वैनेसा बॉन्स ने एक बार नौकरी के लिए इंटरव्यू दिया। उन्हें लगा कि उनका प्रेजेंटेशन ठीक रहा, लेकिन उन्हें नौकरी नहीं मिली। बाद में, वहां मौजूद एक व्यक्ति ने पूछा कि क्या वह ऐसा फीडबैक सुनना चाहेंगी, जो भविष्य में उनके काम आ सके? कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर डॉ. बॉन्स ने बताया कि बातचीत में उनकी कई कमियां बताई गईं। उन्हें बुरा लगा, पर उन्होंने सलाह पर काम किया और अपने प्रेजेंटेशन को पूरी तरह बदल दिया। बाद में उन्हें ऐसी ही नौकरियों के कई ऑफर मिले।
अक्सर हम किसी को जरूरी, लेकिन सच बताने से बचते हैं, क्योंकि हमें डर होता है कि सामने वाले की भावनाएं आहत हो सकती हैं। डॉ. बॉन्स के अनुसार, यह तय करने के लिए कि कोई बात कहनी चाहिए या नहीं, खुद से कुछ सवाल पूछे जा सकते हैं। पहला, क्या मेरी बात मदद करेगी? अगर आपकी सलाह से सामने वाले को अभी या भविष्य में फायदा हो सकता है, तो थोड़ी असहजता के बावजूद बात कहना उचित है।
दूसरा, अगर मैं नहीं बताऊं, तो क्या होगा? शिकागो यूनिवर्सिटी की बिहेवियरल साइंस की प्रोफेसर एम्मा लेविन का शोध बताता है कि लोग सच सुनना चाहते हैं, खासकर तब, जब उससे सुधार, बदलाव या बेहतर समझ का रास्ता खुलता हो। इसलिए, यह भी सोचें कि चुप रहने से सामने वाले को कोई नुकसान तो नहीं होगा। तीसरा, क्या यह सही समय है? अगर कोई आपसे फीडबैक मांगता है, तो आप कह सकते हैं, ‘मुझे इस बारे में सोचने दें’। अपने विचार व्यवस्थित करने के बाद बातचीत करें।
किसी को सलाह देने से पहले यह भी पूछें कि क्या वह आपकी राय सुनना चाहता है। चौथा, क्या सामने वाला इस सलाह का इस्तेमाल कर सकता है? सिर्फ कमी बताने के बजाय सुधार का रास्ता भी बताएं। अगर आपकी बात से कोई व्यावहारिक फायदा नहीं होगा और केवल भावनात्मक चोट पहुंचेगी, तो चुप रहना बेहतर है। मसलन, अगर कोई दोस्त गायक बनना चाहता है और अपने गाने पर आपकी राय मांगता है, तो उसकी कमियां बताकर सुधार का रास्ता दिखाया जा सकता है। पर, अगर वह सिर्फ शौकिया गा रहा है, तो गाना खराब होने की बात बताने की जरूरत नहीं है।
ईमानदारी का मतलब हर सच बोल देना नहीं है। सही ईमानदारी वही है, जो सामने वाले को चोट पहुंचाने के बजाय उसे बेहतर बनने में मदद करे।