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नहीं बदली गौशालाओं की हालत

सुभाषिनी सहगल अली Published by: Raman Singh Updated Thu, 25 Apr 2019 06:42 PM IST
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सुभाषिनी सहगल अली

पांच साल पहले एक नई तरह की सरकार बनी थी। चुनाव जीतने के लिए आज के शासक दल ने कई वादे किए थे, जिनको लेकर चुनावी कोलाहल के बावजूद काफी चर्चा है। महिलाओं का 33 फीसदी आरक्षण कहां गया? देश की राजधानी 'बलात्कार की राजधानी' कैसे बन गई, जहां हर चार घंटे में एक बलात्कार होता है? नोटबंदी अकेले पचास लाख नौकरियां कैसे खा गई? ये सारे सवाल तो उठ ही रहे हैं, लेकिन उनका क्या, जिनसे वादे तो बहुत हुए थे, पर जो मूक हैं, सवाल नहीं पूछ सकते, जो वोट नहीं डाल सकते? मूक और बिना वोट की गाय को आश्वासन तो बहुत दिए गए थे कि उनकी हत्या बंद कर दी जाएगी। उनके लिए रहने और खाने की अच्छी व्यवस्था की जाएगी। गो-मूत्र और गोबर की जादुई उपलब्धियों पर शोध संस्थान स्थापित किए जाएंगे। पर गाय, उसके परिवार के अन्य पशु, उसके पालक और उस पर आश्रित लाखों लोगों के लिए पिछले पांच वर्ष काफी कष्टदायक रहे हैं। शासक दल द्वारा शासित रहे प्रदेशों से कुछ उदाहरण इस बात की पुष्टि करेंगे।



20 अगस्त, 2017 को छत्तीसगढ़ के दुर्ग से खबर आई कि तीन गौशालाओं में सैकड़ों गायें मर गईं। इनके मालिक भाजपा के जमुई नगर पंचायत के उपाध्यक्ष हरीश वर्मा हैं। जब एक संवाददाता वहां पहुंचा, तो उसे 30 मृत गायें जमीन पर दिखीं। गौशालाओं के अंदर की गंदगी और बदबू बर्दाश्त के बाहर थी। भूखी गाय की पसलियां दिख रही थी। गौशालाओं के पास खड़े ट्रैक्टरों में भी गाय के शव थे।


गुजरात में 2018 के मई महीने में बनासकांठा जिले के गौशालाओं के निरीक्षकों ने सैकड़ों गाय यह कहकर खोल दी कि सरकार की तरफ से जिस मदद का आश्वासन दिया गया था, वह प्राप्त नहीं हुई थी। केवल एक गौशाला (राजपुर पिंजरापोल) में आठ हजार गाय थीं। पूरे जिले के 97 गौशालाओं में 55,000 गाय और गोवंश थे। संचालकों का कहना था कि नोटबंदी के बाद लोगों ने मदद देनी बंद कर दी और सस्ती दर पर सरकार से मिलने वाला चारा इतना घटिया था कि उसे जानवर खाने से इनकार कर रहे थे।


इसी महीने सूचना के अधिकार के तहत पूछे गए सवाल पर बताया गया है कि केवल 2015 और 2018 के बीच भोपाल के 28 सरकारी मदद पाने वाले गौशालाओं में 3,826 गाय मर गईं।


उत्तर प्रदेश के रहने वाले, सेवानिवृत आईएएस अधिकारी अभय शुक्ल ने फरवरी, 2019 में प्रदेश में लागू की गई ‘गौ नीतियों’ से उत्पन्न समस्याओं और पीड़ा का उल्लेख किया है। उन्होंने सरकारी आंकड़ों के आधार पर अनुमान लगाया कि हर साल 1.2 करोड़ पशु अनुत्पादक हो जाते हैं। पहले ऐसे बैल, बछड़े और दूध न देने वाली भैंसे, बूचड़खानों और चमड़े के कारखानों के काम आते थे। इससे किसानों को काफी राहत मिलती थी, लेकिन अब यह बंद हो गया है। मांस व्यापार से जुड़ी लाखों नौकरियां समाप्त हो गईं।


जाहिर है कि न तो किसान इन पशुओं का भार वहन कर सकता है और न ही सरकार। इसीलिए ऐसे उपाय तलाश किए जा रहे हैं, जो बहुत ही क्रूर और अमानवीय हैं। उत्तर प्रदेश (और अन्य इलाकों में) के शहरों और देहात में आवारा पशुओं की भरमार है। वे भूखे रहते हैं, धक्के और मार खाते हैं, रात को वाहनों की टक्कर से घायल होते हैं, मरते हैं। जब किसान आंदोलन करते हैं या शहरी जनता हल्ला मचाती है, तो पशुओं को सरकारी स्कूलों में बंद कर दिया जाता है। लेकिन ये बंद पशु खाएंगे क्या? इस पर चुप्पी है। पशुओं की न जुबां होती है, न ही उनके पास वोट है। जुबान होती, तो उनकी व्यथा का विलाप बहरे कानों को भी विचलित करता। अगर वोट होता, तब तो उनके कई ‘रक्षकों’ की जमानतें जब्त हो जाती हैं।


-लेखिका माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य हैं

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