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बड़ी ऊंची चीज है नाक

Wed, 21 Jan 2015 07:57 PM IST
अशोक सण्ड
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पिछले कई दिनों से मेरे चिंतन की घोड़ी इस बात पर अटक गई है कि जब जीवन की सारी क्रियाएं इस शरीर के सभी अवयवों के सहकार से संपादित होती हैं, तो सारी इज्जत, मान-मर्यादा और शर्मो हया का ठेका सिर्फ नाक को ही क्यों? सबसे संवेदनशील होती है, नाक। जरा-सा मौसम में बदलाव आया नहीं कि लगी सुड़-सुड़ करने। खासा रुआब है इसका। कद भले छोटा हो, नाक ऊंची ही होनी चाहिए।
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नाक के साथ दर्द और शर्म, दोनों का जुड़ाव रहा है। चाल को लेकर भी सीधा चलने में नाक ही आगे आ जाती है, जबकि उसके अगल-बगल पसरी दो आंखों को, जिनके भरोसे यह काया सीधे चलती है, कोई कॉम्प्लीमेंट नहीं। नाक होती ही है ऊंची चीज। दर्दनाक, शर्मनाक से लेकर खतरनाक मनःस्थितियों को व्यक्त करने में जितनी मददगार नाक हुई है, कोई और अंग नहीं। नाक कटने न पाए, इसका ध्यान मामूली आदमी भले न रखे, रसूखदार लोगों को बहुत रहता है। पौराणिक आख्यान तक मौजूद है कि बहन की नाक कटने की वजह से ही खौल उठा था एक पराक्रमी भाई का खून। इसके विपरीत मेरे एक बे-हया साथी के लिए उनकी मां की धारणा थी कि नकटे की नाक कटे बित्ता भर रोज बढ़े। इन दिनों दिल्ली के दंगल में सभी दल अपनी अपनी ‘नाक’ ही तो बचाने के फेर में हैं।

इंसानी चेहरे के मध्य स्थित इस अंग को मुहावरे में भी जितना भाव मिला, उतना अन्य किसी को नहीं। गाल फुलाने में वह बात नहीं, जो नथुने फुलाने में है। नाक में दम करना, नाकों चने चबाना, नाक का बाल होना, नाक नीची होना, नाक ऊंची होना आदि-आदि। पता नहीं, कैसे मुहावरा गढ़ दिया गया नाक पर मक्खी बैठने वाला। मक्खी तो शरीर के उस अंग पर भी बैठ सकती है, जिसमें गुड़ वाली चिपचिपाहट हो। प्राणी विज्ञान के नियमानुसार श्वसन-तंत्र को ‘चलाने’ में नाक का बाहरी समर्थन जरूरी होता है। बावजूद इसके कि बिना नाक वाली मेढकी को भी ‘जुखाम’ होता है। जरा सोचिए, यदि न होती नाक, तो कैसे करते अनुलोम-विलोम और किस दरवाजे से बाहर निकलती छींक।
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