प्रधानमंत्री पद के लिए भाजपा के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों राजधानी दिल्ली में छात्रों को संबोधित करते हुए ऐलान किया- पहले शौचालय, फिर देवालय! याद रहे कि कुछ महीने पहले केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने भी ऐसी ही बात कही थी। उस समय भाजपा के प्रवक्ताओं ने कहा था कि ऐसी टिप्पणियों से, ‘धर्म और आस्था का बारीक ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो जाएगा।’ यह संघ-भाजपा की दोरंगी नीति का ही एक और उदाहरण है।
फिर भी इस तरह के दावों को कुछ गंभीरता से लिया जा सकता था, बशर्ते कि साफ-सफाई (सैनीटेशन) के पहलू से भी भाजपा के राज में गुजरात का रिकॉर्ड बहुत ही खराब नहीं रहा होता। 2012-13 की भारतीय ग्रामीण विकास रिपोर्ट यह दिखाती है कि हमारे देश में हर पांच ग्रामीण परिवारों में से एक में तीन बुनियादी सुविधाओं- पीने का पानी, बिजली तथा सैनीटेशन में से एक भी नहीं है, जबकि करीब 18 फीसदी घरों में ये तीनों सुविधाएं हैं। गुजरात की स्थिति इस मामले में भी कोई अच्छी नहीं है और वहां सिर्फ एक-चौथाई परिवारों को ये तीनों सुविधाएं हासिल हैं, जबकि केरल में 71 फीसदी परिवारों को। इस मानदंड से देश के 13 और राज्य हैं, जो गुजरात से बेहतर स्थिति में हैं।
सफाई का काम करने वालों के लिए संघर्ष करने वाले समुदाय-आधारित संगठन, मानव गरिमा ने पिछले ही दिनों जब एक सर्वे किया, तो पता चला कि खुद अहमदाबाद नगर निगम के तत्वावधान में अब भी 126 जगहों पर हाथ से पाखानों की सफाई चल रही है। यह सब 1993 के उस कानून के बावजूद चल रहा है, जिसमें इस तरह की सफाई का काम कराने के लिए सजा का प्रावधान किया गया है।
इस तरह की दोरंगी नीति को, भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को कॉरपोरेट के एक हिस्से से मिल रहे खुले समर्थन के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए। उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में पेश किया जा रहा है, जो बिना किसी हिचकिचाहट के और आक्रामक तरीके से, नवउदारवादी आर्थिक सुधारों के एजेंडा को आगे बढ़ाएगा। इस सिलसिले में जरा अटल बिहारी वाजपेयी की भाजपा के नेतृत्ववाली एनडीए सरकार को भी याद करें, जिसने ऐसे ही ‘इंडिया शाइनिंग’ और ‘फील गुड फैक्टर’ की हवा बांधी थी। लेकिन, इस सबके जरिये उन्होंने एक देश की सीमाओं में दो देश खड़े करने और उनके बीच की खाई और चौड़ी करने की प्रक्रिया को ही मजबूती दी थी।
इसकी पुष्टि इसी सितंबर में एक ही दिन एक साथ आईं दो खबरों से होती है। पहली खबर एक विश्व संपदा तथा निवेश रिपोर्ट की थी, जो दिखाती थी कि अति-धनी व्यक्तियों की संख्या में बढ़ोतरी के मामले में, जिसमें 10 लाख डॉलर से ज्यादा की निवेश परिसंपत्तियों के स्वामी आते हैं, भारत, दुनिया भर में दूसरे नंबर पर था। 2012 में भारत में ऐसे धनिकों की संख्या में 22.2 फीसदी की बढ़ोतरी हुई थी और उनकी संपदा 23.4 फीसदी बढ़ी थी। इन 1,53,000 अति-धनिकों की कुल परिसंपत्तियां 5,89 अरब डॉलर की थीं, यानी हमारी आबादी के इस 0.001275 फीसदी हिस्से की परिसंपत्तियां, हमारे देश के सकल घरेलू उत्पाद के एक-तिहाई से आधे हिस्से के बीच में बैठेंगी!
दूसरी खबर, अखिल भारतीय ग्रामीण विकास रिपोर्ट की थी, जो बताती है कि खेती में स्वरोजगार में लगे लोगों यानी काश्तकारों का अनुपात घट रहा है, जबकि बड़ी संख्या में लोग गैर-कृषि कार्यों की ओर खिसक रहे हैं, हालांकि उन्हें काम की कोई सुरक्षा हासिल नहीं है। विनिर्माण के क्षेत्र में लगे लोगों में भी कई पूरी तरह अस्थायी हैं, जिन्हें कोई सुरक्षा हासिल नहीं है। रिपोर्ट दिखाती है कि खेती में सार्वजनिक निवेश कृषि के सकल घरेलू उत्पाद के करीब तीन फीसदी के स्तर पर ही रुका रहा है और इसका परिणाम खेती में पैदा हुआ संकट, किसानों की बढ़ती आत्महत्याओं में देखा जा सकता है। 1995 में अगर 10,700 किसानों ने हताशा में आत्महत्या की थी, तो 2009 तक यही संख्या बढ़कर 17,000 से ऊपर निकल गई थी। इनमें से ज्यादातर आत्महत्याओं के लिए कर्ज के बोझ और फसल की बर्बादी को जिम्मेदार माना गया है। कुपोषण का अभिशाप ग्रामीण भारत को खाए जा रहा है। कैलोरी आहार के आंकड़ों से पता चलता है कि 2,153 कैलोरी की खुराक वर्ष 2009-10 में घटकर 2,020 रह गई, जो बदहाली को ही दिखाती है, क्योंकि अधिकतर लोग अपनी इच्छा से तो कम खुराक ले नहीं रहे हैं।
यह रिपोर्ट बताती है कि स्वास्थ्य के मामले में भी भारत की स्थिति काफी खराब है। कोई 28 फीसदी लोगों का इलाज नहीं हो पाता है, क्योंकि वे इसका खर्च नहीं उठा सकते हैं। अनुसूचित जातियों/जनजातियों के मामले में यह अनुपात और ज्यादा है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों में प्रवेश की ऊंची दर के बावजूद इस रिपोर्ट के अनुसार स्कूली शिक्षा हासिल करनेवाले छात्रों में सीखने का स्तर काफी खराब है। कक्षा पांच के आधे से भी कम छात्र अक्षर तथा शब्द और कक्षा एक तथा दो की पुस्तकें पढ़ पाने में सक्षम पाए गए। कक्षा आठ के आधे से कम छात्र संख्याओं की पहचान करने और जोड़-घटाव करने में सफल हुए।
यह है दो भारतों की सच्चाई, जिसकी पुष्टि आधिकारिक रिपोर्टें करती हैं। और यही वह रास्ता है, जिस पर कॉरपोरेट भारत आक्रामकता से आगे बढ़ना चाहता है, और जो यह उम्मीद लगाए बैठा है कि भाजपा का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार इसे कर दिखाएगा।