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यदा-कदा हिंदी की डफली

Sun, 14 Sep 2014 06:56 PM IST
सुरजीत सिंह
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तन पर खादी का कुर्ता-पायजामा, पांवों में साधारण-सी चप्पल, माथे पर गोरोचन तिलक, बढ़ी हुई दाढ़ी, मोटे से फ्रेम का चश्मा, कंधे पर जूट का झोला और चाल में संस्कार लिए वह सुबह-सुबह दरवाजे पर नमूदार हुए। मैं दातुन कर रहा था, उन्हें बहुरुपिया समझ कौतूहल से निहारने लगा। मुग्ध हो चुकने के बाद पहले इस लुप्त होती कला पर संवेदना प्रकट की, फिर उसे बचाए रखने के उनके प्रयास की सराहना।
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प्रत्युत्तर में उन्होंने पुराने जमाने के मास्टर की तरह गर्दन को नीचे कर चश्मे को नाक पर गिरने दिया और मुझे घूरा। उनके घूरने का अंदाज मुझे हमारे गुरुजी जैसा लगा, लगे हाथ इस पर भी मैंने दाद ठोकी।

उनसे ज्यादा देर बर्दाश्त नहीं हुआ। चश्मा उतारते हुए वह बोला, नहीं पहचाना, मैं चंपक लाल हूं, हिंदी लेखक, आपका दोस्त! मैं उन्हें ऊपर से नीचे तक घूरता रहा, फिर बोला, मगर आपने यह क्या हुलिया बना रखा है?
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इसे हुलिया नहीं कहते दोस्त, अपनी मां हिंदी को पहचानें, आज मैं हिंदीमय हूं।

मुझे थोड़ा अचरज हुआ, क्योंकि मैं जानता हूं कि उनके बच्चे अंग्रेजी मीडियम में पढ़, सॉफ्टवेयर इंजीनियर बन अमेरिका निकल लिए हैं, और वह इधर यदा-कदा हिंदी की डफली बजा लेते हैं।

मैंने कहा, देखिए, इसे स्वांग कहते हैं और धरने वाले को भांड़। वैसे भी हिंदी ऐसी मां है, जिसके बच्चे अंग्रेजी मीडियम में पढ़ते हैं। माना कि इस समय मार्केट में हिंदी का थोड़ा-बहुत उठाव आया हुआ है, हिंदी पखवाड़ा चल रहा है, पत्र-पत्रिकाओं में थोड़ा बहुत हिंदी को बहलाया जा रहा है, कुछ लेखक, साहित्यकारों को स्मरण किया जा रहा है। लेकिन इससे हिंदी का क्या भला होगा, जब तक कि हम हिंदी में ही जीना शुरू नहीं करते।

वह कुछ और बोलते, इससे पहले ही कुछ लोग उन्हें ढूंढते हुए आए और शाम को हिंदी गोष्ठी का निमंत्रण पत्र थमा चले गए। मुझे लगा, जैसे हिंदी का पितृपक्ष चल रहा है और लोग कौओं को ढूंढ रहे हैं।
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