लोकसभा का यह चुनाव भारतीय राजनीति के लिए बहुत महत्वपूर्ण साबित होने जा रहा है। टिकट मिलने या न मिलने, नेता की नजर में चढ़ने या गिरने, सत्ता में हिस्सेदारी की संभावना बनने या बिगड़ने के कारण गुस्से, इस्तीफों तथा नए आश्चर्यजनक गठबंधनों का दौर अभी तेज चलेगा। मगर मतभेदों से परे एक और गंभीर पक्ष है, राजनीतिक हिंसा। अमेरिका या चीन की राजनीति में शिखर नेताओं पर हुए खतरनाक हमलों की तरह भारत की राजनीति भी विषाक्त है। अब्राह्म लिंकन, जॉन एफ कैनेडी, इंदिरा गांधी और बेनजीर भुट्टो की जीवन ज्योति उनके राजनीतिक जीवन के चरम पर बुझा दी गई। आजादी के बाद से राजनीतिक हत्याओं का दौर भारत के राजनीतिक जीवन को भी लहूलुहान करता आया है।
भारत को आजादी मिले छह महीने भी नहीं हुए थे कि महात्मा गांधी की हत्या ने दुनिया को हिला दिया। वर्ष 1953 में कश्मीर की शेष भारत के साथ एकता का आंदोलन करने वाले डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की श्रीनगर की जेल में रहस्यमय मृत्यु हो गई थी। उसे अटल बिहारी वाजपेयी ने शेख और नेहरू की दुरभिसंधि से की गई राजनीतिक हत्या बताया था। उसकी तो जांच तक नहीं की गई, जबकि श्यामा प्रसाद मुखर्जी नेहरू सरकार में पहले उद्योग मंत्री और भारतीय जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष थे। जनसंघ के दूसरे अध्यक्ष पंडित दीनदयाल उपाध्याय 1968 में मुगलसराय स्टेशन पर मृत पाए गए थे। उनकी रहस्यमय हत्या की साधारण जिला स्तरीय जांच हुई।
पंजाब के ताकतवर मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों की 1965 में रोहतक में हत्या कर दी गई और इसका कारण व्यक्तिगत दुश्मनी बताया गया। तब यह मुद्दा भी उठा था कि अधिनायकवादी तौर पर काम करने वाले कैरों के राजनीतिक शत्रुओं की क्या कमी हो सकती है। फिर नागरवाला हत्याकांड हुआ। नागरवाला ने कथित तौर पर इंदिरा गांधी की आवाज बदलकर स्टेट बैंक से 60 लाख रुपये निकलवाए थे। नागरवाला पकड़े गए और हिरासत में ही संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाए गए और बाद में इस मामले में जांच कर रहे अधिकारी की भी रहस्यमय मृत्यु हो गई।
वर्ष 1975 में इंदिरा गांधी मंत्रिमंडल के शक्तिशाली सदस्य ललित नारायण मिश्र की समस्तीपुर में रहस्यमय ढंग से हत्या कर दी गई। वर्ष 1984 और 1991 में देश के शीर्षस्थ नेताओं क्रमशः इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की घृणित हत्याओं से देश और दुनिया हिल गई थी। श्रीमती गांधी को उन्हीं के अंगरक्षक ने ऑपरेशन ब्लू स्टार के प्रतिशोध के नाम पर शहीद किया, तो उनके सुपुत्र राजीव गांधी को तमिल उग्रवादियों ने श्रीपेरुम्बुदूर में साजिश का शिकार बनाया।
इसी क्रम में पिछले साल कांग्रेसी नेताओं पंडित विद्याचरण शुक्ल और महेंद्र कर्मा की माओवादियों द्वारा हत्या कर दी गई। देश में राजनीतिक और वैचारिक मतभेद को बंदूक की गोली से सुलझाने वालों में माओवादी सबसे दुर्दांत साबित हुए। केरल और आंध्र प्रदेश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जनसंघ, भाजपा और विहिप के कुल दो सौ से भी अधिक कार्यकर्ता अतिवादी वाम विचारधारा के कार्यकर्ताओं के हमलों में जान गंवा बैठे। पिछले ही साल पटना में नरेंद्र मोदी की रैली से ठीक पहले आठ विस्फोट हुए, जिनमें छह लोगों की जान गई। राजनीतिक हिंसा की साजिशों में इस चुनावी दौर की यह सबसे बड़ी घटना थी।
सिर्फ उम्मीद ही की जा सकती है कि भारतीय राजनीति का कलेवर बदलने वाला यह चुनाव हिंसा, प्रतिशोध और षड्यंत्रों से दूर रहेगा। भारतीय गुप्तचर एजेंसियों, सुरक्षा बलों तथा कानून-व्यवस्था लागू करने वाली मशीनरी पर यह सुनिश्चित करने की बहुत बड़ी जिम्मेदारी है।