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अब इस्तीफा नहीं दूंगा

Wed, 28 Jan 2015 07:53 PM IST
सहीराम
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अभी तक तो यह था जी, कि लोग इस्तीफा मांगते रह जाते थे और नेता सुनता तक नहीं था। वैसे इस्तीफा मांगना विपक्ष का धर्म माना जाता था और इस्तीफा न देना नेता की काबिलियित। पर जो नेता मांगने पर भी इस्तीफा न दे, उसे कुर्सी का चिपकू मान लिया जाता था। बल्कि एक जमाने में तो नेताओं और कुर्सी को अभिन्न मानते हुए चुटकले चलते थे कि यह फेवीकोल का जोड़ है, टूटेगा नहीं। पर अब समस्या यह आ गई है कि जो नेता बिन मांगे इस्तीफा दे दे, उसे भगोड़ा करार दिया जाता है।
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अभी तक यह था कि जो नेता बिना मांगे इस्तीफा दे दे, उसे महान मान लिया जाता था। जैसे बताते हैं कि एक बार ट्रेन दुर्घटना होने पर तत्कालीन रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने तुरंत इस्तीफा दे दिया था। उसके बाद से जब भी कोई रेल दुर्घटना होती है, तो लोग उस मिसाल को याद करते हैं और रेल मंत्री को लानतें भेजते हैं कि देखो, इस्तीफा तक नहीं देता। पर अब कोई अगर इस तरह इस्तीफा दे दे, तो खतरा यह है कि उसे अक्षम मान लिया जाएगा।

पहले विरोधी अगर सत्ताधारी नेता का इस्तीफा नहीं मांगता था, तो उसे सत्ता के साथ मिला हुआ मान लिया जाता था। किसी विरोधी की यह छवि न बने, इसलिए विपक्ष, सत्ताधारियों के इस्तीफे निरंतर मांगता रहता है। अब विरोधी ऐसे हैं कि प्रचार कर रहे हैं कि यह क्या नेता है, जो इस्तीफा देकर भाग गया। पहले बिन मांगे इस्तीफा देनेवाला नेता गर्व कर सकता था कि देखो, मुझे कुर्सी का मोह नहीं है। पर अब यों इस्तीफा देने वाला नेता पछताता है कि मुझसे गलती हो गई, जो इस्तीफा दिया। अब नहीं दूंगा। केजरीवाल जी इधर यही कह रहे हैं। उनके विरोधी उन पर आरोप लगा रहे हैं कि यह तो भगोड़ा है। वह सफाई दे रहे हैं-गलती हो गई जी, अब नहीं भागूंगा।
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अब यदि केजरीवाल जी को दोबारा सत्ता मिल गई, और उनके विरोधियों ने इस्तीफा मांगा, तो वह कह सकते हैं कि मैं इस्तीफा नहीं दूंगा। यानी उनके विरोधियों ने उन्हें भगोड़ा बताकर बड़ा खतरा मोल ले लिया है।
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