नवाज शरीफ और नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद पाकिस्तान और भारत, दोनों ही जगहों पर गैरसरकारी संगठनों (एनजीओ) पर बहस तेज हो गई है। दरअसल इन दोनों प्रधानमंत्रियों के कुर्सी संभालने के समय इस्लामाबाद और नई दिल्ली में आतंकवादी घटनाएं बढ़ने और सुरक्षा का मामला बेहद महत्वपूर्ण होने के कारण अंदरूनी और विदेशी मामलों में बड़े बदलाव आए। इसमें कोई संदेह नहीं कि दोनों ही देशों में कुछ घरेलू और विदेशी एनजीओ ने बहुत अच्छे काम किए। जब गरीबी और जनसंख्या के बोझ से दबे दोनों देश अपने लोगों के लिए अवसर मुहैया नहीं करा पा रहे थे, तब इन स्वैच्छिक संगठनों का काम वाकई शानदार था।
पाकिस्तान में पिछले कुछ वर्षों में इन गैरसरकारी संगठनों ने इतना अच्छा काम किया कि बहुत सारे लोगों को अचंभा हुआ कि कुछ क्षेत्रों में सरकार शायद काम नहीं करना चाहती, इसीलिए गैरसरकारी संगठन उनका काम कर रहे हैं। सरकार को अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हटना चाहिए था। और न ही उसे गैरसरकारी संगठनों पर पूरी तरह निर्भर होना चाहिए था। लेकिन दुर्भाग्य से यही हुआ। मसलन, यह सुनने में आया कि भारत में मोदी सरकार ने ईसाई गैरसरकारी संगठनों पर रोक लगाई या उनकी फंडिंग रोक दी, जो ईसाई देशों से आती थी। अलबत्ता पाकिस्तान में ईसाई देशों की फंडिंग वाले गैरसरकारी संगठनों पर रोक लगाने की बात सोची ही नहीं गई। पाकिस्तान और भारत में इस फर्क की कई वजहें होंगी, लेकिन मेरे मुताबिक, इनकी सिर्फ दो ही वजहें हैं। जहां तक भारत की बात है, तो वह एक सेक्यूलर मुल्क है, पर अब वह बदल रहा है और वहां ईसाई देशों से फंडिंग हो रही है। दूसरी तरफ पाकिस्तान में सदियों पुरानी मदरसा व्यवस्था है, इसलिए यहां गरीब बच्चों के भोजन और शिक्षा के लिए मदद हमेशा पहुंचते हैं।
साल 2013 में पाकिस्तान में एक कानून बना, जिसके तहत विदेशी एनजीओ के लिए आथिक मामलों के विभाग से सहमति पत्र हासिल करना जरूरी बना दिया गया। सौ से अधिक गैरसरकारी संगठनों ने आवेदन किया, लेकिन सरकार ने उनमें से अनेक के आवेदनों को खारिज कर दिया। इस्लामाबाद यह बखूबी समझता है कि विदेशी फंडिंग वाली परियोजनाओं को हरी झंडी देने का मतलब है कि उनका एजेंडा भी विदेशी ही तय करेंगे। ऐसी कई विदेशी परियोजनाओं में पाकिस्तान के हितों के विपरीत काम हो रहा था। अब भले ही नवाज शरीफ सरकार और खासकर उनके आंतरिक मंत्री चौधरी निसार स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय एनजीओ पर कड़ी नजर रखते हैं, लेकिन डॉ. शकील अफरीदी के मामले को कोई भूल नहीं सकता।
