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सिर्फ नौकरी इनका लक्ष्य नहीं

Sun, 14 Dec 2014 10:31 PM IST
नारायण कृष्णमूर्ति
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यह प्लेसमेंट का समय है, और प्रमुख संस्थानों के परिसर में बस यही हलचल दिख रही है कि किसे कितने का पैकेज किसे मिला। सालाना करोड़ रुपये के वेतन के प्रस्तावों पर आज किसी को हैरत नहीं, बल्कि यह बदलते आर्थिक माहौल और नियोक्ताओं के मिजाज को ही दर्शाता ही है। अगर आईआईटी,दिल्ली की एक लड़की को वार्षिक एक करोड़ से अधिक का पैकेज लोगों को सोचने पर मजबूर कर रहा है कि आखिर वह इसका क्या करेगी, तो जिन्हें ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं मिला, वे सोच रहे हैं कि आखिर वे इससे क्यों चुक गए। यह सवाल भी काबिल-ए-गौर है कि आईआईटी से निकले कुछ दूसरे युवाओं द्वारा इस तरह के पैकेजों को ठुकराने की क्या वजह है। इसका एक कारण तो उच्च्ा अध्ययन के लिए विदेशों का रुख करने का ही है, लेकिन इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि आज पहले से ज्यादा विकल्प मौजूद हैं।
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गौरतलब है कि भारत जैसे देश में कड़ी मेहनत और किस्मत के जरिये कुछ चुनिंदा युवाओं को ही आईआईटी के पवित्र परिसर में दाखिला लेने का मौका मिल पाता है। ऐसे में, ऊंची कमाई वाली नौकरी के प्रस्तावों से इन्कार करना झटके से कम नहीं है। एक मध्यवर्गीय दक्षिण भारतीय होने के नाते कई बार मैं यह सोचता हूं कि ये छात्र कहीं नशे में तो नहीं हैं। मुझे यह भी लगता है कि इन छात्रों ने बेहद स्वार्थी ढंग से किसी अन्य की नौकरी की संभावनाओं पर न केवल प्रहार किया है, बल्कि नियोक्ताओं को भी मायूस किया है, यही वजह है कि अगले वर्ष कैंपस में आने से पहले वे जरूर दो बार सोचेंगे। ज्यादातर लोग अगर युवाओं के इस कृत्य को पागलपन करार देंगे, तो इसकी वजह भी है। दरअसल, आईआईटी में प्रवेश का मतलब ही है, कार, घर, विदेश में नियुक्ति, टाइम्स स्क्वॉयर में छुट्टियां और मुमकिन है, निकट भविष्य में चांद का टिकट। तो आखिर क्या वजह हो सकती है कि इन बीसेक लोगों ने नौकरी के उस प्रस्ताव को नकार दिया, जिसे पाना कइयों का सपना होता है।

दरअसल आज के समय में केवल नौकरी पा जाना हर किसी का उद्देश्य नहीं होता, खासकर उनके लिए, जो एक प्रतिष्ठित संस्थान से निकले हों। आईआईटी का ठप्पा उन्हें अब भी नौकरी तो दिला ही देगा। हो सकता है कि वेतन कुछ कम मिले, लेकिन वह भी उनके कई साथियों से ज्यादा होगा। नौकरी के प्रति इस उदासीनता की दूसरी वजह यह है कि 2014 का भारत एक या दो दशक पहले के भारत से काफी अलग है। अपने दम पर कोई शुरुआत करने के अवसर पहले की तुलना में आज कहीं ज्यादा हैं। आज कैंपस के भीतर ही तमाम ऐसी इकाइयां मौजूद होती हैं, जो विद्यार्थियों को अपनी रुचि के क्षेत्र में काम करने और घर बैठे कोई शुरुआत करने का मौका देती हैं। करियर की शुरुआत कर रहे युवाओं के बीच ये कैंपस काफी लोकप्रिय हैं।
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कुछ युवाओं द्वारा करोड़ों की नौकरी को नकारने की एक वजह यह भी है कि तकनीकी की गंभीर शिक्षा के बाद वे खुद को गूगल, शैंपू या किसी पेय कंपनी में महज कंप्यूटर के प्रोग्रामों को डिजाइन करता नहीं देख सकते। इस तरह की नौकरी न करने की उनकी वजह समझ में आती है। दरअसल, ज्यादातर विद्यार्थी जिस सोच के साथ इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लेते हैं, हकीकत उससे अलग होती है। मैं पूरी जिम्मेदारी से यह कह सकता हूं, क्योंकि मैं खुद इंजीनियरिंग का विद्यार्थी रहा हूं। मैंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग को चुना, क्योंकि मुझे लगा था कि इससे मुझे कोई भी मैकेनिकल काम करने का लाइसेंस मिलेगा, और मैं ऐसी मशीनें बना पाउंगा, जो लोगों की जिंदगी को आसान बनाएंगी। मगर जब मैंने इंजीनियरिंग की इस शाखा का अध्ययन शुरू किया, तो ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

