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अफगानिस्तान में बेबस ओबामा

Mon, 09 Jan 2017 07:33 PM IST
मार्क लेंडलर
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अफगानिस्तान में ओबामा
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अमेरिका के निवर्तमान राष्ट्रपति बराक ओबामा के सलाहकार 2015 की गर्मियों में एक कठिन समस्या से जूझ रहे थे। वह समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर अमेरिकी फौज की वापसी के ओबामा के दीर्घकालीन लक्ष्य को पूरा करते हुए उनके ह्वाइट हाउस छोड़ने से पहले अफगानिस्तान की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए? उसी वर्ष अगस्त में ओबामा ने राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक बुलाई और नई चुनौतियों को स्वीकार किया।
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उस बैठक में मौजूद रहे एक अधिकारी के मुताबिक ओबामा ने कहा, हम अधिक दिनों तक राष्ट्रनिर्माण (अफगानिस्तान में) के प्रयास को जारी नहीं रख सकेंगे। उनके कहने का आशय यह था कि उस कक्ष में मौजूद किसी को भी यह नहीं लग रहा है कि 14 साल के युद्ध और अरबों डॉलर खर्च करने और दो हजार अमेरिकियों की मौत के बावजूद अमेरिका कभी अफगानिस्तान को ऐसे लोकतंत्र में परिवर्तित कर पाएगा, जो अपनी रक्षा खुद कर सके। 2008 के अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव के इस युद्ध-विरोधी उम्मीदवार ने, जिसने अफगानिस्तान को बदल देने की शपथ ली थी- यह एक तरह से जॉर्ज बुश के इराक के बैड वॉर (खराब युद्ध) के जवाब में गुड वॉर (अच्छा युद्ध) जैसी बात थी- स्वीकार किया कि अमेरिकी इतिहास का सबसे बड़ा ऑपरेशन उसके कार्यकाल में खत्म नहीं हो सकेगा। जुलाई, 2008 में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार के रूप में ओबामा ने स्पष्ट कर दिया था कि अफगानिस्तान उनकी प्राथमिकता में इराक से ऊपर है। उन्होंने एलान किया, 'यह ऐसा युद्ध है, जिसे हमें जीतना है।'

जनवरी, 2009 में कार्यभार संभालने के बाद ओबामा ने एक पूर्व खुफिया विश्लेषक ब्रूस रीडेल को अफगानिस्तान नीति की समीक्षा करने का आदेश दिया। यह काम पूरा हो पाता, इसके पहले ही उन्होंने पेंटागन की अफगानिस्तान में 17,000 और जवान भेजने की सिफारिश मंजूर कर ली, जिससे वहां कुल सत्तर हजार सैनिक हो गए।
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वर्ष 2009 के अंत तक जब तालिबान फिर से ताकतवर होकर उभरने लगे, तब ओबामा के सैन्य कमांडरों ने उनसे आतंकवाद-विरोधी एक महत्वाकांक्षी रणनीति पर चलने का आग्रह किया। इराक के युद्ध के समय ऐसी रणनीति अपनाई गई थी। यह ऐसा सिद्धांत था, जिसमें एक ओर तो भारी सुरक्षा बल, दूसरी ओर सड़कों, पूलों और स्कूलों का निर्माण और एक सरकार की स्थापना के साथ स्थानीय लोगों का विश्वास जीतने की कोशिश हो। अमेरिकी विदेश विभाग के पूर्व सलाहकार वली आर नस्र के मुताबिक इराक युद्ध में सेना उद्धारक के रूप में उभरी थी। मैं नहीं समझता कि ओबामा तब ऐसी स्थिति में थे कि वह अफगानिस्तान में सेना की उपस्थिति पर सवाल उठा सकें और यह बता सकें कि उनकी वैश्विक दृष्टि क्या है। कई महीने की बहस के बाद ओबामा अफगानिस्तान में तीस हजार अतिरिक्त फौज भेजने को राजी हुए, लेकिन समय-सीमा तय कर दी कि जुलाई, 2011 से सेना की वापसी शुरू हो जाएगी। बाद में उनके सहयोगियों ने कहा कि उन्होंने महूसस किया कि वह सेना के दबाव में आ गए हैं, जिसने उनके समक्ष बेहद संकीर्ण खाका रखा और विकल्प को सीमित कर दिया।

