सकडाल का पुत्र कर्म (पुरुषार्थ) से ज्यादा भाग्य पर विश्वास करता था। सकडाल उसे समय-समय पर पुरुषार्थ का महत्व समझाते, परंतु वह कह देता कि कि भाग्य में जो होता है, उसे पुरुषार्थ कभी नहीं बदल सकता।
एक दिन भगवान महावीर सकडाल के घर आए। सकडाल ने उनका काफी स्वागत-सत्कार किया। भगवान महावीर ने जब सकडाल से कुशल-क्षेम पूछी, तो उसने बताया कि उसका पुत्र भाग्यवादी है, जिसके चलते उसे चिंता बनी रहती है। भगवान महावीर ने उसे आश्वस्त किया कि मैं उससे बात करके देखूंगा।
बाद में महावीर ने सकडाल के पुत्र से पूछा, तुम जंगल में मिट्टी के बरतन बनाते हो और उन्हें वहीं छोड़ आते हो। यदि उन्हें कोई तोड़ डाले तो क्या करोगे? सकडाल के पुत्र ने उत्तर दिया, भाग्य में अगर यही लिखा होगा, तो यही होगा। मैं बरतनों की रक्षा की चिंता भला क्यों करूं?
भगवान महावीर ने दूसरा प्रश्न किया, यदि घर में घुसकर कोई तुम्हारी पत्नी का अपमान करने लगे, तो क्या करोगे? उसने क्रोध में कहा, मैं उसकी आंखें फोड़ दूंगा। फिर महावीर ने कहा, लेकिन ऐसा क्यों, यह सब भी तो नियतिवश ही होगा। फिर तुम उसकी आंखें क्यों फोड़ोगे? यह सुनते ही उस युवक की आंखें खुल गईं। वह भगवान महावीर के चरणों में गिरकर बोला, प्रभु, आप ठीक कहते हैं। भाग्यवाद पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। कर्म करना प्रत्येक मानव का परम कर्तव्य है।