फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

जानना जरूरी है: यदुकुल व दैत्य-वंश का कैसे हुआ मेल? भगवान शिव और श्रीकृष्ण से जुड़ी है कथा...

आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 01 Jun 2025 09:22 AM IST

सार

भगवान शंकर बोले, ‘प्रभु! बाणासुर, राजा बलि का पुत्र है। मैंने इसे अमरत्व का वरदान दिया है। हे यदुश्रेष्ठ! आप मेरे वरदान की रक्षा करें और उसे क्षमा कर दें।’ इसके बाद बाणासुर की बेटी का श्रीकृष्ण के पौत्र से विवाह हो गया।
विज्ञापन
विज्ञापन
यदुकुल व दैत्य-वंश का कैसे हुआ मेल - फोटो : अमर उजाला प्रिंट


इसके बाद चित्रलेखा, कुछ दैत्य मायाविनी स्त्रियों को साथ लेकर द्वारका गई और रात्रि के समय उसने सोए हुए अनिरुद्ध को माया से मोहित करके उषा के पास सुला दिया। सुबह अनिरुद्ध ने स्वयं को अत्यंत रमणीय पलंग पर सोया हुआ पाया। पास ही समस्त शुभ लक्षणों से युक्त सुवर्ण के समान रंग और सुंदर केशों वाली उषा बैठी हुई थी। तब से उषा और अनिरुद्ध साथ रहने लगे। एक दिन अंतःपुर की कुछ बूढ़ी स्त्रियों ने बाणासुर को इसकी सूचना दे दी। समाचार सुनते ही राजा की आंखें क्रोध से लाल हो गईं। उसने तुरंत सेवकों को भेजकर अनिरुद्ध को दरबार में आने का आदेश दिया। सेवक, अनिरुद्ध को पकड़ने के लिए जैसे ही आगे बढ़े, अनिरुद्ध ने महल का खंभा उखाड़कर सेवकों को मार भगाया। बाणासुर को यह समाचार मिला, तो उसे अनिरुद्ध के विषय में जानने की उत्सुकता हुई।


चकर बाणासुर को बताया कि अनिरुद्ध, श्रीकृष्ण का पौत्र है। यह सुनकर वह अनिरुद्ध को पकड़ने के लिए चल पड़ा और सर्पास्त्र चलाकर उसने अनिरुद्ध को बांधकर अपने महल में कैद कर लिया।उसी समय देवर्षि नारद ने वहां पहुं

देवर्षि नारद ने अनिरुद्ध के कैद होने की बात द्वारका में जा बताई, तो श्रीकृष्ण, बलराम, प्रद्युम्न आदि सेना लेकर बाणासुर को मारने के लिए पहुंच गए। पूर्वकाल में बलि-पुत्र बाणासुर की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उसे वरदान दिया था कि वे स्वयं बाणासुर के नगर-द्वार की रक्षा करेंगे। इसलिए जब श्रीकृष्ण सेना लेकर बाणासुर के नगर में पहुंचे, तो भगवान शंकर, कृष्ण से युद्ध करने पहुंच गए। वे कपाल धारण किए, शरीर पर विभूति रमाए और सर्पों का आभूषण पहने और हाथ में त्रिशूल लिए हुए थे। उनके साथ उनके भूतगण भी मौजूद थे।



भगवान शिव को सामने देखकर श्रीकृष्ण ने अपनी सेना को रोक दिया और स्वयं, बलभद्र एवं प्रद्युम्न सहित शंकर जी के साथ युद्ध करने लगे। दोनों में घोर युद्ध हुआ। पिनाक और शार्ङ्ग धनुष से छूटे बाण प्रलयाग्नि के समान भयंकर जान पड़ते थे। बलराम, गणेश के साथ और प्रद्युम्न, कार्तिकेय के साथ युद्ध करने लगे। दोनों पक्षों के योद्धा पराक्रमी और बलवान थे। परंतु बलराम के हल और मूसल के सामने शिव के गण ज्यादा देर टिक नहीं पाए। यहां तक कि उन्होंने गणेश और कार्तिकेय को भी परास्त करके वापस भेज दिया। शिव और कृष्ण बहुत देर तक युद्ध करते रहे। शिव ने क्रोध में आकर अपने बाण पर तापज्वर का आधान किया और उसे श्रीकृष्ण पर छोड़ दिया, किंतु श्रीकृष्ण ने शीतज्वर से उस अस्त्र का निवारण कर दिया।


इसके बाद दैत्यराज बाणासुर रथ पर सवार होकर भगवान श्रीकृष्ण के साथ युद्ध करने के लिए आया, भगवान ने अपने चक्र से उसकी भुजाएं काट डालीं। यह देखकर भगवान शंकर बोले, ‘प्रभु! बाणासुर, राजा बलि का पुत्र है। मैंने इसे अमरत्व का वरदान दिया है। यदुश्रेष्ठ! आप मेरे वरदान की रक्षा करें और बाणासुर के अपराधों को क्षमा कर दें।’ शिव का आग्रह सुनकर भगवान श्रीकृष्ण ने बाणासुर को छोड़ दिया। इसके बाद भगवान शंकर, वृषभ पर सवार हो कैलाश पर चले गए। फिर बाणासुर ने महाबली बलराम और श्रीकृष्ण को नमस्कार किया और अनिरुद्ध को मुक्त कर दिया। तत्पश्चात बाणासुर ने दिव्य वस्त्राभूषणों से पूजा करके कृष्ण-पौत्र अनिरुद्ध का अपनी कन्या उषा के साथ विवाह करा दिया। अनिरुद्ध का विधिपूर्वक विवाह हो जाने के पश्चात बाणासुर ने प्रद्युम्न सहित बलराम और श्रीकृष्ण का पूजन किया। फिर भगवान कृष्ण, उषा और अनिरुद्ध को दिव्य रथ पर बिठाकर द्वारका की ओर चल पड़े। वहां कृष्ण-पौत्र अनिरुद्ध, बाणासुर की पुत्री और अपनी पत्नी उषा के साथ सुखपूर्वक निवास करने लगे।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next