31 जुलाई को नूंह के नल्हड़ मंदिर के पास से निकलने वाली, 84 कोस जलाभिषेक यात्रा से पूर्व मोनू के नाम से एक वीडियो जारी हुआ, जिसमें उसने कहा, 'यात्रा में मैं भी आ रहा हूं, स्वागत करने को तैयार रहो।' मुसलमान भड़क गए। जवाबी वीडियो में कहा गया, 'आओ, शानदार स्वागत करेंगे।' 31 जुलाई को मंदिर के सामने रक्तपात के लिए बारूदी सुरंग बिछ चुकी थी।
तीन साल से निकल रही यात्रा के दौरान अमन-चैन बनाए रखना नामुमकिन क्यों हो गया? वीडियो प्रसारित करने वाले फौरन क्यों नहीं गिरफ्तार किए गए?
छह महीने की घटनाएं भाजपा शासित हरियाणा ही नहीं, कांग्रेस शासित राजस्थान की पुलिस की भूमिका पर भी सवाल खड़े कर रही हैं। एक चर्चित आरोपी बिट्टू बजरंगी गिरफ्तार हो चुका है। मोनू पर दोनों राज्यों की पुलिस अभी तक हाथ नहीं डाल पाई है। लेकिन राजस्थान के पुलिस महानिदेशक उमेश मिश्रा ने एलान कर दिया,’ जुनैद और नासिर की हत्या में मोनू मानेसर का सीधा हाथ नहीं पाया गया है।‘ करीब दो सप्ताह तक प्रचारित होता रहा कि बिट्टू बजरंगी बजरंग दल से जुड़ा है। विश्व हिंदू परिषद ने सफाई दी है कि उसका बजरंग दल से कभी नाता नहीं रहा। पुलिस ने क्या प्रारंभिक जांच की और खुद बिट्टू ने अपने बारे में क्या बताया, पता नहीं।
मेव मुसलमानों की खास पहचान आधे मुसलमान और आधे हिंदू की रही है। मानवविज्ञानी और इतिहासकार शैल मायाराम इस समाज पर केंद्रित अपनी प्रसिद्ध पुस्तक रिजिस्टिंग रिजीम्स : मिथ, मेमरी ऐंड द शेपिंग ऑफ ए मुस्लिम आइडेंटिटी में लिखती हैं कि मेवों की विभिन्न पालें राम, कृष्ण और महादेव से संबंध जोड़ती हैं। अपने को यदुवंशी और रघुवंशी मानने वाले मुसलमान भी हैं। मेवों में भी गोत्र परंपरा रही है। दीगर मुसलमानों में चचेरी, मौसेरी और फुफेरी औलादों में शादी को भी मेव सही नहीं मानते। सुन्नी होने के बावजूद मेव लोककथाओं में हजरत अली का जिक्र अक्सर मिलता है। कर्बला की शहादत भी उनके विचार-भाव से जुड़ी हुई है। जाहिर है, इस तरह का समाज रूढ़िवादी मुसलमानों को रास नहीं आ सकता।
चौदह सौ साल पहले के इस्लामी समाज, परंपराओं और व्यवहार की ओर भारत के मुसलमानों को ले जाने की कोशिश में लगी तबलीगी जमात के पैर सबसे पहले मेवात की जमीन पर पड़े थे। शैल मायाराम बताती हैं कि प्रारंभिक दिनों में तबलीग को मेवात में मायूसी मिली थी। मेव परंपराएं बहुत हद तक बदली हैं। मेव पीरों, मजारों और दरगाहों से दूर होते रहे हैं। विचारणीय है कि 1947 के त्रासद अध्याय का इस सामाजिक परिवर्तन में कितना योगदान है? भरोसे से कहा नहीं जा सकता कि नूंह और आसपास भड़की हिंसा-प्रतिहिंसा अंततोगत्वा किस न्यायिक मोड़ पर पहुंचेगी। बरसों-बरसों मामले खिंचते हैं। जांच पर जांच होती है, रिपोर्टें धूल खाती रहती हैं, जज बदलते रहते हैं।
ये सब राजनीतिक नफा-नुकसान के मद्देनजर होता है। फिलहाल सरकारी सक्रियता-निष्क्रियता से परे, नूंह से गुरुग्राम तक समाज की दैवी शक्ति के दर्शन हो रहे हैं। रेवाड़ी, झज्जर और महेंद्रगढ़ की पचास पंचायतों ने मुसलमानों के पूर्ण बहिष्कार की घोषणा करने के बाद प्रशासन के दखल पर कदम पीछे कर लिए। हिंदुओं के क्षतिग्रस्त मकानों-दुकानों की मरम्मत के लिए मुसलमान पहल कर रहे हैं। सामाजिक संगठन भड़काऊ हरकतों के खिलाफ मुखर हैं।
मेवों ने पिछली लगभग एक सदी, खासतौर से सात-आठ दशक में, धार्मिक आस्थाओं की जो यात्रा तय की है, उससे पीछे उन्हें नहीं ले जाया सकता। जन्म, मुंडन विवाह और मृत्यु के अवसरों पर होने वाली हिंदू रस्में एक दिन पूरी तरह खत्म हो सकती हैं। कानून इसमें कुछ नहीं कर सकता। एक आधुनिक, परिवर्तनशील और प्रगतिकामी समाज में राष्ट्र-राज्य के प्रति निष्ठा और सहयात्री होने की एकमात्र कसौटी यह है कि हम कानून-कायदों और संविधान का कितनी ईमानदारी से पालन करते हैं। यह भी कि गोरक्षा हो या अन्य कोई कानून, उस पर अमल की आउटसोर्सिंग नहीं हो सकती।