साधो, हर बार की तरह वह सिर पर आम का टोकरा लिए खड़े थे। मैंने कहा, बारिश के मौसम में सब बाहर गए हैं। आम तो लगभग खत्म हो गए हैं। फिर आप इतने आम कहां से ले आए? वह बोले, इस बार हम आम नहीं, अच्छे दिन लाए हैं।
सुनकर मैं सकपका गया। इतने अच्छे दिनों का क्या होगा? वह कहने लगे, मोदी जी ने भेजे हैं। मोहल्ले भर में बांट देना, ताकि सबके घर थोड़े-थोड़े पहुंच जाएं। मुझे याद आया। मियां नवाज शरीफ ने भी इसी मौसम में हमारे प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को आम के टोकरे भेजे हैं। मैंने देखा कि अच्छे दिन मलीहाबादी आम की तरह खूबसूरत थे और महक रहे थे। मैंने उनके सामने ही आमनुमा एक अच्छे दिन को चूसा, तो वह बेहद खट्टा लगा।
पूछा उन्होंने, कैसा लगा?
मैंने कहा, बहुत मीठा है। लगता है, किसी ने शक्कर घोल दी है। वह बोले, यही तो फर्क है मोदी और मनमोहन के अच्छे दिनों में। मोदी की इस फसल में कुछ खास है। गुजरात के पाल में वर्षों तक पकाए गए हैं। इनकी खपत इन दिनों जोरों पर है। मैं इन्हें किसी तरह यहां तक छिपाकर लाया हूं। मलीहाबाद में आम के पैदावारी चाहते हैं कि यह मोदी आम इधर न आए। वे अपने बगीचों में मोदी आम उगाने की तैयारी में हैं। मैंने उन्हें सुझाया कि वे अपने किसी आम को मोदी आम घोषित कर दें। जब चुनावों में मोदी के मुखौटों से काम चल गया, तब फिर असली की जरूरत क्या है?
नई खबर है कि देश भर में अब मोदी ढाबे खुलेंगे। लोग घरों में खाना बनाना बंद कर इन ढाबों में गुजराती व्यंजनों का आनंद लेंगे। मोदी जब भूटान गए थे, तब एक गुजराती रसोइया पांच दिन पहले वहां पहुंच गया था। मोदी चुनावी अभियान पर निकले थे, तब भी उन्होंने एक गुजराती को उत्तर प्रदेश में छमाही पहले रवाना कर दिया था। हमारे घर में इतनी जल्दी जो अच्छे दिन आ गए, उसमें इसी गुजराती का कमाल है। विपक्षी बेकार परेशान हैं। जिन्हें अच्छे दिन दिखाई नहीं देते, उन्हें दिन में रतौंधी आती है।