बहुराष्ट्रीय निगमों के काले कारनामों का भंडाफोड़ करने वाले 'आजादी बचाओ आंदोलन' के संस्थापक डॉ. बनवारी लाल शर्मा का न होना निश्चित ही, बहुराष्ट्रीय साम्राज्यवाद विरोधियों के लिए एक बुरी खबर है। चार दिन पहले 26 सितंबर को चंडीगढ़ में छिहत्तर वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। उससे एक दिन पहले ही उन्हें सांस में तकलीफ के कारण चंडीगढ़ के पीजीआई में भर्ती कराया गया था। अब भी डॉ. शर्मा का करीब तीन-चौथाई समय जनांदोलनों एवं सामाजिक कार्यों के निमित्त यात्रा में ही बीतता था और अभी वह मुख्य रूप से खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के खिलाफ सक्रिय थे।
डॉ. शर्मा धुन के पक्के और गजब के साहसी थे। छात्र-जीवन से ही वह निरंतर सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहे। कभी झुग्गी-झोंपड़ियों में जाकर गरीब बच्चों को पढ़ाना, तो कभी सांप्रदायिक दंगों के दौरान तनावपूर्ण इलाकों में जान की बाजी लगाकर सद्भावना संदेश एवं सहायता पहुंचाना उनके प्रारंभिक जीवन की अनिवार्यता थी। उनके प्रारंभिक सामाजिक अवदान को इलाहाबाद में वे सभी पुराने लोग जानते हैं, जो ‘इंसानी बिरादरी’ से किसी भी रूप में परिचित हैं। ‘इंसानी बिरादरी’ नामक संस्था की ओर से वह यह सब किया करते थे।
जुझारू व्यक्तित्व के धनी डॉ. शर्मा जेपी के प्रमुख सहयोगियों में थे। वह लंबे समय तक जेपी आंदोलन में सक्रिय रहे और आपातकाल के दौरान सत्तरह महीने जेल में गुजारे। वर्ष 1988-89 में इलाहाबाद में उन्होंने ‘लोक स्वराज अभियान’ नामक संस्था बनाई तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय के गांधी भवन की ओर से स्वदेशी एवं बहुराष्ट्रीय उपनिवेशवाद पर शोध एवं अनुसंधान का कार्य शुरू कराया। उस समय वह गांधी भवन के निदेशक थे और लगभग दो दशक तक इस पद पर बने रहे।
जनवरी 1992 में बहुराष्ट्रीय साम्राज्यवाद के विरुद्ध सेवाग्राम, वर्धा में उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर 'आजादी बचाओ आंदोलन' की स्थापना की। बीडी शर्मा, ठाकुरदास बंग, सुरेंद्र मोहन, किशन पटनायक, सिद्धराज ढड्ढा, जॉर्ज फर्नांडीस, मेधा पाटकर और वंदना शिवा जैसे लोग उनके आंदोलन के प्रारंभिक सहयोगी थे। इस आंदोलन ने देश भर में अमेरिका समर्थित नई अर्थनीति, उदारीकरण, भूमंडलीकरण, बहुराष्ट्रीय उपनिवेशवाद, अमेरिकी साम्राज्यवाद, विश्व बैंक एवं मुद्राकोष की जनविरोधी नीतियों, अपसंस्कृति आदि के खिलाफ जनमत तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। डंकल प्रस्ताव पर सबसे पहले अध्ययन एवं चर्चा-परिचर्चा को लेकर यह आंदोलन सुर्खियों में रहा।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अवकाश ग्रहण करने के बाद उनका पूरा समय जनांदोलनों को समर्पित था। बीती सदी के अंतिम दशक के मध्य में उनकी पहल पर जनांदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय भी बना, जिसमें लगभग तीन सौ संगठन शामिल थे। इस प्रकार, आजादी बचाओ आंदोलन के जरिये देश भर के जनांदोलनों को उन्होंने नई दिशा दी।
डॉ. शर्मा इलाहाबाद विश्वविद्यालय में गणित के प्राध्यापक थे। वह अनेक वर्षों तक पेरिस विश्वविद्यालय में शोध एवं अध्यापन कर चुके थे। पेरिस प्रवास के दौरान भी भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार के माध्यम से फ्रांस में वह भारतीयता का परचम लहराते रहे। वह फ्रेंच, जर्मन, रूसी जैसी अनेक भाषाओं के जानकार थे।
बहुराष्ट्रीय साम्राज्यवाद के विरुद्ध आंदोलन का शंखनाद करने वाली विशेषज्ञ पत्रिका मासिक नई आजादी उद्घोष के वह मुख्य संपादक थे। अंतरराष्ट्रीय स्तर की दो चर्चित पुस्तकों -ह्वेन कार्पोरेशन्स रूल द वर्ल्ड (लेखक: डेविड सी. कोर्टन) एवं द वर्ल्ड कान्सपिरेसी (लेखक: निकोला एम. निकोलोव) - का उन्होंने हिंदी में अनुवाद भी किया। ये दोनों पुस्तकें नवउपनिवेशवाद विरोधियों के बीच बेहद पसंद की गई हैं। वह समाजसेवी, लेखक, विचारक, गणितज्ञ तो थे ही, अपने इरादों पर चट्टान की तरह अटल रहने वाले फौलादी व्यक्तित्व के धनी एक ऊर्जावान आंदोलनकारी भी थे। उनके अंदर का ‘एक्टिविज्म’ उन्हें हमेशा ऊर्जा एवं आत्मविश्वास से लबालब रखता था। आज वह इस दुनिया में भले ही सशरीर नहीं हैं, लेकिन उनके व्यक्तित्व में मौजूद प्रेरणा के तत्व अजर-अमर हैं, जो नई पीढ़ी को हमेशा प्रेरणा देते रहेंगे।