वर्ष पूर्व आज ही के दिन यानी 9 जनवरी, 1915 को महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका से घर वापसी की थी। तब वे आत्मीय जनों के बापू और स्नेहिल स्वजनों के महात्मा बनने के लिए भविष्य के आदेश का इंतजार कर रहे थे। तिलक के देश निकाला और प्रथम विश्व युद्ध के कारण उत्पन्न हालातों के चलते बापू को नियति ने राजनीति में केंद्रीय भूमिका सौंप दी। उनके कंधों पर भारत का इतिहास और भविष्य के विश्व की चिंताएं आश्वस्त नजर आती थीं। महात्मा ने कई विवादग्रस्त निर्णय भी किए। उनका भविष्यमूलक अर्थ बाद की पीढ़ियों को समझ आया। कृष्ण ने धर्मगत राजनीति का आविष्कार किया था। गांधी ने राजनीतिगत धर्म को दुनिया का नया चेहरा बनाया। लगता यही था कि यह मसीहा शाश्वत मूल्यों का स्थायी स्थापनाकार बनकर जीवित रहेगा। गांधी का कत्ल किया गया। आज उस पर भी कुछ तत्व गौरव करते हैं।
गांधी गांव की आत्मा थे। उन्हें शहरों से परहेज भी था। वे आज होते, तो किसानों की हो रही अंधाधुंध आत्महत्याओं का कोई नायाब विरोध किया होता। स्वावलंबी गांव की परिकल्पना वाले महात्मा को वैश्वीकरण बर्दाश्त नहीं होता। वे सरकारों को समझाते कि विश्व को गांव बनाने की विश्वयारी के चक्कर में न पड़कर गांव को विश्व बनाने वाले वसुधैव कुटुम्बकम के रास्ते पर चलें। गांधी को आदिवासियों के लिए कुछ सार्थक न कर पाने का आत्मसंतोष नहीं था। आज गांधी को झुठलाकर आदिवासियों की जमीनें निर्लज्ज कानूनों के आधार पर छीनी जा रही हैं। एक तरफ सरकारें, दूसरी तरफ उद्योगपति, तीसरी तरफ राजनेता और चौथी तरफ खड़े नक्सलवादियों की चौहद्दी में आदिवासी किसान, परंपराएं, संस्कृति, ग्राम्य बालाओं का शील, युवकों का भविष्य सब कुछ खतरे में है। दक्षिण अफ्रीका के मूल निवासी भी तो आदिवासी नस्ल के रहे हैं। उनका ही तो उद्धार गांधी ने किया। वे होते, तो कहते कि सरकार के काले कानूनों को मत मानो। सरकार ने मानव अधिकार विरोधी जितने कानून बनाए हैं, उनको खुली चुनौती दो। वे कहते कि अवैध टैक्स देना बंद करो। वे शराब माफिया के खिलाफ अहिंसक आंदोलनों की झड़ी लगा देते। वे किसी भी हालत में 'विशेष आर्थिक क्षेत्र' नहीं बनाने देते।
उनकी बेहद कुरूप मूर्तियां सारे देश में लगी हैं। वे अकेले हैं, जो देश में सभी दफ्तरों और न्यायाधीशों के सिर के ऊपर तक टंगे हैं। उनके जन्मदिवस पर छुट्टी होती है। उनकी पुण्यतिथि पर उसकी पूरी छुट्टी कर दी गई। उनके रास्ते पर चलने का वे लोग भी आह्वान करते हैं, जो दुनिया की सबसे महंगी शराबें पीते हैं। जो बिना रसीद दिए नकद में फीस लेते हैं। जो मांसाहार के समर्थक हैं। जो एयरकंडीशनर के बिना न तो उठते-बैठते हैं, न सोते हैं और न ही यात्रा करते हैं। जो उस बूढ़े आदमी की हिदायत के बाद भी छोटे सरकारी मकानों में रहना पसंद नहीं करते। जो अमेरिका और यूरोप में इलाज कराकर ही मरने को प्राथमिकता देते हैं। जो दक्षिण अफ्रीका को क्रिकेट खेलने के नाम से जानते हैं, लेकिन जिन्हें सेंट मेरिट्जबर्ग स्टेशन का नाम तक नहीं मालूम है।
वे पहले भारतीय थे, जिन्होंने अधिकारच्युत लोगों में आत्मविश्वास गूंथते हुए वक्त की नजाकत के अनुकूल चतुर रणनीति अख्तियार करने की शैली को भी इतिहास की प्राकृतिक दिशाओं के संदर्भ में समझ लिया था। समस्याओं, विचारों, गलतफहमियों और अंतर्विरोधों की जड़ तक जाने में गांधी को जादुई दृष्टि हासिल थी। ऐसा नहीं है कि हर कोई उसी तरह परिश्रम करके गांधी बन सकता है। तारीख में बड़ा आदमी होना केवल देह धरे का उत्कर्ष नहीं है। कहीं तो कुछ है, जो किसी को इंसानियत की सरगनिसेनी बना देता है। सरगनिसेनी का लक्ष्य खुद कहीं पहुंचना नहीं है। वह पाथेय बताने का कुतुबनुमा है। कोई उस पर चढ़े तो!
विफल कोशिशें जारी हैं कि इस बूढ़े आदमी को 21वीं सदी में खारिज कर दिया जाए, या उसे बीत गए इतिहास में दाखिल दफ्तर कर दिया जाए। विकास, वैश्वीकरण, प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश, छद्म सेक्यूलरिज्म, भारतीयकरण, घर वापसी, महंगाई का सूचकांक, पांच सितारा संस्कृति, एंटीलिया, प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार, अफसरशाही, लव जेहाद जैसे कई और शब्द हैं, जो गांधी के शब्दकोश में नहीं थे। ये नई अभिव्यक्तियां हैं। इतिहास कभी-कभी पीछे की ओर अंधेरी खाइयों में धकेल दिया जाता है। हिंदुस्तान के साथ भी यही हुआ है। गांधी का पुनर्जन्म उन्हें इतने पीछे खड़ा करेगा, जो जगह 1893 के दक्षिण अफ्रीका में भी नहीं थी। कुदरत ने तब वह वक्त गांधी के लिए तजवीज कर रखा था। अब तो सब कुछ और पीछे चला गया है। हम इस बात की गारंटी नहीं दे सकते कि गांधी के प्रशंसक होने के बावजूद हममें इतनी ताब बाकी है कि हम उनका साथ दे सकें। गांधी की छाती पर गोली मारने से ज्यादा बुरा काम होगा कि उनकी पीठ पर खंजर मारा जाए। इसलिए बापू के लिए यही बेहतर होगा कि वे इस बार नहीं आएं!