जहां तक नौकरियों को ठुकराने वाले विद्यार्थियों की बात है, तो उन्हें एक ऐसी सरकार का लाभ मिलेगा, जो युवाओं को जरूरी सुविधाएं और फंड उपलब्ध करा रही है, ताकि वे अपनी रुचि के क्षेत्र में और अपने दम पर शुरुआत कर सकें। इसके अलावा मेक इन इंडिया अभियान का असर भी जोरों पर है, जो कुछ आदर्शवादी छात्रों को अपनी मातृभूमि के लिए कुछ कर गुजरने के लिए प्रेरित कर रहा है। फिर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि आईआईटी में प्रवेश करने वाली प्रतिभाएं देश की सर्वश्रेष्ठ मेधा हैं, और यही सुनिश्चित करता है कि उन्हें दूसरा मौका जरूर मिलेगा। दूसरे मौका में मुमकिन है कि वेतन थोड़ा कम मिले, मगर उन्हें अपनी योग्यता का फल मिलेगा, यह तय है।

हालांकि मुझे उन लोगों के लिए भी खेद है, जिन्हें इस तरह का ऑफर मिल ही नहीं पाता, या वे लोग जो किसी भी ऑफर के लिए तरसते ही रहते हैं। नौकरी पाने से पहले ही उन्हें अपनी प्रत्याशाओं के बोझ तले नहीं दब जाना चाहिए। बहुत वर्ष पहले उत्कृष्ट शैक्षिक योग्यता वाले मेरे एक मित्र को कैंपस प्लेसमेंट के जरिये नौकरी मिली। मगर उस बेहद ख्याति प्राप्त तकनीकी कंपनी में वह ज्यादा समय तक काम नहीं कर सके। उसकी वजह यह थी कि उनके वरिष्ठ हमेशा इतनी कम उम्र में इतना ज्यादा वेतन पाने का उसे ताना देते थे। यह दबाव उसके सहने की क्षमता को पार कर गया।

ऐसे में, सवाल उठता है कि नौकरी ठुकराने वाले युवा क्या बाद में पछताएंगे। मुझे ऐसा नहीं लगता। उन पर आईआईटी का ठप्पा लगा है, और यही उनके सुनहरे भविष्य का टिकट भी है। जिन्हें ये प्रस्ताव नहीं मिल सका, उन्हें भी निराश होने की जरूरत नहीं है। भारत उस मुकाम पर पहुंच चुका है, जहां अवसर बहुत हैं, और उनका फायदा उठाने वाले कम। इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट की डिग्री के साथ बीच-बीच में एयर कंडीशनर लगाने, विक्रय, कॉपीराइटिंग और संपादन का काम करने के बाद आज मैं देश की सबसे ज्यादा बिकने वाली पर्सनल फाइनेंस पत्रिका का संपादक हूं। समझने वाली बात है कि आपको शिक्षा की जरूरत है, लेबल की नहीं, बाकी चीजें स्वाभाविक तौर पर आपके पास आएंगी।
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(लेखक- मैकेनिकल इंजीनियर व मार्केटिंग के साथ एमबीए, और फिलहाल आउटलुक मनी के संपादक)
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