गोपाल्लव नामक सेठ हर समय धनार्जन में जुटा रहता था। जैसे-जैसे उसकी संपत्ति बढ़ती गई, धन कमाने की उसकी लालसा भी बढ़ती गई। परोपकार और धार्मिक कार्यों पर धन खर्च करने में वह विश्वास नहीं रखता था। भोग-विलास ने गोपाल्लव को अनेक बीमारियों से ग्रस्त कर दिया।
असाध्य रोग से ग्रस्त होने पर वह सोचने लगा कि उसने कभी अच्छा कर्म नहीं किया, पूजा-उपासना नहीं की। अंतिम समय में इस धन का क्या होगा? सेठ इसी चिंता में डूबा हुआ था कि अचानक भगवत भजन सुनाई पड़ा। भजन में कहा गया था कि मरते समय न परिजन साथ जाते हैं और न धन-संपत्ति। केवल भक्ति और सत्कर्म ही कल्याण करते हैं।
सेठ ने सेवक से कहा, बाहर बैठकर भजन गाने वाले को अंदर बुलाना। सेवक ने कहा, वह कोई संगीतकार नहीं, बल्कि जूते गांठने वाला है। वह मस्ती में भगवान की प्रशस्ति के गीत गाता है। सेठ ने उसे अंदर बुलवाया और स्वर्ण मुद्राएं देते हुए कहा, तुम्हारे भजन ने मुझे शांति प्रदान की है। कल फिर आकर गीत सुनाना। इनाम दूंगा।
तीन दिन बाद वह आदमी सेठ के पास आया और उसे स्वर्ण मुद्राएं वापस लौटाते हुए बोला, इन स्वर्ण मुद्राओं की चिंता में मैं भजन से विमुख हो गया। संपत्ति और धन के रहते अनूठा आनंद मिलना असंभव है।
इन शब्दों ने सेठ गोपाल्लव का विवेक जगा दिया। उसने अपनी संपत्ति गरीबों में दान कर दी और भगवान की भक्ति में लग गया। उसका शरीर भी निरोग हो गया।