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आतंकी साजिशों को बेअसर करने की दिशा में

Mon, 08 Sep 2014 07:48 PM IST
रवींद्र दुबे
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अल जवाहिरी का भारत में जेहाद चलाने के बयान वाला वीडियो जारी होने से गृह मंत्रालय में खलबली है। आतंकी आशंकाओं के चलते खुफिया एजेंसियों से काफी सतर्क रहने की अपेक्षा भी है; त्योहारों के मौसम में तो खासकर। पर खुफिया एजेंसियों की चिंता का एक कारण 'नेत्र' की विफलता भी है। यहां नेत्र का मतलब सौ करोड़ रुपये के उस कंप्यूटर सिस्टम से है, जो आतंकवादियों के बीच डिजिटल संचार को अवरोधित करने के लिए तैयार किया गया था। नेत्र अंग्रेजी के नेटवर्क ट्रैफिक एनालिसिस का संक्षिप्तीकरण है।
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पिछले कई महीनों से खुफिया एजेंसियां इराक, अफगानिस्तान और पाकिस्तान स्थित आतंकियों के साथ महाराष्ट्र और कश्मीर के लोगों के बीच हो रही बातचीत का पता लगाकर 26/11 जैसे हादसों को रोकने की कोशिशों में लगी हुई हैं। नेत्र संदेशों को पकड़ तो लेता है, पर इससे आगे इसका कोई उपयोग नहीं है, क्योंकि संदेश कंप्यूटर की कोड भाषा में होते हैं, जो खुफिया अधिकारियों की समझ के परे होते हैं।

वर्ष 2008 में जब भारतीय खुफिया एजेंसियों ने पाया कि लश्कर के आतंकी इंटरनेट का खुलकर इस्तेमाल कर रहे हैं, तब उन्हें जासूसी के एक डिजिटल सिस्टम की जरूरत महसूस हुई। नेत्र का गठन इसी सिलसिले में हुआ। देश के कई इंटरनेट हब्स में लगा हुआ नेत्र इंटरनेट से डेटा उठाता है और फिर दिलचस्प ‘की-वर्ड’ के जरिये उसे फिल्टर करता है। डीआरडीओ के सेंटर फॉर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ऐंड रोबोटिक्स द्वारा तैयार किए गए इस सिस्टम ने कई प्रौद्योगिकी पुरस्कार जीते हैं। यह उन वेबसाइटों के ट्रैफिक का पता बखूबी लगा लेता है, जिन पर जेहादी गतिविधियों में लिप्त होने का शुबहा है। इससे टार्गेट कंप्यूटरों और मोबाइल फोन का पता लग जाता है और उनमें बातचीत रिकॉर्ड करने और की-स्ट्रोक पता लगाने वाला सॉफ्टवेयर डाल दिया जाता है।
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पर एन्क्रिप्टेड ट्रैफिक को तोड़ने में नेत्र विवश है। इसके लिए एक सॉफ्टवेयर के निर्माण का काम नेशनल टेक्निकल रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन को सौंपा गया है। लेकिन इस दिशा में अभी कामयाबी नहीं मिली है। यानी हमारी खुफिया एजेंसियां स्काइप एयर वेबर, व्हाट्सऐप और फेसबुक जैसी सेवाओं पर नजर नहीं रख सकतीं। इसके अलावा नेत्र जो सामग्री तैयार करता है, उसके विश्लेषण के लिए कर्मचारी भी स्वीकृत नहीं हैं। आईबी के कार्यकारी निदेशालय में मात्र चालीस लोगों का स्टाफ है। संगठन में कुल स्वीकृत पद 26,867 हैं, पर मात्र 18,795 कर्मचारी ही काम कर रहे हैं।

दूसरी ओर, अमेरिकी फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन के पास 34,019 लोगों का, जबकि नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी (एनएसए) के पास 40,000 लोगों का स्टाफ है। एनएसए पूरी दुनिया में गणितज्ञों की सबसे बड़ी नियोक्ता है और एन्क्रिप्शन गणित के ज्ञान के बिना तोड़ा भी नहीं जा सकता। एनएसए के साथ फायदा यह भी है कि अधिकतम संचार सेवाओं के मुख्यालय अमेरिका में ही हैं। इससे उन्हें सूचना का डिजिटल कोड तोड़ने में आसानी होती है।

भारत जिस समस्या से जूझ रहा है, उसका हल यही है कि इंटरनेट सेवा मुहैया करवाने वाली कंपनियों को अपने सर्वर भारत में ही रखने हेतु तैयार किया जाए, जैसा ब्राजील में हो चुका है और जर्मनी में हो रहा है। इस मामले में विलंब का हमें ही नुकसान होगा।
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