गाजा युद्ध पर बनी डॉक्यूमेंट्री 'नाजा' इन दिनों चर्चाओं में है। अगर आपने इसके बारे में सुना है तो उसका कारण यह हो सकता है कि इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू डॉक्यमेंट्री से इतने नाराज हैं कि उन्होंने इसके निर्माताओं की नागरिकता रद्द करने के लिए कानून बनाने का प्रस्ताव रखा है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि डॉक्यूमेंट्री में फलस्तीनियों की तकलीफों को दिखाया गया होगा। खून से लथपथ शव, रोते हुए बच्चों और भूख से बेहाल परिवारों की तस्वीर होंगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं है। यह डॉक्यूमेंट्री इस्राइली सैन्य अधिकारियों और सैनिकों के साक्षात्कारों पर आधारित है। साक्षात्कारों को रात के समय तेल अवीव की छतों पर फिल्माया गया है। बैकग्राउंड में कांच और स्टील से बनी आधुनिक इमारतें दिखाई देती हैं। साक्षात्कार देने वालाें की पहचान छिपाई गई है। गाजा में की जा रही व्यापक निगरानी के बारे में जानकारी दी गई है। साक्षात्कार देने वाले उन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्रणालियों का जिक्र करते हैं, जो निगरानी के दौरान जुटाए गए वीडियो फुटेज का विश्लेषण करके इन्सानी लक्ष्यों की पहचान करती हैं। इसके अलावा, वे उस गिनती के बारे में बताते हैं, जिसे सेना ‘नाजा’ कहती है। इसका अर्थ है—किसी खास लक्ष्य को निशाना बनाते समय उसके साथ कितने नागरिकों को मारने की अनुमति दी जा सकती है।
साक्षात्कार में शामिल एक व्यक्ति बताता है कि किस तरह उन लोगों को भी निशाना बनाया जाता है, जो भोजन वितरण केंद्र की ओर भाग रहे होते हैं। एक अन्य व्यक्ति अनुमान लगाता है कि उसके हाथों मारे गए लोगों की संख्या हजारों में हो सकती है। हालांकि, इस्राइल की सेना ने डॉक्यूमेंट्री में लगाए गए आरोपों का खंडन किया है। उसने डॉक्यूमेंट्री में इस्तेमाल किए गए स्रोतों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं। सेना का कहना है कि किसे निशाना बनाना है, इसका फैसला केवल अधिकारी करते हैं। वहीं, इस्राइल के संस्कृति मंत्री मिकी जोहर ने फिल्म निर्माताओं पर देशद्रोह का आरोप लगाया है। फिल्म देखने से एक रात पहले मेरी मुलाकात माइकल सफार्ड से हुई। वह इस्राइल के मानवाधिकार मामलों के वकील हैं और इस डॉक्यूमेंट्री के निर्माण में सलाहकार की भूमिका निभा चुके हैं। उन्होंने कहा कि डॉक्यूमेंट्री तेल अवीव के बारे में है। उनके कहने का मतलब था कि फिल्म शिक्षित और आधुनिक सोच रखने वाले इस्राइलियों के बारे में है, जो सेना की खास यूनिटों में काम करते हैं।
डॉक्यूमेंट्री में युवल अब्राहम एक साक्षात्कार में अपने सामने बैठे व्यक्ति से पूछते हैं कि क्या उसे इस बात का अहसास था कि वह नरसंहार में भाग ले रहा है। गौरतलब है कि युवल अब्राहम ने ही इन साक्षात्कारों को किया है और रेचल जोर के साथ मिलकर इस फिल्म का सह-निर्देशन भी किया है। इस सवाल से पहले, साक्षात्कार देने वाला व्यक्ति बता चुका होता है कि उसे अपना काम मजेदार लगता था। देर रात तक अपने साथियों के साथ जागना, मिलकर किसी साझा लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में काम करना, उसे यह सब अच्छा लगता था। और फिर, जब उससे पूछा जाता है कि क्या उसे अहसास है कि वह ‘नरसंहार’ में शामिल रहा है, तो वह बिना किसी बेचैनी के, बेहद सहजता से स्वीकार कर लेता है कि हां, वह ऐसा कर रहा था।
