राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जब बीते रविवार को नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी के सभाकक्ष में एक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे, तो ऐसा लगा, मानो वह कांग्रेसजनों को संबोधित कर रहे हों। इसलिए नहीं, कि यह पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की जन्मशती के मौके पर उन पर केंद्रित संस्मरणों के संग्रह के विमोचन का कार्यक्रम था और वहां मौजूद लोगों में कांग्रेसी ही अधिक थे। दरअसल ऐसा इसलिए भी लगा, क्योंकि उन्होंने खुद भी देश की सबसे पुरानी पार्टी में छाई हताशा महसूस की।
राष्ट्रपति ने 1977 में कांग्रेस को मिली पराजय का जिक्र करते हुए इंदिरा गांधी की पलटवार करने की मजबूत इच्छाशक्ति का जिक्र किया। उन्होंने इंदिरा के साहसी फैसलों का जिक्र करते हुए बताया कि किस तरह उन्होंने 1984 में आतंकवादियों को खदेड़ने के लिए स्वर्ण मंदिर में सेना भेजने का फैसला किया। संभवतः ऐसा पहली बार है, जब इंदिरा के करीबी रहे किसी शख्स ने संकेत दिए कि पूर्व प्रधानमंत्री को इस बात का एहसास था कि इतिहास ऑपरेशन ब्लू स्टार को उनकी चूक के रूप में भी दर्ज कर सकता है, मगर जैसा कि उन्होंने कहा, कुछ ऐसे क्षण आते हैं, जब निर्णायक फैसले करने होते हैं।
उन्होंने यह भी बताया कि कैसे जनवरी 1978 में पार्टी की कमान संभालने के बाद इंदिरा ने महज तीन हफ्ते में पार्टी की निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था का पुनर्गठन कर पार्टी को आगामी चुनावों के लिए तैयार कर लिया था। इन शब्दों के जरिये मुखर्जी ने एक तरह से पार्टी के मौजूदा नेतृत्व को संदेश दिया है। आखिर 2014 में लोकसभा चुनाव में मिली भारी पराजय के तीन साल बाद भी कांग्रेस खुद को संगठित नहीं कर पाई है।
गांधी परिवार के सदस्यों सहित विपक्षी नेताओं के खिलाफ अभी जिस तरह से मामले खुल रहे हैं, उससे विपक्ष का मनोबल गिरा हुआ है। फिर सोनिया गांधी का स्वास्थ्य भी ठीक नहीं है। इंदिरा गांधी की स्मृति में हुए कार्यक्रम में भी वह नहीं आईं और उनका भाषण राहुल गांधी ने पढ़ा। अनुभव और प्रतिभाशाली नेताओं की मौजूदगी के बावजूद पार्टी में नए विचारों की कमी दिख रही है और इसके पीछे पार्टी में व्याप्त हताशा को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
इंदिरा गांधी की स्मृति में हुए कार्यक्रम को ही देखें तो, यह ऐसा कार्यक्रम था, जिसमें प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों तथा भाजपा सहित अन्य दलों के नेताओं की मौजदूगी हो सकती थी। लेकिन वहां कांग्रेसियों के अलावा राजनयिक और पत्रकार ही नजर आए। इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं, न कि कांग्रेस की। पता नहीं कि कांग्रेस ने अन्य पार्टियों के नेताओं को बुलाया नहीं या फिर वे खुद नहीं आए।
पिछले कई महीने से कहा जा रहा है कि कांग्रेस नेतृत्व संकट से जूझ रहा है। राहुल खुद को अभी साबित नहीं कर पाए हैं। कांग्रेस के संगठन चुनाव भी अभी होने हैं और संभावना है कि राहुल इस वर्ष के अंत तक पार्टी अध्यक्ष बन जाएंगे। फिर भी क्या ऐसा हो सकता है कि कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में कोई राहुल को चुनौती दे, जैसा कि एक बार दिवंगत जितेंद्र प्रसाद ने सोनिया गांधी को चुनौती दी थी? अधिकांश कांग्रेसजन इससे इन्कार करते हैं। एक सवाल यह भी है कि क्या अपने खराब स्वास्थ्य के बावजूद सोनिया कांग्रेस अध्यक्ष बनी रहें और कोई कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त कर लें?
कांग्रेस की ऐसी हालत के बावजूद सोनिया गांधी या फिर वह जिसे अधिकृत करें, वही विपक्ष की एकता का सूत्रधार हो सकता है। दरअसल विपक्ष के तमाम नेता, जिनमें हाल ही में उत्तर प्रदेश में बुरी तरह पराजित हुई मायावती भी शामिल हैं, यह मानते हैं कि विपक्षी दल एकजुट होकर ही भाजपा का मुकाबला कर सकते हैं। विपक्षी दलों के नेता सोनिया की सुनते हैं। राष्ट्रपति पद के चुनाव में विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार पर आमराय बनाने के लिए नीतीश कुमार ने सोनिया से बात की है। तो खुद सोनिया ने सीताराम येचुरी, शरद यादव, लालू प्रसाद यादव जैसे नेताओं से बात की। राहुल को ऐसी भूमिका निभाने में कठिनाई होगी। इसके अलावा नरेंद्र मोदी की अक्षुण्ण लोकप्रियता के कारण भी भाजपा के समक्ष कोई चुनौती नहीं है।
राष्ट्रपति चुनाव से इतर विपक्षी एकता के संभावित सूत्रधार के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं कि इस वर्ष और अगले वर्ष होने वाले विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों के लिए वह विपक्षी दलों को एक मंच पर लाए, या सबको स्वीकार्य किसी नेता के नाम पर सहमति बनाए, बल्कि उसे प्रयास करने होंगे कि किस तरह एक-एक सीट पर संयुक्त उम्मीदवार खड़ा कर भाजपा को सीधी चुनौती दी जाए। हाल ही में विधानसभा के उपचुनावों में देखा गया कि कर्नाटक में कांग्रेस इसलिए जीत सकी, क्योंकि जनता दल (एस) ने उसके खिलाफ उम्मीदवार नहीं खड़ा किया था। झारखंड में जेएमएम उम्मीदवार के समक्ष कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार खड़ा नहीं किया, जिससे जेएमएम उम्मीदवार जीत गया। मध्य प्रदेश में बसपा नहीं थी, इसलिए कांग्रेस उम्मीदवार जीत गया। दिल्ली में एमसीडी के चुनाव में आप और कांग्रेस के मतों का जोड़ तीनों एमसीडी जीतने वाली भाजपा से अधिक होता है। यानी विपक्ष के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती उसकी एकता को लेकर है।
इस सवाल का जवाब नहीं दिया जा सकता कि राष्ट्रपति भवन से हटने के बाद प्रणब मुखर्जी किस भूमिका में नजर आएंगे। मगर यह साफ है कि विपक्ष को मोदी-शाह-भागवत-योगी के भारत में नई रणनीति और नए विचार के साथ मैदान में उतरना होगा। अतीत में जिस तरह से कुछ पार्टियां इकट्ठा होकर गठबंधन बना लेती थीं, वैसा घिसा-पिटा फॉर्मूला अब काम नहीं करेगा। दरअसल कोई भी नया विकल्प तब तक नहीं उभर सकता, जब तक कि विपक्षी नेता अपने अहं को किनारे नहीं रख देते।