कई वर्षों से पाकिस्तान के उत्तरी वजीरिस्तान में ऑपरेशन जर्ब-ए-अज्ब चलाए जाने की अफवाह थी। ह्वाइट हाउस पर अमेरिकी सांसदों के तंज कसने के बावजूद कि अमेरिका अफगानिस्तान में अपने सैनिकों को मारने के लिए पाकिस्तान को वित्तीय सहायता देता है, न तो अमेरिकी विदेश विभाग और न ही ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ पाकिस्तानी सेना को जून, 2014 से पहले उस क्षेत्र में सैन्य अभियान चलाने के लिए राजी कर पाया। और वह अभियान भी तब शुरू हुआ, जब तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) ने उज्बेकिस्तान के इस्लामिक मूवमेंट (आईएमयू) के साथ मिलकर कराची हवाई अड्डे पर हमला किया।
छह महीने बाद टीटीपी ने उस सैन्य ऑपरेशन का बदला पेशावर हमले के रूप में लिया। अब पाकिस्तानी सेना टीटीपी और पूर्वी अफगानिस्तान में छिपे उसके प्रमुख मुल्ला फजलुल्ला को बाहर निकालकर पकड़ने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुई है। पेशावर हमले का बदला लेने के लिए सैन्य ऑपरेशन तेजी से चल रहा है। बदला लेना पश्तुनों का धार्मिक विश्वास है, जो चक्रीय रूप से चलता रहता है।
9/11 तक फाटा के सात कबायली इलाके में पाकिस्तानी सेना की पहुंच सीमित थी। उत्तरी वजीरिस्तान को, जो अंतरराष्ट्रीय आतंकवादियों का गढ़ है, पाकिस्तानी सेना ने कभी नहीं छेड़ा। यहां छिपे तीन आतंकी संगठनों-हक्कानी नेटवर्क, हिज्ब-ए-इस्लामी और अफगान तालिबान को, जिसे वह अपनी सामरिक संपत्ति समझता है, उसने कभी निशाना नहीं बनाया।
पाकिस्तानी फौज ने अपना ऑपरेशन उत्तरी वजीरिस्तान को छोड़कर फाटा के अन्य इलाकों में चलाया। अब भी वैसे आतंकवादी पाकिस्तान की सामरिक संपत्ति माने जाते हैं, जो अफगानिस्तान और भारत को तो नुकसान पहुंचाते हैं, लेकिन पाकिस्तान को नहीं। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई बुनियादी तौर पर जिहादी आतंकी समूहों से जुड़ी हुई है और जैसा कि अमेरिका के पूर्व ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ एडमिरल माइक मुलेन ने एक बार हक्कानी समूह के बारे में कहा था, यह आईएसआई का असली हथियार है। इनमें से प्रमुख गुट वजीरिस्तान के महसूदों और वजीरों का है, जिसका नेतृत्व महसूदों के हाथ रहा है। मगर अब्दुल्ला, बैतुल्ला और हकीमुल्ला महसूद के ड्रोन हमले में मारे जाने के बाद इसकी कमान गैर महसूद मुल्ला फजलुल्ला के हाथों में है। अनुमान के मुताबिक, पाकिस्तान में सबसे ज्यादा करीब 10-12 हजार टीटीपी के, आठ से दस हजार अफगान तालिबान के, तीन से चार हजार हक्कानी और हिज्ब ए इस्लामी गुट के, चार से पांच हजार लश्करे तैयबा के और आठ से दस हजार अन्य गुटों के जिहादी लड़ाके हैं।
सेना प्रमुख के रूप में अपने सात वर्षों के कार्यकाल में जनरल परवेज कियानी ने उत्तरी वजीरिस्तान को नहीं छेड़ा, क्योंकि उन्हें धार्मिक विरोध की आशंका थी। लेकिन जनरल राहिल शरीफ ने इन आतंकी गुटों के खिलाफ सीधी जंग छेड़ दी है। कम से कम वह ऐसी कोशिश तो कर ही रहे हैं। इसलिए जब तक वह टीटीपी पर पूरी तरह काबू नहीं कर लेते, तब तक पेशावर जैसी घटनाएं होने की आशंका है।