डॉक्यूमेंट्री में उस शब्द (नरसंहार) का दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जाता। लेकिन एक दूसरा शब्द, जो उतना ही विवादास्पद है, बार-बार दोहराया जाता है और हर बार तीखे असर के साथ। वह शब्द है—‘आतंकवाद’। इस्राइली खुफिया एजेंसियों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली एआई प्रणालियों में से कम से कम एक प्रणाली फोन कॉल और सामाजिक संपर्कों के पैटर्न सहित विभिन्न आंकड़ों के आधार पर संदिग्ध आतंकवादियों की पहचान करती है। ‘क्या यह प्रणाली गलतियां करती है?’ ‘बिल्कुल करती है।’ साक्षात्कार में शामिल एक व्यक्ति बिना किसी हिचकिचाहट के इसे स्वीकार करता है। वह आगे उदाहरण देते हुए बताता है कि मसलन, हमास के मुख्यालय के पास दुकान चलाने वाले किसी बेकर की गतिविधियों और लोगों से संपर्क के पैटर्न एआई को हमास के किसी लड़ाके जैसे लग सकते हैं।
ठीक ऐसा ही एक मामला जर्मन अखबार ‘डी जाइट’ के पॉडकास्ट ‘द गाजा शेफ’ में सामने आया है। यह पॉडकास्ट युवल अब्राहम की पत्रकारिता पर आधारित है और इसमें महमूद अल-मदहून नाम के एक व्यक्ति की लक्षित हत्या की जांच की गई है। अल-मदहून एक अस्पताल के पास सामुदायिक रसोई चलाते थे। इस्राइली खुफिया एजेंसियों ने उस अस्पताल को हमास का गढ़ बताया था। ऐसे में महमूद अल-मदहून के साथ उसके परिवार के सदस्यों या उसके यहां काम करने वाले लोगों की भी जान जा सकती है। यहीं ‘नाजा’ की भूमिका सामने आती है। किसी व्यक्ति को सैन्य दृष्टि से जितना महत्वपूर्ण माना जाता है, उसे निशाना बनाने के दौरान उसके साथ मारे जा सकने वाले अन्य लोगों की संख्या भी उतनी ही बढ़ जाती है। यह संख्या 20, 50 या यहां तक कि 100 भी हो सकती है।
‘नाजा’ फिल्म के निर्माताओं ने आतंकवाद शब्द को एक बिल्कुल अलग संदर्भ में भी इस्तेमाल किया है। उन्होंने 1986 में प्रसारित अमेरिकी पब्लिक ब्रॉडकास्टिंग सर्विस (पीबीएस) के कार्यक्रम ‘फायरिंग लाइन’ के एक पुराने एपिसोड का अंश फिल्म में शामिल किया है। इसमें युवा बेंजामिन नेतन्याहू अपनी संपादित पुस्तक ‘टेररिज्म : हाउ द वेस्ट कैन विन’ का प्रचार करते दिखाई देते हैं और आतंकवाद की परिभाषा देते हैं, “राजनीतिक उद्देश्यों को हासिल करने के लिए निर्दोष लोगों और नागरिकों पर व्यवस्थित एवं जानबूझकर हमला करना, उनकी हत्या करना, उन्हें अपंग बनाना और उन्हें भयभीत करना।”
‘नाजा’ न्यूयॉर्क के ग्रीनविच विलेज स्थित आईएफसी सेंटर में प्रदर्शित होने जा रही है। वहां से कुछ ही ब्लॉक की दूरी पर क्वाड सिनेमा में इस्राइल पर आधारित एक दूसरी फिल्म दिखाई जाएगी, जिसका नाम है ‘चेकआउट’। यह फिल्म मोसाद के एक ऐसे बदकिस्मत एजेंट की कहानी है, जिसे जबरन सेवानिवृत्त किया जाने वाला है। तभी उसे एक ऐसा व्यक्ति नजर आता है, जिसे वह अपने जीवन की सबसे बड़ी कामयाबी मान बैठता है—एक उच्च पदस्थ उग्रवादी, जो कारोबारी के रूप में अपनी पहचान छिपाए हुए है। फिल्म ‘नाजा’ में गाजा की जो तस्वीर दिखाई गई है, वैसा ही कुछ उसकी अपनी फिल्म में भी दिखाया है। जब उस काल्पनिक बेकर की हत्या होती है, या उस वास्तविक शेफ की या उस काल्पनिक कारोबारी की, तो व्यवस्था या उस व्यवस्था को चलाने वाले लोग यह नहीं कहते कि उनसे गलती हुई है। वे कहते हैं कि उन्होंने एक आतंकवादी को मार गिराया है। और जो लोग महज संयोग से उसके आसपास मौजूद होने के कारण मारे गए, वे तो बस ‘नाजा’ हैं।
फिल्म में अब्राहम कहता है कि आधिकारिक तौर पर तय किए गए निशाने की संख्या को उन लोगों की संख्या से गुणा कीजिए, जिन्हें उन निशानों तक पहुंचने के लिए मार डालने की छूट दी जा सकती है। ऐसा करते-करते कुछ ही समय में नतीजा यह निकलेगा कि यह तो बस युद्ध है, यहां कोई भी मारा जा सकता है। कॉमेडी फिल्म ‘चेकआउट’ में दिखाई गई इस कार्यप्रणाली और ‘नाजा’ में बयान की गई उस लगातार जारी, असहनीय भयावहता के बीच अंतर केवल पैमाने का है। शायद यही वजह है कि ‘नाजा’ के निर्माताओं को अपनी फिल्म में ‘नरसंहार’ शब्द का इस्तेमाल एक से अधिक बार करने की जरूरत ही नहीं पड़ी।