राजनीति को साफ-सुथरा बनाने के लिए हाल के दिनों में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ ऐतिहासिक फैसले दिए हैं। इनमें चुनाव आयोग को मतदाताओं को उम्मीदवारों की नापसंदगी का विकल्प ईवीएम में देने का फैसला भी काफी अहम है। इसे राइट टू रिजेक्ट की पहली सीढ़ी के तौर पर भी देखा जा रहा है। इस बारे में चुनाव आयोग के पूर्व सलाहकार और अपनी कड़क ख्याति के लिए मशहूर रहे के जे राव से विजय गुप्ता ने बातचीत की-
सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीदवारों की नापसंदगी का विकल्प देने के लिए वोटिंग मशीन में उपरोक्त में से कोई नहीं (नोटा) लागू करने का जो फैसला दिया है, उससे क्या असर पड़ेगा?
नोटा का तुरंत चुनावों या प्रत्याशियों पर कोई असर नहीं पड़ेगा, मगर इसका आम जनमानस में अच्छा संदेश जाएगा। उच्चतम न्यायालय के इस फैसले से मतदाता को अपना रोष व्यक्त करने और सभी उम्मीदवारों को ठुकराने का एक विकल्प मिला है। अब मतदाता यह संदेश दे सकता है कि हमें उम्मीदवारों या उनकी पार्टियों की नीतियां नापसंद हैं। इससे राजनीतिक दलों को कड़ा संदेश मिलेगा कि क्या वजह है कि लोग उन्हें स्वीकार नहीं कर रहे हैं। इससे सभी पार्टियों पर ज्यादा जवाबदेह होने का दबाव बढ़ेगा।
नकारात्मक वोटिंग अधिक होने से चुनाव परिणाम भी प्रभावित हो सकता है क्या?
अभी अनेक मतदाता उम्मीदवार, पार्टी या पार्टी की नीतियां पसंद न होने के कारण घर से नहीं निकलते और वोट नहीं देते हैं। इससे अपेक्षित वोटिंग नहीं हो पाती। उसमें खासा सुधार होने की उम्मीद है, क्योंकि अब मतदाता कम से कम नोटा का प्रयोग करने के लिए तो घर से बाहर निकलेंगे। अलबत्ता इससे चुनाव परिणामों पर इसलिए भी कोई असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि इस संबंध में न ही शीर्ष अदालत ने कोई दिशा-निर्देश जारी किया है और न ही कोई कानून बनाया गया है।
जब चुनाव परिणाम पर इसका कोई असर ही नहीं पड़ेगा, तो नोटा से मतदाताओं को क्या फायदा होगा?
बात लाभ या हानि की नहीं है। बल्कि चुनाव सुधार और मतदाता को अधिकाधिक अधिकार देने की है। भले ही अभी इसका असर चुनाव परिणाम पर नहीं पड़ेगा, लेकिन यदि कहीं नोटा का प्रतिशत अधिक हुआ, तो राजनीतिक दलों पर यह दबाव बनेगा कि वे ऐसे प्रत्याशी को मैदान में उतारें, जिन्हें लोग पसंद करते हों।
यदि आगामी चुनावों में नकारात्मक वोटिंग का अनुपात बढ़ता है, तो क्या चुनाव आयोग राइट टू रिजेक्ट जैसे अधिकारों पर विचार करेगा?
चुनाव सुधार के लिए राइट टू रिजेक्ट जैसे विकल्प देने के लिए चुनाव आयोग तैयार है। लेकिन इसके लिए सरकार को कानून बनाना होगा।
हाल के दिनों में दिखा है कि चुनाव सुधार के लिए जो कदम चुनाव आयोग को उठाने चाहिए, उस पर उच्चतम न्यायालय को निर्णय लेना पड़ रहा है। ऐसा क्यों?
नहीं, ऐसा नहीं है। भले ही नोटा पर अमल शीर्ष अदालत के आदेश पर हो रहा है, लेकिन चुनाव सुधार की दिशा में चुनाव आयोग पिछले एक दशक से लगातार कार्यरत है। हाल के वर्षों में उसकी दमदार मौजूदगी इसी का संकेत है।
राजनीति में अपराधियों को आने से रोकने और धन के बेहिसाब इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए चुनाव आयोग की पहल अब तक परवान क्यों नहीं चढ़ पा रही?
चुनाव आयोग पहल नहीं कर रहा, ऐसा कहना मुनासिब नहीं होगा। आयोग ने सख्त कायदे कानून बनाए हैं और उस पर सख्ती से पालन भी कराया जाता है। लेकिन जब तक इस मामले पर स्वयं राजनीतिक पार्टियां नहीं विचार करेंगी, तब तक चुनावों में अपराधियों और धन के बेहिसाब इस्तेमाल पर रोक लगाना संभव नहीं है।