प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अच्छे दिन आने के वायदे के साथ ही शुरू से 100 स्मार्ट सिटी बनाए जाने की काफी बातें भी हो रही हैं। मगर सेफ सिटीज यानी सुरक्षित शहरों के बारे में क्या कहा जाए? आखिर इसे प्रमुख राजनीतिक मुद्दों में शुमार क्यों नहीं होना चाहिए? भारत में तेज शहरीकरण हो रहा है।
देश की एक अरब से अधिक की आबादी में तीस करोड़ से अधिक लोग शहरों और कस्बों में रहते हैं। लेकिन हम शहरों को सुरक्षित बनाने के लिए क्या कर रहे हैं? पिछले हफ्ते दिल्ली में ऑनलाइन टैक्सी कंपनी उबर की एक टैक्सी में एक युवा महिला के साथ हुई कथित बलात्कार की घटना ने एक बार फिर देश की महिलाओं और लड़कियों की सबसे बड़ी चिंता यानी उनकी सुरक्षा की ओर ध्यान खींचा है।
दो वर्ष पूर्व दिसंबर की ऐसी ही एक सर्द रात को एक चलती बस में एक युवती के साथ सामूहिक बलात्कार की बर्बर घटना हुई थी, जिसमें बाद में उस युवती की मौत तक हो गई। इस जघन्य घटना ने पूरे देश को तो उद्वेलित किया ही, दुनिया का भी ध्यान अपनी ओर खींचा था। हजारों लोग सड़कों पर उतर आए थे। लोगों के भारी दबाव के बीच न्यायिक आयोग का गठन किया गया। और अंततः भारत को एक नया बलात्कार विरोधी सख्त कानून मिला। उस वक्त महिलाओं की सुरक्षा को लेकर ढेर सी बातें की गईं।
आज, फिर से वही बहस छिड़ी हुई है। फिर से माहौल में वैसा ही भय साया है। दिल्ली, देश की राजधानी को ही देखिए। पिछले कुछ वर्षों में इस शहर में आई वैश्विक पूंजी ने दिल्ली को काफी बदला है। अब यहां ढेरों फ्लाई ओवर नजर आते हैं। सड़कें चौड़ी हो गई हैं।
इस महानगर में कुकुरमुत्तों की तरह मॉल बन गए हैं। इसके साथ ही फेसबुक और सोशल मीडिया की आभासी दुनिया में संवाद फैलता जा रहा है। रू-ब-रू होते संवाद की गुंजाइश सिमटती जा रही है। कई लोग कहते हैं कि यह शहर तेजी से आगे बढ़ रहा है। लेकिन इसका एक स्याह पक्ष भी है। 16 दिसंबर, 2012 को हुई उस सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद 2012 से 2013 के दौरान दिल्ली में बलात्कार के दोगुना मामले दर्ज किए गए।
पुलिस कहती है कि ऐसा रिपोर्ट अधिक दर्ज करने के कारण है। मगर मैं जिन युवा महिलाओं को जानती हूं उनमें से अधिकांश की राय है कि वह इस शहर को सुरक्षित नहीं मानतीं। अक्सर दिल्ली को महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक जगह की संज्ञा दी जाती है। मगर सुरक्षा के अधिकार की मांग सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं है।
अमूमन महिलाओं के लिए भारत का सबसे सुरक्षित शहर माने जाने वाली मुंबई ने भी यौन हिंसा की वजह से ध्यान खींचा है। पिछले वर्ष एक महिला फोटो पत्रकार को उस वक्त सामूहिक बलात्कार का शिकार बनाया गया,जब वह अपने एक पुरुष साथी के साथ काम पर थी। उस युवती ने पुलिस को बताया था कि हमलावरों ने बीयर की टूटी बोतल से उसके सिर पर वार किया था, ताकि वह मदद की गुहार न लगा सके।
दिल्ली और मुंबई में हुए हमले बताते हैं कि बलात्कार विरोधी कड़े कानून के बावजूद महिलाएं आज भी कितनी असुरिक्षत हैं। वहीं छोटे शहरों की स्थितियों पर तो ध्यान ही नहीं जाता। तो फिर क्या किया जाना चाहिए?
दिल्ली में कैब ड्राइवर द्वारा एक युवती के साथ किए गए बलात्कार की घटना के बाद से इस विषय पर काफी बहस हुई है। हम सब जानते हैं कि उबर कंपनी में काफी गड़बड़ियां रही हैं। इसके साथ ही सरकारी एजेंसियों में भी काफी गड़बड़ियां हैं। जो लोग भी इसके लिए जिम्मेदार हैं, उन्हें कड़ी सजा मिलनी चाहिए। घूसखोरी कड़े से कड़े कानून को बेअसर कर सकती है। नतीजतन कोई भी फर्जी सिम कार्ड और फर्जी चरित्र प्रमाण पत्र खरीद सकता है।
मगर हम सिर्फ व्यवस्था पर दोष मढ़ने तक सीमित न रहें। दरअसल यह व्यवस्था हम सबकी बनाई हुई है। हम सब इस व्यवस्था का हिस्सा हैं। इसे बदलने के लिए और हमारे शहरों को लड़कियों और महिलाओं के लिए सुरक्षित बनाने के लिए हम सबको मुखर होना पड़ेगा। बलात्कार के अधिकतर मामलों में देखा गया है कि हमलावर कोई अनजाना नहीं होता।
हमें अपने तौर तरीके बदलने होंगे। आखिर हम अपने बेटे और बेटियों की परवरिश किस तरह करते हैं, यह भी देखना होगा। हमें अपने जनप्रतिनिधियों और सेवा प्रदाताओं को भी जिम्मेदार बनने के लिए दबाव बनाना होगा। आखिर सुरक्षा अधिकार है। वह देश आगे नहीं बढ़ सकता, जिसकी आधी आबादी को भय के साथ जीना पड़े। हमें उन महिलाओं का सम्मान करना होगा, जिन्होंने भयानक अनुभवों के बावजूद अपनी आवाज बुलंद की है या कर रही हैं।
बलात्कार या यौन हमला एक भयावह चीज है। जिनके साथ ऐसे हादसे होते हैं और जो इनके खिलाफ आवाज उठाती हैं उनके प्रति नजरिया बदलना होगा। ऐसी कोई भी पीड़िता 'जिंदा लाश' नहीं है। इसके लिए उन्हें कलंकित नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि उनके जज्बे का सम्मान किया जाना चाहिए।
हमें उन हजारों साधारण महिलाओं को भी सराहना चाहिए, जिन्होंने खाप पंचायतों जैसी संस्थाओं के चाऊमीन और जींस को बलात्कार का कारण बताए जाने वाले फरमानों को ठुकराया है और जो पुरुषवर्चस्ववादी मानसिकता को चुनौती दे रही हैं। यह लड़ाई सिर्फ बलात्कार या यौन हमलों तक सीमित नहीं है, बल्कि उस मानसिकता के खिलाफ भी है, जो महिलाओं के साथ होने वाली ज्यादती के लिए उन्हें ही कठघरे में खड़ा करती हैं।