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परिधान नहीं, सोच बदलिए

तस्लीमा नसरीन
Updated Wed, 21 Mar 2018 07:25 PM IST
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बांग्लादेशी महिलाएं

बांग्लादेश में रेडीमेड कपड़ों की दुकानों पर नजर डालें, तो बदलाव दिखता है। वहां पुरुषों के लिए शर्ट-पैंट-टाई या कुर्ता-पायजामा तो है, लेकिन महिलाओं के लिए बुर्के की तरह लंबी नई पोशाक आई है। सिर ढकने के लिए हिजाब भी है। आधुनिक पुरुष की पोशाक में तो कोई बदलाव नहीं है, पर आधुनिक महिला की पोशाक बदल गई है। साड़ी और सलवार-कमीज के रंग के अनुरूप हिजाब चुनकर वहां की महिलाएं सिर ढकने लगी हैं। कहीं-कहीं महिलाएं साड़ी के ऊपर बुर्के की जगह गाउन पहन रही हैं। साड़ी पहनने पर पूरी बांह वाले ब्लाउज पहनने का चलन दिख रहा है। बांग्लादेश में भीषण गर्मी पड़ती है। ऐसे में, महिलाएं ऐसे कपड़े पहनेंगी कैसे? बांग्लादेश की महिलाओं को ऐसे कपड़े पहनने के लिए कौन बाध्य कर रहा है या यह पोशाक कहां से आई है, इस बारे में हममें से बहुत लोग अवगत हैं।



पोशाक, खान-पान, शिल्प, संस्कृति का अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग स्वरूप है। इस्लाम के प्रचारकों ने एक समय बंगाल की हिंदू आबादी के एक हिस्से को इस्लाम धर्म ग्रहण करने के लिए प्रेरित किया था। हमारे पूर्वजों ने अरब का धर्म बेशक ग्रहण किया था, पर उन्होंने अरब की संस्कृति नहीं ली। बंगाल के लोग करीब एक हजार साल पुरानी अपनी संस्कृति से ही संतुष्ट थे। और दूसरे क्षेत्रों की तरह पोशाक में भी बदलाव आया है। शुरुआत में बंगाल की महिलाएं शरीर के ऊपरी हिस्से में कपड़े नहीं पहनती थीं। बाद में एक ही लंबे वस्त्र से शरीर ढकने की परिपाटी शुरू हुई। उसी ने साड़ी का रूप लिया। लेकिन तब भी ब्लाउज का चलन नहीं था। बंगाली महिलाओं मेंे आधुनिक तरीके से साड़ी पहनने का श्रेय रवींद्रनाथ की भाभी यानी सत्येंद्रनाथ ठाकुर की पत्नी ज्ञानदानंदिनी देवी को जाता है। ब्लाउज-पेटीकोट अंग्रेजी शब्द हैं। तब अंग्रेजों का शासन था। रानी विक्टोरिया की रक्षणशीलता ब्रिटिश रीति-रिवाजों और रहन-सहन पर हावी थी। ऐसे में, अंग्रेज महिलाओं की तरह बंगाली महिलाओं ने भी ऐसी पोशाक पहननी आरंभ कर दी, जिससे शरीर का कोई हिस्सा दिखाई न पड़े। मेरी उम्र जब साड़ी पहनने की हुई-हालांकि बंगाल में स्कूल से ही साड़ी पहनने का रिवाज है-तब साड़ी के साथ पेटीकोट-ब्लाउज का चलन था। भले इसे ब्रिटिश रक्षणशीलता का नमूना कहा जाए, पर यह पोशाक हमारी पहचान का जरिया बन चुकी थी। अब साड़ी, पेटीकोट, ब्लाउज को अचानक अशालीन क्यों बताया जाने लगा? ऐसी पोशाक की जरूरत क्यों महसूस होने लगी कि पूरा शरीर ढका जाए?


