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बातचीत का दिखावा नहीं

मारूफ रजा
Updated Wed, 26 Sep 2018 07:11 PM IST
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भारत-पाक रिश्ते
भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे अर्से से बातचीत बंद है। पाकिस्तान ने हाल ही में प्रस्ताव भेजा था, जिससे संयुक्त राष्ट्र महासभा से इतर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी के बीच उम्मीद की जा रही थी कि आज या कल बातचीत हो सकती है, लेकिन हाल के कुछ घटनाक्रम के बाद भारत ने इसे रद्द कर दिया। भारतीय विदेश मंत्रालय ने इसकी दो वजहें बताईं, पहली, हमारे एक सुरक्षाकर्मी की नृशंस हत्या और दूसरी वजह है पाकिस्तान में जारी की गई डाक टिकटों में आतंकियों का महिमामंडन। 


पाकिस्तान से भारत का रिश्ता हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है। भारतीय सरकारें अक्सर पाकिस्तान के कुटिल सत्ता प्रतिष्ठान के बिछाए जाल में उलझती रही हैं। मोदी सरकार भी इसका अपवाद नहीं है। फिर यह पठानकोट एयर बेस के हमले की पाकिस्तान के साथ संयुक्त जांच हो, जिसमें वहां से आई टीम में आईएसआई के अधिकारी शामिल थे, जिन्होंने बाद के दावे को खारिज कर दिया, या फिर जैसे अभी न्यूयॉर्क में विदेश मंत्रियों की मुलाकात पर सहमति बन गई थी, मगर एक दिन बाद भारत ने कदम खींच लिए। यह निरंतरता के अभाव को दिखाता है। पठानकोट के हमले के बाद भारत का स्पष्ट रुख था कि जब तक कि पाकिस्तान प्रभावी तरीके से आतंकी गुटों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करता, उससे कोई बात नहीं होगी।


या तो एनडीए सरकार पाकिस्तान से निपटने का रास्ता नहीं तलाश पा रही है, या फिर भारतीय क्रिकेट प्रेमियों की तरह उसे भी लग रहा था कि इमरान खान द्विपक्षीय संबंधों में उम्मीद की नई किरण डाल सकते हैं। यह हकीकत से बहुत दूर है। इमरान खान न केवल एक क्रिकेटर के रूप में भारत विरोधी थे, बल्कि वह पाकिस्तानी सेना के चुने हुए प्रधानमंत्री हैं, लिहाजा वह अपने आकाओं की लाइन पर ही चलेंगे। 


तथ्य यह है कि नवाज शरीफ अपनी सीमाओं के बावजूद द्विपक्षीय संबंधों में सुधार लाने के लिए बेहतर विकल्प होते। इमरान द्वारा भारत से रिश्ते सुधारने की पेशकश करने के पीछे दुनिया की नजर में पाकिस्तान की छवि को बेहतर दिखाना था। इसलिए पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय भारतीय विदेश मंत्री से न्यूयॉर्क में मुलाकात करना चाहता था। और जब बातचीत रद्द कर दी गई, तो इमरान ने अपनी हताशा गैरकूटनीतिक और खीझ भरे ट्वीट से व्यक्त की और भारतीय प्रधानमंत्री को निशाना बनाया।


यदि भारतीय और पाकिस्तानी विदेश मंत्रियों के बीच मुलाकात हो जाती तो, फिर उन्हें इसे मनमर्जी से भुनाने से कोई नहीं रोक पाता और कहा जाता कि भारत और पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक संबंध बहाल हो गए हैं और अतीत को पीछे छोड़ दिया गया है। इससे भारतीय पक्ष पर दबाव बढ़ता और खासतौर से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई दिल्ली से यह बहुत साधारण सवाल किया जाता, 'क्या आप पाकिस्तान के साथ समग्र रूप से संबंध को आगे बढ़ाने के लिए तैयार हैं?' पाकिस्तान आतंकवाद पर अंकुश लगाने को तैयार ही नहीं, इसलिए भारत के पास यही विकल्प रह जाता कि वह शर्मिंदा होने के बजाय ऐसी किसी बातचीत से कदम खींच ले। आखिर हमारे विदेश मंत्रालय ने इसे पाकिस्तानी साजिश के नजरिये से क्यों नहीं देखा? या फिर हम खुद को लेकर इतना आश्वस्त हैं कि हम यह मानते हैं कि दुनिया सिर्फ इस पर गौर करेगी कि हमने क्या कहा?


