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एक आपदा का पूर्वानुमान

पी. चिदंबरम
Updated Sun, 01 Mar 2020 04:31 PM IST
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delhi violence - फोटो : अमर उजाला

मुस्लिमों में अब यह आम धारणा है कि केंद्र सरकार उनके हितों को सुरक्षित नहीं रखेगी। एक लोकतांत्रिक और देखभाल करने वाली सरकार अपने लोगों तक पहुंचती है और उनसे संवाद करती है। पिछले दो महीनों के दौरान ऐसा कुछ नहीं हुआ है।  

आम तौर पर किसी आसन्न आपदा का पूर्वानुमान लगाने के लिए व्यावहारिक ज्ञान ही पर्याप्त होता है, इसके लिए छठी इंद्री की जरूरत नहीं पड़ती। उत्तर-पूर्वी दिल्ली में 24 फरवरी और उसके बाद फैली हिंसा के बारे में आसानी से पूर्वानुमान लगाया जा सकता था, जिसने शांति को छिन्न-भिन्न कर दिया और जिसमें 41 लोगों की जान जा चुकी है।



ऐसा लगता है कि इसके लिए सिर्फ दिल्ली पुलिस ही तैयार नहीं थी। 25 फरवरी, 2020 के द हिंदू के मुताबिक, 'तकरीबन सौ पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में हिंसा भड़की, मगर उन्होंने हालात को नियंत्रित करने के लिए कदम नहीं उठाए।'

यह महत्वपूर्ण नहीं है कि पहले किसने उकसाया या किसने पहला पत्थर फेंका या किसने पहले बंदूक निकाली। महत्वपूर्ण यह है कि जो लड़ाई सरकार और सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों के बीच थी, वह सड़कों पर फैल गई और सीएए-विरोधी प्रदर्शनकारियों और सीएए समर्थक प्रदर्शनकारियों की लड़ाई में बदल गई। 

11 दिसंबर, 2019 के बाद से देश के विभिन्न हिस्सों में काफी कुछ हुआ हैः शाहीन बाग, दिल्ली और अन्य शहरों तथा कस्बों में धरना; जुलूस और रैलियां; चुनावी बयानबाजी; और अदालतों में याचिकाएं। 23 फरवरी को एक भाजपा नेता ने दिल्ली पुलिस को चेतावनी दी, 'दिल्ली पुलिस को तीन दिन का अल्टीमेटम है, कि वह जाफराबाद और चांद बाग की सड़कों को खाली करवाए। इसके बाद हमसे कुछ नहीं कहना। हम आपकी नहीं सुनेंगे। केवल तीन दिन।' 

क्या यह सुनियोजित है?
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, जामिया मिल्लिया इस्लामिया (जहां 40 फीसदी छात्र गैर-मुस्लिम हैं) और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में हुई हिंसा के बारे में नए तथ्य सामने आए हैं, जिसमें सैकड़ों विद्यार्थियों को पीटा गया था। इसमें दिल्ली पुलिस और उत्तर प्रदेश पुलिस (अकेले इस प्रदेश में फायरिंग में 23 लोगों की मौत हुई) की बर्बरता की ओर उंगलियां उठाई गई हैं।
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जैसे-जैसे दिन बीतते गए, अदालतों ने एफआईआर और पुलिस रिपोर्ट्स की सच्चाई के बारे में सवाल उठाना शुरू कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के दो जजों ने सार्वजनिक रूप से असहमति का बचाव किया और विरोधियों को राष्ट्र विरोधी करार दिए जाने के खिलाफ आगाह किया। 

फिर भी सरकार ने ढोंग किया और जतलाया कि जैसे कुछ भी गलत नहीं हुआ है। सरकार की ओर से जो बयान आए भी, तो वे नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) और प्रस्तावित राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) के निर्मम बचाव में थे। उनसे बचाव से अधिक धमकियों की ध्वनि निकल रही थी।

यह संदेह बढ़ता जा रहा है कि भाजपा किसी योजना पर काम कर रही है। अनेक लोग संदेह जता रहे हैं कि भाजपा चाहती है कि विभिन्न विचारधारा के लोग कट्टरता दिखाएं, सड़कों पर उतरें और वह चाहती है कि इस तरह ध्रुवीकरण पूरा हो जाए। यह नजरिया कठोर हो सकता है और सही न भी हो, लेकिन सरकार के अड़ियल रुख और प्रदर्शनकारियों (इसमें सिर्फ मुस्लिम नहीं हैं) के साथ संवाद से इनकार करने से संदेह गहरा हो रहा है।

