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सिर्फ सब्सिडी कटौती से नहीं

Wed, 03 Oct 2012 10:42 PM IST
जयंतीलाल भंडारी
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आर्थिक सुधारों को लेकर देश भर में जारी व्यापक बहस के बीच आई विजय केलकर समिति की रिपोर्ट भारतीय अर्थव्यवस्था की भावी चुनौतियों की ओर इशारा कर रही है। रिपोर्ट में राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए ठोस कदम उठाने की बात कही गई है। इनमें मुख्य रूप से सब्सिडी में भारी कमी की बात शामिल है। हालांकि सरकार की तरफ से स्पष्ट किया गया है कि गरीबों को दी जा रही खाद्य सब्सिडी में कोई बड़ा फेरबदल नहीं होगा। इसकी वजह यह है कि भारत जैसे विकासशील देश में एक स्तर तक सब्सिडी की जरूरत है। साथ ही गरीबों और समाज के निचले पायदान पर गुजर-बसर कर रहे लोगों को सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराना भी जरूरी है। वैसे इसमें कोई शक नहीं सरकार की तरफ से दी जा रही सब्सिडी का भारी दुरुपयोग हो रहा है और यह जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच रही।
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मौजूदा परिस्थितियों में एक बात तो साफ है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार को दोबारा गति देने के लिए सरकार को कई मोरचों पर काम करने की जरूरत है। यकीनन इस समय भारत सहित दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं बढ़ती हुई सब्सिडी और राजकोषीय घाटे के कारण कठिन दौर से गुजर रही हैं। अमेरिका मंदी से उबरा नहीं है, जबकि यूरो क्षेत्र के हाल बदहाल हैं। ऐसे में चीन और भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं से उम्मीद थी, पर यहां भी विकास दर में लगातार गिरावट का रुख है।

ऐसे में जब सरकारें आम जनता की सुविधाओं या सब्सिडी में कटौती करती है, तो लोग आक्रोशित होकर सड़कों पर उतर आते हैं। पिछले साल यूनान, स्पेन, पुर्तगाल आदि देशों में सामाजिक सुरक्षा के बजट, लोगों के वेतन-भत्तों आदि में कमी के विरोध में लाखों लोग सड़कों पर उतरे। इसी तरह हाल ही में भारत में डीजल की कीमतों में इजाफा और सब्सिडी वाले रसोई गैस सिलेंडरों की सीमा तय करने के खिलाफ लोगों ने जबरदस्त विरोध दिखाया। इसमें कोई दो राय नहीं है कि सरकार ने यदि अभी कठोर फैसले नहीं लिए, तो भविष्य में अर्थव्यवस्था की स्थिति और बदतर हो जाएगी।
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इतना ही नहीं, ठोस कदम के अभाव में देश का राजकोषीय घाटा 2012-13 के बजट लक्ष्य जीडीपी के 5.1 फीसदी से बहुत ज्यादा बढ़कर 6.1 फीसदी को छू सकता है। चालू वित्त वर्ष के प्रथम चार महीनों के दौरान राजकोषीय घाटा पहले ही बजट अनुमान के 50 फीसदी को पार कर चुका है। हालांकि सब्सिडी में भारी कमी सरकार के लिए आसान नहीं है। सरकार सबसे ज्यादा सब्सिडी डीजल, रसोई गैस, उवर्रकों वगैरह पर देती है और इन पर सब्सिडी कम करने से महंगाई की आग और भड़क उठती है। इसलिए सब्सिडी का दुरुपयोग रोकने और उसे जरूरतमंदों तक पहुंचाने के लिए एक प्रभावी तंत्र विकसित करने की जरूरत है।

इस दिशा में सरकार को नंदन नीलकेणी समिति की सिफारिशों पर तत्काल अमल करना चाहिए, जिसमें नकद सब्सिडी की बात कही गई है। दिल्ली, झारखंड और कर्नाटक में सब्सिडी की रकम सीधे लाभान्वितों के खाते में जमा करने की योजना पायलट परियोजना के तौर पर चलाई गई, जिसके परिणाम अच्छे रहे। हर नागरिक का आधार कार्ड बन जाने के बाद उसके नंबर को उसके बैंक खाते से जोड़कर सब्सिडी की राशि सीधे खाते में जमा करा दी जानी चाहिए। यहां हम नकद सब्सिडी के लिए ब्राजील जैसे देश का उदाहरण सामने रख सकते हैं। ब्राजील में कुछ शर्तों के साथ नकद सहायता देने की योजना सफल रही है। लेकिन पूरी अर्थव्यवस्था का उपचार सिर्फ नकद सब्सिडी की व्यवस्था से नहीं हो सकता।

राजकोषीय घाटे में कमी करने के लिए निवेश बढ़ाने के साथ-साथ विनिवेश की भी जरूरत है। निवेश वृद्धि के माहौल को सुधारने के लिए अभी और उपायों की जरूरत है। अब राष्ट्रीय निवेश बोर्ड की अवधारणा को तुरंत अंतिम रूप दिया जाना चाहिए। दरअसल इसे बड़ी परियोजनाओं के लिए सिंगल विंडो सिस्टम के तौर पर उपयुक्त माना गया है। परियोजनाओं में देरी इनके कई मंत्रालयों से जुड़े होने की वजह से आती है। इस समय एक निवेश परियोजना के लिए 40 से 50 जगह मंजूरी लेनी पड़ती है। यदि बोर्ड से परियोजनाओं को जल्दी मंजूरी मिलती है, तो निवेश में तेजी आएगी।

इसके अलावा विकास दर बढ़ाने के लिए सरकार को आधारभूत ढांचे में निवेश बढ़ाना चाहिए। साथ ही, इससे जुड़ी परियोजनाओं को समय पर पूरा करने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए। इसी तरह बिजली क्षेत्र में सुधारों को रफ्तार दिया जाना भी जरूरी है। राज्यों की वितरण कंपनियों यानी डिस्कॉम को संकट से उबारने के लिए उनके कर्ज की री-स्ट्रक्चरिंग योजना को अंतिम रूप दिया जाना चाहिए। ये कंपनियां कर्ज के जाल में उलझकर रह गई हैं। केंद्रीय बिजली मंत्रालय ने जो बेलआउट पैकेज तैयार किया है, उसके मुताबिक राज्य डिस्कॉम कंपनियों के आधे कर्ज का अधिग्रहण कर लेंगी और इसके बदले बांड जारी करेंगी।

मतलब यह है कि इन कंपनियों को कर्ज देने वालों के लिए यह एक तरह की गारंटी होगी। इससे बिजली सेक्टर में निवेश का माहौल बनेगा और कंपनियों को फंड मिलेगा। आर्थिक सुधारों के नए दौर में सरकार को ध्यान रखना होगा कि सुधारों की गति इतनी तेज न हो कि कमजोर वर्ग के समक्ष जीवन निर्वाह का संकट खड़ा हो जाए। इसके लिए आर्थिक-सामाजिक संतुलन कायम करके चलना होगा।
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