से मजबूत नहीं बना सकते हैं, जब तक कि निवेश और विस्तार नहीं होता है। संसाधनों को हस्तांतरित करने के बजाय सरकार द्वारा एचपीसीएल के शेयरों के बदले ओएनजीसी के शेयरों को पाना एक बेहतर तरीका होगा। इसके लिए एचपीसीएल के निजी निवेशकों को यही प्रस्ताव देना जरूरी है। इसके लिए सेबी से मंजूरी की भी आवश्यकता होगी। जाहिर है, सरकार को इस सौदे से सीधे कोई पैसा नहीं मिलेगा। यह बेहद कठिन प्रक्रिया है, पर यह ओएनजीसी को बड़ी वैश्विक तेल कंपनी बनाने और कंपनी विस्तार के लिए इस्तेमाल होने वाले उसके भंडार को सुरक्षित रखने समर्थ बनाएगी।


तीसरा, ओपेक और अन्य तेल उत्पादकों के कच्चे तेल के मूल्यों में भारी भिन्नता है, जो राजस्व बढ़ाने के लिए तेल उत्पादन को व्यवस्थित करने की कोशिश कर रहे हैं। सरकार की कराधान नीति को ऐसी अस्थिरता से उत्पन्न कठिनाइयों को पहचानना होगा। तेल क्षेत्र पर अभी भारी कर लगता है और यह सरकार के राजस्व का सबसे बड़ा स्रोत है। मध्यम तेल कीमतों के इस युग में आमतौर पर नई कंपनी को बचत हो सकती है। ऐसे में इस कंपनी से अतिरिक्त कर पाने का सरकार को मौका मिल सकता है। पर यह इस क्षेत्र को कमजोर करेगा और इसके विस्तार और निवेश की क्षमता को घटाएगा। सरकार को ऐसे दृष्टिकोण पर अंकुश लगाने की जरूरत है। हमें यह समझने की जरूरत है कि व्यापक निवेश के बाद ही दुनिया की बड़ी तेल कंपनियां मौजूदा स्थिति में पहुंची हैं। अगर ओएनजीसी को विश्व की बड़ी तेल कंपनियों के समकक्ष बनाना है, तो उसे वित्तीय रूप से मजबूत बनाने की जरूरत है। 
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