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delhi violence - फोटो : अमर उजाला
मुस्लिमों में अब यह आम धारणा है कि केंद्र सरकार उनके हितों को सुरक्षित नहीं रखेगी। एक लोकतांत्रिक और देखभाल करने वाली सरकार अपने लोगों तक पहुंचती है और उनसे संवाद करती है। पिछले दो महीनों के दौरान ऐसा कुछ नहीं हुआ है।  

आम तौर पर किसी आसन्न आपदा का पूर्वानुमान लगाने के लिए व्यावहारिक ज्ञान ही पर्याप्त होता है, इसके लिए छठी इंद्री की जरूरत नहीं पड़ती। उत्तर-पूर्वी दिल्ली में 24 फरवरी और उसके बाद फैली हिंसा के बारे में आसानी से पूर्वानुमान लगाया जा सकता था, जिसने शांति को छिन्न-भिन्न कर दिया और जिसमें 41 लोगों की जान जा चुकी है।

ऐसा लगता है कि इसके लिए सिर्फ दिल्ली पुलिस ही तैयार नहीं थी। 25 फरवरी, 2020 के द हिंदू के मुताबिक, 'तकरीबन सौ पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में हिंसा भड़की, मगर उन्होंने हालात को नियंत्रित करने के लिए कदम नहीं उठाए।'

यह महत्वपूर्ण नहीं है कि पहले किसने उकसाया या किसने पहला पत्थर फेंका या किसने पहले बंदूक निकाली। महत्वपूर्ण यह है कि जो लड़ाई सरकार और सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों के बीच थी, वह सड़कों पर फैल गई और सीएए-विरोधी प्रदर्शनकारियों और सीएए समर्थक प्रदर्शनकारियों की लड़ाई में बदल गई। 

11 दिसंबर, 2019 के बाद से देश के विभिन्न हिस्सों में काफी कुछ हुआ हैः शाहीन बाग, दिल्ली और अन्य शहरों तथा कस्बों में धरना; जुलूस और रैलियां; चुनावी बयानबाजी; और अदालतों में याचिकाएं। 23 फरवरी को एक भाजपा नेता ने दिल्ली पुलिस को चेतावनी दी, 'दिल्ली पुलिस को तीन दिन का अल्टीमेटम है, कि वह जाफराबाद और चांद बाग की सड़कों को खाली करवाए। इसके बाद हमसे कुछ नहीं कहना। हम आपकी नहीं सुनेंगे। केवल तीन दिन।' 

क्या यह सुनियोजित है?
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, जामिया मिल्लिया इस्लामिया (जहां 40 फीसदी छात्र गैर-मुस्लिम हैं) और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में हुई हिंसा के बारे में नए तथ्य सामने आए हैं, जिसमें सैकड़ों विद्यार्थियों को पीटा गया था। इसमें दिल्ली पुलिस और उत्तर प्रदेश पुलिस (अकेले इस प्रदेश में फायरिंग में 23 लोगों की मौत हुई) की बर्बरता की ओर उंगलियां उठाई गई हैं।

जैसे-जैसे दिन बीतते गए, अदालतों ने एफआईआर और पुलिस रिपोर्ट्स की सच्चाई के बारे में सवाल उठाना शुरू कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के दो जजों ने सार्वजनिक रूप से असहमति का बचाव किया और विरोधियों को राष्ट्र विरोधी करार दिए जाने के खिलाफ आगाह किया। 

फिर भी सरकार ने ढोंग किया और जतलाया कि जैसे कुछ भी गलत नहीं हुआ है। सरकार की ओर से जो बयान आए भी, तो वे नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) और प्रस्तावित राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) के निर्मम बचाव में थे। उनसे बचाव से अधिक धमकियों की ध्वनि निकल रही थी।

यह संदेह बढ़ता जा रहा है कि भाजपा किसी योजना पर काम कर रही है। अनेक लोग संदेह जता रहे हैं कि भाजपा चाहती है कि विभिन्न विचारधारा के लोग कट्टरता दिखाएं, सड़कों पर उतरें और वह चाहती है कि इस तरह ध्रुवीकरण पूरा हो जाए। यह नजरिया कठोर हो सकता है और सही न भी हो, लेकिन सरकार के अड़ियल रुख और प्रदर्शनकारियों (इसमें सिर्फ मुस्लिम नहीं हैं) के साथ संवाद से इनकार करने से संदेह गहरा हो रहा है।

