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अब जर्मनी को पछाड़ने की चुनौती: भारत अद्वितीय स्थिति में है; मूलभूत चुनौतियों को दूर करने पर ध्यान देना होगा

अजय बग्गा
Updated Mon, 02 Jun 2025 05:38 AM IST

सार

विकास के समान चरणों में अमेरिका, चीन, जापान और जर्मनी की भारत से तुलना की जाए, तो आज भारत एक अद्वितीय स्थिति में दिखता है। जर्मनी को पीछे छोड़ने के लिए भारत के पास सभी अनुकूल परिस्थितियां हैं, लेकिन इसके लिए कुछ मूलभूत चुनौतियों को दूर करने पर ध्यान केंद्रित करना होगा।
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भारतीय अर्थव्यवस्था। - फोटो : amarujala


भारत ने अपनी जीडीपी को बढ़ाने में लंबी छलांग लगाई है। भारतीय अर्थव्यवस्था 2014 में दसवें नंबर पर थी और वर्तमान के बेहद चुनौतीपूर्ण हालात में, जब वैश्विक व्यापार युद्ध और भू-राजनीतिक जोखिम दुनिया भर में मंदी के कारण बन रहे हैं, तब भी वह दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बनी हुई है। इतिहास पर नजर डालें, तो भारत की 4,187 अरब डॉलर की मौजूदा जीडीपी विकास के समान चरणों में अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं से तुलना करने पर इसे एक अद्वितीय स्थान पर रखती है। वर्ष 1985 में अमेरिका की जीडीपी 4,300 अरब डॉलर थी, जो दर्शाती है कि भारत चार दशक बाद तुलनात्मक आर्थिक स्तर पर पहुंच गया है। चीन से तुलना करें, तो वर्ष 2007 में चीन की जीडीपी करीब 4,300 अरब डॉलर थी, जो बीते अठारह वर्षों में चीन की तीव्र प्रगति को दर्शाती है, जिससे उसकी मौजूदा जीडीपी 18,000 अरब डॉलर पहुंच गई है। वर्ष 1993 में जापान की अर्थव्यवस्था का मूल्य लगभग 4,300 अरब डॉलर था, जो इस बात की चेतावनी देता है कि कैसे आर्थिक ठहराव और 1980 के दशक के रियल एस्टेट व शेयर बाजार के बुलबुले के फटने से लगभग चार दशकों तक वहां ठहराव की स्थिति बनी रही। वर्ष 2021 में जर्मनी की जीडीपी लगभग 4,400 अरब डॉलर थी। इसलिए जीडीपी के इस स्तर तक पहुंचने के संदर्भ में भारतीय अर्थव्यवस्था अमेरिका से करीब चालीस वर्ष, चीन से अठारह वर्ष, जापान से 32 वर्ष और जर्मनी से चार वर्ष पीछे है।


लिहाजा भारत के लिए वैश्विक आर्थिक सोपान में आगे बढ़ने की अपार संभावनाएं हैं। भारत का जीडीपी के आधार पर चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में उभरना इसकी घरेलू अर्थव्यवस्था और पूंजी बाजारों के लिए अथाह निहितार्थ रखता है। प्रमुख आर्थिक शक्ति के रूप में भारत अधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को आकर्षित कर रहा है, जिससे प्रौद्योगिकी, ढांचागत सुविधाओं, फिनटेक, स्वास्थ्य तकनीक और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों को बढ़ावा मिल रहा है। भारत की आर्थिक वृद्धि का लाभ पूंजी के प्रवाह में बढ़ोतरी के रूप में परिलक्षित होगा, क्योंकि विदेशी निवेशक विकास की चुनौती से जूझ रहे विश्व में भारत की वृद्धि से फायदा उठाना चाहेंगे। भारत की बेहतर आर्थिक स्थिति से क्रेडिट रेटिंग पर सकारात्मक असर पड़ने की उम्मीद बंधती है, जिससे उधार लेने की लागत कम होगी और बुनियादी ढांचे के विकास में मदद मिलेगी। भारतीय शेयर बाजार में निवेशकों की रुचि बढ़ने से बाजार पूंजीकरण और अधिक तरलता प्राप्त होगी। आर्थिक स्थितियों को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक विकास को प्रोत्साहित करने के लिए ब्याज दरों में और कटौती कर सकता है। तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के लिए भारत को विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक सुधार करने होंगे। फिलहाल जी-20 देशों में भारत की श्रम उत्पादकता सबसे कम है। इस समस्या के समाधान के लिए कार्यबल की दक्षता बढ़ाने हेतु कौशल विकास, शिक्षा और तकनीक में निवेश की जरूरत है। 


‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘पीएलआई योजना’ जैसी पहलों के बावजूद नौकरशाही की बाधएं और पुराने नियमों जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। विनिर्माण क्षेत्र को पुनर्जीवित करने के लिए भूमि अधिग्रहण प्रक्रियाओं में सुधार और विनियमन आवश्यक हैं। नीति निर्माताओं को हर चीज का निर्माण करने की कोशिश करने के बजाय रणनीतिक रूप से उन क्षेत्रों की पहचान करने की जरूरत है, जिनमें भारत तुलनात्मक रूप से बेहतर है। परिवहन, ऊर्जा और डिजिटल कनेक्टिविटी सहित बुनियादी ढांचों का आधुनिकीकरण आर्थिक गतिविधियों को समर्थन देने और निवेश आकर्षित करने के लिए महत्वपूर्ण है। निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए अप्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष कर व्यवस्था में महत्वपूर्ण सुधार करने होंगे। वित्तीय संस्थानों की दक्षता और पारदर्शिता बढ़ाने से भी सतत आर्थिक विकास के अनुकूल माहौल बनेगा। 


इसके अलावा, तीसरे स्थान पर पहुंचने के लिए भारत को श्रम उत्पादकता बढ़ाने, विनिर्माण क्षेत्र का पुनरुद्धार करने, बुनियादी ढांचे का आधुनिकीकरण करने, कर सुधारों को लागू करने और वित्तीय क्षेत्र को मजबूती देने पर ज्यादा ध्यान देना होगा। इन सुधारों के प्रति निरंतर प्रतिबद्धता के साथ भारत एक अग्रणी वैश्विक आर्थिक शक्ति के रूप में अपनी क्षमता का एहसास करा सकता है। जैसे-जैसे भारत इस राह पर आगे बढ़ रहा है, आय और क्षेत्रीय असमानताओं जैसी चुनौतियों का समाधान करना जरूरी है, ताकि आर्थिक विकास के लाभों को व्यापक रूप से साझा किया जा सके। समावेशी विकास रणनीतियां दीर्घकालिक आर्थिक विकास को बनाए रखने और निकट भविष्य में तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए महत्वपूर्ण होंगी। 


हालांकि, भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के लिए तैयार है, फिर भी भारत और जापान के बीच जीवन स्तर, सामाजिक, आर्थिक और भौतिक अवसंरचना में बहुत बड़ा अंतर है। आईएमएफ के डाटा से पता चलता है कि भारत की वर्तमान प्रति व्यक्ति जीडीपी 2,880 डॉलर है, जो जापान के 33,960 डॉलर का एक अंश है। जीडीपी का लाभ पूरी आबादी में समान रूप से वितरित करने और प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने की चुनौती है। दूरदर्शी सरकारी नीतियों के साथ-साथ भारत के युवा, शिक्षित और कम लागत वाले कार्यबल के जनसांख्यिकीय लाभ भारत के तुलनात्मक लाभों को आगे बढ़ा सकते हैं, जिससे आगामी तीन वर्षों में जर्मनी को पीछे छोड़कर तीसरे नंबर की अर्थव्यवस्था बनने में मदद मिलेगी।     

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