पाकिस्तान के प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री के साथ भारतीय पक्ष की मुलाकात सिर्फ अच्छी तस्वीर का अवसर तो मुहैया करा सकती है, मगर भारत-पाकिस्तान संबंधों में वास्तविक गति तभी आ सकती है, जब पाकिस्तानी जनरल सार्वजनिक रूप से भारतीय नेतृत्व से संपर्क करें। लेकिन भारतीय नेता इसे लेकर हमेशा संकोच करते रहे हैं, यह मानते हुए कि भारत को पाकिस्तान में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करने में मदद करनी चाहिए इसलिए वे वहां के नागरिक नेताओं से बात करने को तरजीह देते रहे हैं। यह सब यही दिखाता है कि हमारे नीति निर्माता कितने भोले हैं। पाकिस्तान के निर्माण के समय से वहां की सत्ता का असली केंद्र सेना है। 


इसीलिए वहां सिर्फ ऐसे समझौतों को पाकिस्तानी सेना सम्मान देती है, जिनमें जनरलों के हस्ताक्षर होते हैं, मसलन संघर्ष विराम, नियंत्रण रेखा या सिंधु जल बंटवारे से संबंधित समझौते। दूसरी ओर लाहोर घोषणापत्र या ऊफा के संयुक्त बयान को पाकिस्तानी सेना ने कचरे के डिब्बे में डाल दिया। इसके अलावा भारत के प्रति शत्रुता का भाव रखना पाकिस्तान के भीतर वहां की अपनी सेना की भूमिका के लिहाज से आवश्यक है। भारत के प्रति शत्रुता के भाव से सेना को देश के बजट का बड़ा हिस्सा हासिल करने में मदद मिलती है और इससे भी अहम यह है कि वह एक तरह से ऐसी संस्था है जिसका आॅडिट नहीं होता और इस बात के प्रमाण मौजूद हैं कि पाकिस्तानी सेना की कमाई उसके रक्षा बजट की दोगुना है।
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लेकिन कोई सवाल नहीं उठाता कि सेना आखिर कारोबार कैसे कर रही है, क्योंकि यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मसला है। इसके अलावा भारत के प्रति शत्रुता का भाव पाकिस्तानी सेना के आर्थिक समाजिक एजेंडा के लिए अहम है। दुनिया को दिखाने के लिए वे राजनेताओं को भारत से संवाद करने के लिए कहते हैं और भारत तथा दुनिया में दूसरी जगह शांति के प्रयास इस जाल में उलझ जाते हैं। 


विदेश मामलों में मोदी सरकार को यदि बहुत कम हासिल हुआ है, तो वह है पाकिस्तान के प्रति भारत की नीति। अगले वर्ष होने वाले आम चुनाव से पहले उन्हें इसे समझने में और मदद मिलेगी। भारत के नीति नियंताओं को पहले उन चीजों की शिनाख्त करनी चाहिए जिससे वे पाकिस्तान पर दबाव बना सकते हैं। ये हैं सिंधु जलबंटवारा, बलूची राष्ट्रवाद और यदि पाकिस्तान के नागरिक और सैन्य नेतृत्व से मुलाकात होती है, और पाकिस्तान कश्मीर में आतंकवाद का कारोबार जारी रखता है, तो उसे मुंहतोड़ जवाब देने का संदेश दिया जाए। तभी दुनिया भारत के पक्ष में खड़ी होगी। 

मौजूदा समय में उसके पास दोनों पड़ोसी देशों के बीच तनाव पर गौर करने का कम वक्त है और तब तक उसका ध्यान नहीं जाएगा, जब तक कि उनके बीच जंग ही न छिड़ जाए! 
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