अपने पहले कार्यकाल की समाप्ति तक ओबामा ने 'अफगान गुड इनफ' की अवधारणा को पूरी तरह से स्वीकार कर लिया था। इसका मतलब था कि राष्ट्रनिर्माण की नीति से हटकर आतंकवादियों को खदेड़ने और तालिबान को उस देश पर दोबारा कब्जा करने से रोका जाए। अगस्त, 2010 तक अफगानिस्तान में एक लाख अमेरिकी जवान मौजूद थे और वे कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों से तालिबान को पीछे धकेलने में सफल हुए। ओसामा बिन लादेन को मारने के लिए पाकिस्तान के भीतर जाकर की गई कार्रवाई से ओबामा की युद्ध खत्म करने की प्रतिबद्धता को बल मिला।

एक मई, 2012 की मध्य रात्रि को एयरफोर्स वन विमान ओबामा को लेकर अफगानिस्तान की एक गुप्त यात्रा के लिए निकला। वह वहां अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई के साथ एक रणनीतिक साझेदारी पर हस्ताक्षर करने के लिए जा रहे थे। इसमें 2014 की अमेरिकी फौज की वापसी की तय समय-सीमा के बाद दोनों देशों के रिश्ते को कैसे आगे बढ़ाना है, इसके बिंदु थे। समझौते में दोनों देशों की लंबी साझेदारी का वायदा किया गया था। मगर करजई ने अमेरिका के साथ दीर्घकालीन सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर करने से इन्कार कर दिया। इसके बाद ओबामा ने उनके उत्तराधिकारी अशरफ गनी पर ध्यान केंद्रित किया। ओबामा के सहयोगियों के मुताबिक राष्ट्रपति का निष्कर्ष था कि बिना सही साझेदार के अमेरिका का सफल होना मुश्किल है, फिर चाहे कितना ही खून और धन क्यों न बह जाए। यह ऐसा दृष्टिकोण है, जिसे ओबामा ने इस्राइल से लेकर पाकिस्तान जैसे देशों के साथ संबंधों के मामले में अपनाया।

अगस्त, 2015 में जब ओबामा ने राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठक बुलाई थी, उस समय तालिबान भी दोबारा एकजुट हो रहे थे। इस्लामिक स्टेट जब इराक में अमेरिकी फौज की वापसी के लिए बड़ी चुनौती बना, तो ओबामा अफगानिस्तान में अपनी रणनीति बदलने को मजबूर हुए। हालांकि उस बैठक में अफगानिस्तान में अमेरिकी मदद को लेकर काफी तीखी बहस हुई। इस बैठक में उपराष्ट्रपति जोए बिन ने कहा, इससे फर्क नहीं पड़ता कि हम उस देश को कल छोड़ें या दस वर्ष बाद, वह देश फिर से अफरा-तफरी में डूब जाएगा। सितंबर में दिए एक साक्षात्कार में ओबामा ने इन्कार किया कि उनकी अफगान नीति नाकाम हो गई। उनका तर्क था कि वहां अमेरिकी जवानों की संख्या घटकर दस हजार रह गई है। ये जवान अफगान जवानों को प्रशिक्षित कर रहे हैं। उन्होंने कहा, 'हम जब वहां गए थे, तब अफगानिस्तान दुनिया के गरीब देशों में से था और वहां साक्षरता दर भी बहुत कम थी। यह स्थिति आज भी कायम है। वह देश नस्लीय और कबायली विभाजन के कारण बंटा हुआ था और आज भी वैसा ही है।' अफगानिस्तान एक नए तरह के युद्ध और स्थायी संघर्ष का प्रतीक बन गया है, जिसमें अमेरिका मुख्य किरदार न सही, एक भागीदार तो है ही।
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