अमेरिका ने वर्ष 2014-15 में पाकिस्तान को एक अरब डॉलर की वित्तीय सहायता दी है, जिनमें से 34 करोड़ डॉलर पाकिस्तानी सेना को हक्कानी गुट को निशाना बनाने की प्रतिबद्धता दिखाने के लिए दिया गया है। अमेरिका के लिए पाकिस्तान एक मुश्किल आसामी है-परमाणु क्षमता से लैस अकेला जिहादी देश, जो पसंदीदा गैर नाटो सहयोगी भी है।
ऑपरेशन जर्ब-ए-अज्ब पिछले छह महीनों से चल रहा है। सेना का दावा है कि उसने 1,500 आतंकियों को मार गिराया है, जबकि 3,500 सैनिक मारे गए और घायल हुए हैं। हक्कानी और हिज्ब ए इस्लामी को बख्श दिया गया है। पाकिस्तानी सेना बल प्रयोग करने के मामले में पश्चिमी देशों की सेना से अलग नहीं है-सैनिकों को युद्ध क्षेत्र में उतारने से पहले वह वायु सेना के जेट विमानों, बमवर्षक हेलिकॉप्टरों और तोपों का इस्तेमाल करती है। अंधाधुंध बमबारी से अतिरिक्त नुकसान होता है और बेगुनाह नागरिक भी मारे जाते हैं। इसके लिए उसे क्षेत्र में और सैनिक उतारने की जरूरत है, लेकिन ऐसा वह तभी कर सकती है, जब भारत के खिलाफ पूर्वी सीमा पर तैनात सैनिकों को पश्चिमी सीमा पर भेजे। मगर इससे भारत को दुश्मन नंबर एक बताने के नाम पर खड़ा किया गया हौव्वा खत्म हो जाएगा। भारतीय सेना ने कभी घुसपैठ निरोधी और आतंकवाद निरोधी अभियानों में अपने नागरिकों के खिलाफ वायु सेना और तोप का इस्तेमाल नहीं किया। यहां तक पाकिस्तानी जिहादी घुसपैठियों के खिलाफ भी इनका इस्तेमाल नहीं किया गया।
अच्छे दिनों में और भारत का विश्वास जीतकर पाकिस्तानी सेना पूर्वी सीमा से और ज्यादा सैन्य टुकड़ी को पश्चिमी सीमा पर तैनात कर सकती है। इस समय उसके करीब 1,80,000 सैनिक पश्चिमी सीमा पर लड़ रहे हैं। पाकिस्तानी सेना अकेले आतंकवाद की बहुकोणीय चुनौती से नहीं निपट सकती। आतंकवादियों के अलावा, बलूचिस्तान, गिलगिट-बाल्टिस्तान में बगावत जारी है और कराची तो आतंकियों का स्वर्ग बना हुआ है, जहां टीटीपी, अफगान और पंजाबी तालिबान एवं एमक्यूएम जैसे आतंकी संगठन अपने स्वतंत्र माफिया गुटों का संचालन करते हैं।
पाकिस्तान की समस्या सांप्रदायिक आतंकवाद के कारण भी बढ़ गई है, जिसमें लश्कर-ए झांगवी, सिपहसालार-ए साहिबा (शिया को निशाना बनाते हैं), अहमदिया आदि प्रमुख हैं। एक विफल राष्ट्र के पुनर्निर्माण के लिए संयुक्त प्रयास की जरूरत है, पर ऐसा करने से पहले रावलपिंडी स्थित सेना मुख्यालय और इस्लामाबाद को अच्छे और बुरे तालिबान के बीच फर्क करना बंद करना होगा। यह पाकिस्तान के लिए आखिरी अवसर है, खासकर पाकिस्तानी सेना के लिए। लेकिन यह आसान नहीं है। पेशावर की घटना के बाद प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की नई राष्ट्रीय कार्ययोजना इसमें मदद करेगी।
-लेखक भारतीय सेना से सेवानिवृत्त मेजर जनरल हैं