अन्ना जी की बरगदी छाया तले आम आदमी का पौधा जंतर मंतर पर पनपा। जन लोकपाल की हवा और धरनों-अनशनों का खाद-पानी पाते-पाते दिल्ली विधानसभा के ढांचे में विकसित हुआ। उम्मीद के बौर महकने लगे। मधुमक्खियां मंडराने लगीं। अमिया के पनपने का विश्वास जगा। लेकिन तत्काल पुरानी पार्टियों की आंधी शुरू हो गई। नतीजतन पर्यावरण प्रदूषित होने लगा। इससे पहले कि फल रूप लेकर आम परिपक्व होता, पेड़ की जड़ में चुनावी राजनीति के दूषित कीड़े पनपने लगे।
पेड़ की डाल-पात पर फफूंद पसर गई। महत्वाकांक्षा के कीड़े, ईर्ष्यालु-निंदक-मौकापरस्त कीड़े, ड्रामेबाजी-नखरे-फरेब के कीड़े, जातिवादी-धर्मोन्मादी, छद्म सेक्यूलर कीड़े, रूठने-मनाने के नाराज कीड़े, नृशंस वंशवादी-धंधेबाज माफिये के कीड़े, चापलूसी-टिकटों की बंदरबांट एवं दलबदलू कीड़े, गाली-गलौज-व्यंग्य-तंज के कीड़े, घमंड-टकराव के अराजक तत्वों वाले कीड़े डाल-पात पर कुलबुलाने लगे, तो पेड़ को खोखला कर मरने को छोड़ देने की नीयत झलकने लगी। ऐसे में, देश-समाज की नियति बिगड़ेगी ही।
आम के इस संभावनाशील पेड़ पर फल लगने के दिन आने को हुए कि मा फलेषु कदाचन की गीतोक्ति पर चलता परिवर्तनकामी जनगण का नुमाइंदा इस उम्मीद से सम्मोहित हुआ जा रहा था कि आम पकने को है। मगर आदमी की फितरत बदल ही नहीं रही।
अभी तो पौधे से पूर्ण पेड़ बनने की प्रक्रिया यानी गोड़ाई-निराई होनी थी, कीटनाशक रसायनों का छिड़काव होना था, पेड़ में काटछांट भी जरूरी थी। इसे युवा पेड़ होना है, इसके बौर का महकना शेष है, फिर कोयल का कुहकना है, इसके वास्ते पेड़ को कोशिश करनी है ऊपर उठने की, ताकि आम आदमी की उम्मीदें दौड़ती रहें। आम की इस उदीयमान फसल को भीतरी-बाहरी कीड़ों से महफूज रखना जरूरी है। पर यहां पत्थरबाजी के दृश्य बनने लगे हैं। ऐसे में, कैसे विकसित होगा यह पेड़? आम कैसे पकेगा? कब रसवान होकर टपकेगा? जनता का धैर्य चुकने लगे, तो फिर किसी और को दोष न देना।