दरअसल सीआईए ने पाकिस्तान में ओसामा बिन लादेन की शिनाख्त करने के लिए एक अभियान चलाया था, जो तब एबोटाबाद में छिपा हुआ था। डॉ. शकील अफरीदी तब एक विदेशी एनजीओ 'सेव द चिल्ड्रेन' के लिए काम करते थे। सीआईए ने उनका इस्तेमाल किया और उन्हें ओसामा के घर में रहने वाले लोगों के डीएनए सैंपल इकट्ठा करने की जिम्मेदारी सौंपी, ताकि यह पक्का पता चल सके कि ओसामा वाकई वहां रहते हैं। डॉ. शकील पाकिस्तान सरकार की मंजूरी के बगैर सीआईए के लिए काम करते थे। इसलिए ओसामा को मार गिराने के बाद शकील अफरीदी गिरफ्तार कर लिए गए, और वह अब भी जेल में हैं। पाकिस्तानी अधिकारियों का कहना है कि खुफिया विभाग 'सेव द चिल्ड्रेन' एनजीओ पर नजर रखे हुए था, पर वह इसका पता नहीं लगा सकता था कि उसका एक कर्मचारी सीआईए के लिए काम कर रहा था। पाकिस्तान में अपने देश के खिलाफ जासूसी करना जुर्म है, जिसके लिए भारी जुर्माना भरना पड़ता है। हालांकि अब इसके ब्योरे हैं कि सऊदी अरब में नवाज शरीफ और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की होने वाली मुलाकात से पहले डॉ. शकील अफरीदी को शायद दूसरे किसी देश भेज दिया जाएगा और बाद में उन्हें अमेरिकी शरण दे दी जाएगी।
भारत में मोदी सरकार की तरह यहां पाकिस्तान की नवाज शरीफ सरकार ने भी पाया कि अनेक गैरसरकारी संगठन इसका हिसाब नहीं देते कि उनकी फंडिंग कहां से हो रही है। अनेक स्थानीय और विदेशी एनजीओ अपनी फंडिंग का स्रोत छिपाते हैं। ऐसे एनजीओ में ऑडिट नहीं होता और वहां यह पता करने का कोई जरिया नहीं है कि अरबों डॉलर किन-किन मदों में खर्च हुए।
पाकिस्तान में ज्यादातर एनजीओ अपने कर्मचारियों को मोटी तनख्वाह देने के अलावा शानदार ऑफिस और कार वगैरह भी देते हैं। इस तरह एनजीओ को होने वाली फंडिंग का बड़ा हिस्सा उनके कर्मचारियों पर ही खर्च हो जाता है। हालांकि कुछ एनजीओ की साख भी है। जैसे,आईसीजी (इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप) पाकिस्तान का बेहतरीन एनजीओ माना जाता है और उसकी मुखिया डॉ. समीना अहमद की मुल्क में काफी इज्जत है। आईसीजी की रिपोर्टें पूरी तरह स्वतंत्र होती हैं और अफगानिस्तान व पाकिस्तान की पुलिस व्यवस्था पर जारी उसकी ताजा रिपोर्टें शानदार रही हैं। इससे पहले कश्मीर पर आईसीजी की रिपोर्ट भी शिक्षाप्रद थी। वहां के लोगों से बातचीत कर तैयार की गई उस रिपोर्ट में कश्मीर की वास्तविकता झलकती थी। हालांकि नरेंद्र मोदी सरकार सहित भारत की पिछली कुछ सरकारों ने आईसीजी पर अपनी नजरें टेढ़ी ही रखीं।
बेशक पाकिस्तान में विदेशी एनजीओ पर सख्त नजर रखी जाती है, लेकिन यह भी सच है कि यहां काम करने वाले ज्यादातर एनजीओ गरीब लोगों और समुदायों के लिए बेहतरीन काम कर रहे हैं। जब तक पाकिस्तान सरकार नागरिकों को जरूरी सहूलियतें मुहैया नहीं करातीं, तब तक इन गैरसरकारी संगठनों को गरीबों के लिए काम करते रहने की इजाजत देनी चाहिए। मुस्लिम दुनिया में मदरसे सबसे पुराने और सबसे बड़े एनजीओ माने जाते हैं। पर अफगानिस्तान पर सोवियत संघ के नियंत्रण के बाद मदरसे युवाओं को आतंकवादी बनाने का काम भी करते थे।