हमारे जीवन में बदलाव स्वतःस्फूर्त होते हैं। आज के दौर में अनेक कामकाजी महिलाएं जींस या सलवार-कमीज पहनती हैं। कुछ समय पहले तक बंगाल में विवाहित महिलाएं साड़ी को छोड़ किसी और पोशाक के बारे में सोच भी नहीं सकती थीं। पर आज बंगाली महिलाएं धड़ल्ले से जींस और सलवार-कमीज पहनती हैं, क्योंकि साड़ी पहनकर ट्रेन, बस, ट्राम में सफर करना कठिन है। इसके अलावा जींस और सलवार-कमीज पहनने में ज्यादा समय नहीं लगता। साड़ी पहनने में समय लगता है। महिलाओं की पोशाक में आए इस बदलाव को हमारे समाज ने स्वीकार कर लिया है। हालांकि एक सच्चाई यह भी है कि शहरी इलाकों में साड़ी का चलन निरंतर कम होता जा रहा है। ग्रामीण समाज की महिलाओं, बुजुर्ग महिलाओं और शादी के आयोजनों में ही साड़ी का चलन आज बहुतायत में दिखता है। साड़ी के घटते चलन को देखकर कभी-कभी मैं सोचती हूं कि साड़ी कहीं इतिहास न बन जाए।


लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि समाज में महिलाओं की भूमिका बदली है, इसलिए उनकी पोशाक बदली है। लड़कियों के अधिक से अधिक घर से निकलने, स्कूल-कॉलेज में पढ़ने, नौकरी करने और कारोबार संभालने की वजह से ही उनकी पोशाक बदली है। चलने-फिरने की सहूलियत के कारण ही यह बदलाव आया है। किंतु हिजाब या बुर्का क्या महिलाओं को किसी किस्म की सहूलियत देता है? हिजाब और बुर्का अरब देशों से आए हैं। रेगिस्तान के तूफान और लू से बचाने में बुर्का वहां की महिलाओं की मदद करते हैं। लेकिन हमारे यहां की प्रकृति तो ऐसी नहीं है। उल्टे बांग्लादेश जैसे गर्म मौसम वाले मुल्क में बुर्का या हिजाब का दबाव बनाने से महिलाओं की मुश्किलें बढ़ेंगी ही। इसके बावजूद बांग्लादेश की महिलाएं बुर्का और हिजाब को अपनी पोशाक में शामिल कर अरब मुल्कों का अनुकरण कर रही हैं। अरब के लोग क्या इतने अच्छे और विद्वान हैं कि उनके हर रीति-रिवाज का हमें अनुकरण करना चाहिए? जवाब में कहा जा रहा है कि चूंकि अरब में इस्लाम का जन्म हुआ है, इसलिए वह देश पवित्र है, इसीलिए उस देश की पोशाक भी पवित्र है। इसके अलावा कुरान और हदीस में औरतों को पूरा शरीर ढकने के लिए कहा गया है। इसके पीछे यह भी तर्क है कि महिलाओं का सौंदर्य कोई न देखे।


यह पिछड़े जमाने की सोच है। पोशाक के बारे में इस तरह के फरमान आधुनिक दुनिया में नहीं चल सकते, जहां औरतों के लिए पूरी दुनिया खुली हुई है। यह स्त्री को बांधे रखने का तरीका है। फिर स्त्री का सौंदर्य केवल शारीरिक सौंदर्य ही नहीं होता। स्त्री की बुद्धिमत्ता, उसका ज्ञान, उसकी प्रतिभा, उसके आचार-व्यवहार ही उसके व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। पुरुष सिर्फ स्त्री के शारीरिक सौंदर्य से आकृष्ट नहीं होता, वह उसकी मानसिक बुनावट से भी प्रभावित, आकर्षित होता है। तो क्या पूरे शरीर की तरह आज की महिला अपने ज्ञान और अपनी प्रतिभा को छिपाकर रखेगी? फिर इसका भी ध्यान रखना चाहिए कि धर्म हिजाब या बुर्के में नहीं होता, धर्म हमारे अंदर की चीज है। पोशाक से अगर सर्वशक्तिमान को खुश करना संभव होता, तो दुनिया के तमाम तानाशाह, अत्याचारी और लुटेरे केवल कपड़ों से उन्हें खुश करते। लेकिन उन्हें धोखा देना संभव नहीं है। इसलिए गर्म इलाकों में अरब के बुर्के और हिजाब का चलन लागू करना धर्म के नाम पर दबाव बनाने का वही तरीका है, जिसे मनुष्य शताब्दियों से भुगत रहा है।

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