सीएए-एनपीआर फैला रहे हैं भय

सरकार कहती है कि एनपीआर एक उदार कवायद है और सीएए राष्ट्रहित में है, और इन दोनों का आपस में कोई संबंध नहीं है। यह समझ से परे है कि कुछ लोग इस बचकाने तर्क को कैसे निगल सकते हैं। एनपीआर कोई उदार नहीं है, इसके फॉर्म में अनेक नुकसानदायक सवाल जोड़े गए हैं।

जहां तक सीएए की बात है तो यह साफ तौर पर भेदभाव से भरा हुआ है और उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। इसके अलावा सीएए और एनपीआर आपस में जुड़े हुए हैं। पहले 'सामान्य निवासियों' की पहचान करने के लिए एनपीआर किया जाएगा और जिन लोगों की पहचान 'सामान्य निवासियों' के रूप में नहीं हो पाएगी उन्हें 'संदिग्ध' करार दिया जाएगा।

सैद्धांतिक रूप में 'संदिग्ध' सभी धर्मों से होंगे। यहीं पर सीएए की जरूरत पड़ेगी। ऐसे सारे 'संदिग्ध' लोग जो हिंदू, ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध या पारसी होंगे, उन्हें नागरिकता के लिए एक साधारण आवेदन पत्र देने का अधिकार होगा और उन्हें नागरिकता प्रदान कर दी जाएगी। बचे संदिग्ध मुस्लिम होंगे और सीएए के तहत उनके लिए कोई सहारा नहीं होगा।  

इस बात की आशंका है कि एनपीआर की कवायद के बाद लाखों मुस्लिम छूट जाएंगे। इसमें आश्चर्य की क्या बात है कि जब लाखों मुस्लिम चिंतित हों, तब कुछ हजार मुस्लिम महिलाएं और बच्चे, जो कि आम तौर पर दरवाजों के पीछे होते हैं, सड़कों पर और पार्कों में निकल आए हैं और बारिश, सर्दी और पुलिस की लाठियां बर्दाश्त कर रहे हैं? उन्हें उम्मीद और हौसला मिल रहा है, हजारों गैर-मुस्लिमों और अनेक राजनीतिक दलों से, जिन्होंने उनकी ओर समर्थन का हाथ बढ़ाया है। 

बेपरवाह और अलोकतांत्रिक

भाजपा लोकसभा में उसे प्राप्त भारी बहुमत के साथ अपने विभाजनकारी एजेंडा पर अमल को लेकर उत्साहित है और सच यह है कि लोकसभा चुनाव अभी चार साल दूर हैं। भाजपा ने अनमने ढंग से 2019 में छह मुस्लिम उम्मीदवारों (पश्चिम बंगाल में तीन, जम्मू-कश्मीर में दो और लक्षद्वीप में एक) को खड़ा किया था और उसने कभी छिपाया नहीं कि वह सक्रिय होकर मुस्लिम मतदाताओं से उनके वोट मांगेगी।

दूसरी बार सरकार बनाने के बाद से प्रधानमंत्री ने कई कदम उठाए हैं, जिनसे मस्लिमों में भय बढ़ा है। मुस्लिमों में अब यह आम धारणा है कि केंद्र सरकार उनके हितों को सुरक्षित नहीं रखेगी। एक लोकतांत्रिक और देखभाल करने वाली सरकार अपने लोगों तक पहुंचती है और उनसे संवाद करती है। पिछले दो महीनों के दौरान ऐसा कुछ नहीं हुआ है।

इसका अपरिहार्य प्रभाव अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। पिछले कुछ महीनों के दौरान दुनियाभर में भारत की प्रतिष्ठा पर आंच आई है, यूरोपीय संघ, अमेरिकी कांग्रेस की कमेटियों और संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी संस्थाओं के बयान इसका सबूत हैं। अनेक देशों ने भारत को निजी तौर पर अपनी चिंताओं से अवगत कराया है।

विकसित दुनिया के सांसद, निवेशक और ओपिनयन मेकर टाइम, द इकोनॉमिस्ट, द न्यूयॉर्क टाइम्स और वॉल स्ट्रीट जर्नल पढ़ते हैं, जो कि तीखी आलोचना कर रहे हैं। भारत एक अघोषित धर्मतंत्र की तरह व्यवहार कर सकता है या एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की तरह। वह जिस तरह भी रहे, भारतीय लोगों और विशेष रूप से भारतीय अर्थव्यवस्था पर उसका व्यापक प्रभाव पड़ेगा। 
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