विश्व बैंक की नई रिपोर्ट ‘डुइंग बिजनेस, 2015’ के अनुसार कारोबार करने में आसानी के लिहाज से 189 देशों की सूची में भारत 142वें पायदान पर पहुंच गया है। पिछले साल वह 140वें स्थान पर था। इस सूची में 88.27 अंकों के साथ सिंगापुर पहले, ब्रिटेन आठवें, चीन 90वें, श्रीलंका 99वें, नेपाल 108वें, मालदीव 116वें, भूटान 125वें तथा पाकिस्तान 128वें स्थान पर है। व्यापार के लिए बेहतर देश के निर्धारण के लिए 31 मई, 2014 तक के आंकड़ों को आधार बनाया गया है। रैंकिंग के लिहाज से भारत भले थोड़ा नीचे आया हो, पर बीते कुछ महीनों में यहां व्यापार करने में आसानी पहले से ज्यादा हो गई है।
विश्व बैंक के अनुमान के मुताबिक, अगले वर्ष कारोबार और उद्योग के लिहाज से भारत की रैंकिंग में सुधार हो सकता है। इस संभावना की कई वजहें हैं। इसका एक कारण यह है कि मोदी सरकार द्वारा आर्थिक सुधारों और आधारभूत तथा अन्य क्षेत्रों में उठाए जा रहे कदम निवेश के लिए उत्साह पैदा कर रहे हैं। सरकार ने बीमा तथा रक्षा क्षेत्र में 49 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की स्वीकृति दी है। इसी तरह श्रम कानूनों को सरल और कारगर बनाने की रूपरेखा भी तैयार की है। नई सरकार ने काम संभालने के शुरुआती कुछ दिनों में पड़ोसी मुल्कों के साथ करीबी आर्थिक संबंध स्थापित करने की जो कोशिश की, उससे भारत का क्षेत्रीय आर्थिक महत्व बढ़ गया है। इसी तरह भारत के वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की उम्मीद का कारण श्रम का सस्ता होना तो है ही, नई पेशेवर पीढ़ी की ताकत भी है। भारत का बाजार दुनिया की सर्वाधिक संभावनाओं वाला बाजार भी है।
पर देश के औद्योगिक परिदृश्य में सुधार और विकास को हकीकत में बदलने के लिए प्रधानमंत्री की बातों को अमली जामा पहनाने की जरूरत है। श्रमेव जयते का नारा देते हुए प्रधानमंत्री ने उद्योगों को इंस्पेक्टर राज से बचाने के लिए जो घोषणाएं कीं, उनका शीघ्र ही कार्यान्वयन होना चाहिए। समय आ गया है कि सरकार औद्योगिक परिदृश्य सुधारे और उद्योगों में जान फूंकने के लिए नीतिगत फैसले ले। मसलन, कोयले के बारे में किसी को जानकारी नहीं कि क्या निर्णय होने जा रहा है? कोल इंडिया का कहना है कि वह एक भी नए ब्लॉक का काम हाथ में नहीं ले सकती, क्योंकि उसके पास मानव संसाधन की भारी कमी है।
इसी तरह गैस कीमतों का फैसला भी टलता जा रहा है। नतीजतन बिजली से लेकर उर्वरक तक कई क्षेत्रों के उद्योगों का भविष्य अधर में है। जमीन अधिग्रहण और श्रम जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए सिंगल विंडो मंजूरी के साथ बेहतर अवसंरचना और आसान नियमों की जरूरत है। ब्याज दरों में कटौती से औद्योगिक उत्पादन सुधारने में मदद मिल सकती है। जरूरी है कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बढ़ावा देने की कोशिश के तहत लाइसेंसिंग में ढील दी जाए, तैयार माल के मुकाबले कच्चे माल पर कम आयात शुल्क लगाया जाए, विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ाने के लिए जीएसटी को शीघ्र लाया जाए और कारोबार व औद्योगिक मामलों में गुड गवर्नेंस की स्थिति बनाई जाए। तभी देश में उद्योग-कारोबार की चमकीली तस्वीर दिखाई देगी।