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अकेले रिजर्व बैंक क्या करेगा

Thu, 22 Aug 2013 02:00 AM IST
बादल मुखर्जी
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सही प्रबंधन हो तो रुपये की कीमत में गिरावट कोई समस्या नहीं है। दक्षिण कोरिया की मुद्रा वॉन को देखा जा सकता है, इसमें लगातार गिरावट हुई, लेकिन निर्यात बढ़ने की वजह से वहां की अर्थव्यवस्था को फायदा मिला। यही बात जापान के बारे में कही जा सकती है, जहां येन की कीमत में गिरावट हुई, तो उसने अपना निर्यात बढ़ाकर दुनिया भर के बाजार पर कब्जा जमा लिया। अमेरिका लंबे समय से यह शिकायत करता रहा है कि निर्यात को बढ़ावा देने के लिए चीन अपनी मुद्रा युआन के मूल्य में अवमूल्यन करता है।
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हमारे यहां की दिक्कत अलग तरह की है। हमारा प्रबंधन बहुत खराब है। हमारा निर्यात नहीं, बल्कि आयात बढ़ रहा है। इस आयात में सबसे बड़ा हिस्सा पेट्रोलियम उत्पादों का है। पर यह स्थिति केवल हमारे साथ ही नहीं है। जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश भी पेट्रोलियम उत्पादों का आयात करते हैं, लेकिन वह अन्य उत्पादों का जबर्दस्त निर्यात करके संतुलन बना लेते हैं। इस संतुलन को बनाने के लिए निर्यात बढ़ाने के अलावा दूसरा रास्ता प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का है। इस मामले में भी हम विफल साबित हो रहे हैं।

दरअसल, भ्रष्टाचार और लूट-खसोट के हमारे तंत्र को देखते हुए विदेशी निवेशकों का भरोसा डगमगा गया है। कोई भी निवेशक पैसा लगाने से पहले दुनिया भर में सर्वेक्षण करता है। चूंकि उसके निवेश का प्रतिफल चार-पांच साल बाद मिलता है, इसलिए उसकी पहली प्राथमिकता सुरक्षित निवेश की होती है। विदेशी निवेशक अभी भारत को सुरक्षित निवेश की जगह नहीं मान रहे हैं।
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पिछले कुछ वर्षों से हमारे यहां रोजाना भ्रष्टाचार के नए मामले सामने आ रहे हैं। और गोलमाल की रकम के आंकड़े कुछ ऐसे हैं कि सिर चकरा जाए। ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच की हालत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि संबंधित फाइलें ही गायब हो जाती हैं। वहीं, बात जब राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार के कानून के तहत लाने की होती है, तो सभी दल एकजुट हो जाते हैं। इससे बचने के लिए वे किसी भी कानून को बदल डालने के लिए तैयार हो जाते हैं। लेकिन ऐसी एकजुटता और इच्छाशक्ति भ्रष्टाचार से लड़ने के मामले में नहीं दिखती।

इन सबसे पूरी दुनिया के सामने हमारी छवि का बंटाधार हो चुका है। पर कुर्सी पर बैठे लोगों को शायद कोई फिक्र नहीं है। राजनीति और अर्थव्यवस्था को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता, यह बात दुनिया मान चुकी है, लेकिन हमारे राजनेता इसे स्वीकार करने के लिए कतई तैयार नहीं दिखते। अगर हमारे देश का आम आदमी इन हकीकतों से रूबरू है, तो क्या विदेशी निवेशकों को यह सब पता नहीं है? उन्हें इस तंत्र का बेहतर ज्ञान है और इसीलिए वे यहां जोखिम नहीं लेना चाहते। अगर प्रत्यक्ष विदेशी निवेशकों का यहां पैसा लगता, तो अर्थव्यवस्था में डॉलर की आपूर्ति बढ़ जाती और विनिमय दर में अपने आप संतुलन आ जाता।

लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। सत्ता में बैठे लोग यह कहकर अपनी पीठ थपथपा सकते हैं कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने कई उपाय किए हैं। कई नियमों में ढील दी है। पर जब तक निवेशकों का भरोसा नहीं जमेगा, तब तक ऐसे उपायों का कोई फायदा नहीं है। उदाहरण के लिए पश्चिम बंगाल को ही लीजिए। वहां सत्ता बदली, पर अराजकता का माहौल नहीं बदला। हाल ही में तृणमूल कांग्रेस को पंचायत चुनावों में भी भारी सफलता मिली। पर इन चुनावों के दौरान सूबे में हुई भारी हिंसा से हर कोई वाकिफ है। अब ममता बनर्जी कारोबारियों के साथ बैठक करके राज्य में निवेश की अपील कर रही हैं। बड़ा सवाल यह है कि ऐसे अराजक माहौल में वहां कौन निवेश करना चाहेगा। खासकर तब, जबकि निवेशकों के सामने गुजरात, पंजाब और आंध्र प्रदेश जैसे विकल्प मौजूद हैं।

एक बात और, आर्थिक नीतियों के संचालन के दो मुख्य स्तंभ हैं, मौद्रिक नीति और राजकोषीय नीति। मौद्रिक नीति का जिम्मा भारतीय रिजर्व बैंक पर है, लेकिन यह संस्था स्वायत्त होकर काम कर पा रही है, इस पर संदेह है। रही बात राजकोषीय नीति की, तो वह शून्य है। तमाम लोकलुभावनी नीतियों के कारण सरकारी खजाने पर लगातार बोझ बढ़ता जा रहा है, लेकिन आय की संभावनाएं बहुत सीमित है। देश में गरीबी और बेरोजगारी को देखते हुए शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकारी खर्च की भूमिका को नजरंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन असली जरूरत कागज पर अच्छी लगने वाली योजनाओं के वास्तविक क्रियान्वयन की है।

उदाहरण के लिए हमारे वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने पिछले साल राजकोषीय समेकन का एक खाका पेश किया था, जिसमें राजकोषीय घाटे को 2016-2017 तक कम करके तीन फीसदी पर लाने की बात कही गई थी। इस खाके से लोगों को कुछ समय के लिए उम्मीद तो बंधाई जा सकती है, लेकिन अगर वित्तीय अनुशासन के लिए गंभीरता से कदम न उठाए जाएं, तो यह सिर्फ ख्याली पुलाव बनकर रह जाता है।

अब हमें इस सच्चाई को स्वीकार कर लेना चाहिए कि केवल मौद्रिक नीतियों के भरोसे महंगाई, निवेश में कमी जैसी समस्याओं का समाधान नहीं किया जा सकता। मौद्रिक नीतियों के तहत अगर आरबीआई ब्याज दरों में कटौती भी कर दे और बैंक सस्ते दर पर कर्ज देने के लिए तैयार भी हो जाएं, तो कर्ज लेने वाले हैं कहां? कुछ लोग कह रहे हैं कि सरकार कोई कदम नहीं उठा रही है, लेकिन मेरा मानना है कि वह गलत कदम उठा रही है। मुश्किल यह है कि वह अपनी एक गलती को ढकने के लिए दूसरी गलतियां करती जा रही है।
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