अपनी अनेक विशेषताओं व गुणों के साथ आदिवासी समुदायों की जीवन-शैली ग्राम-स्वराज व आत्म-निर्भरता के अधिक अनुकूल है, पर हाल के दशकों में स्वराज व आत्म-निर्भरता की इन प्रवृत्तियों में कमी आई है। इस वजह से आदिवासी समुदायों में प्रवासी-मजदूरी पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। इसके लिए ‘वाग्धारा’ ने आदिवासियों, विशेषकर भील समुदाय के परंपरागत ज्ञान को समझने और इसे समुचित महत्व देने का रास्ता चुना है। वाग्धारा का कार्यक्षेत्र वे गांव हैं, जो राजस्थान, मध्य प्रदेश व गुजरात की सीमाओं पर बसे हैं और जहां आदिवासी समुदायों की बहुलता है। वाग्धारा ने ‘स्वराज’ आधारित अपने कार्य तीन सिद्धांतों के अंतर्गत किए हैं-सच्ची खेती, सच्चा बचपन और सच्चा लोकतंत्र।
वाग्धारा के जयेश जोशी के मुताबिक, सच्ची खेती आदिवासी, विशेषकर भील समुदाय के परंपरागत ज्ञान और व्यवस्थाओं पर आधारित है। ‘हलमा पद्धति’ के अंतर्गत किसान एक-दूसरे की सहायता से कृषि कार्य, बिना किसी मजदूरी भुगतान के कर लेते हैं। ‘हांगड़ी’ मिश्रित-खेती की एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें अनेक अच्छे पोषक फसलों को एक साथ उगाने और एक-दूसरे की पूरक होने की सोच निहित है। ऐसी परंपरागत व्यवस्थाओं के गुणों व महत्व को पहचानते हुए इसे आगे बढ़ाने का काम किया गया है। इस तरह से आदिवासी समुदाय में अपने परंपरागत ज्ञान के प्रति आत्म-विश्वास नए सिरे से प्रतिष्ठित हुआ है। इससे प्रवासी मजदूरी पर निर्भरता छोड़ने के लिए वे प्रेरित हुए हैं।
इस क्षेत्र में 100 से अधिक खाद्यान्न उगाए जाते हैं या एकत्र किए जाते हैं। इतनी जैव-विविधता से समृद्ध समुदाय को फिर पिछड़ा हुआ कैसे कहा जा सकता है, जबकि दो-तीन फसलों पर आश्रित गांवों को ‘विकसित’ माना जाता है? बीजों को बचाने, उनकी गुणवत्ता बेहतर करने, मिट्टी व जल-संरक्षण के तौर-तरीके बेहतर करने जैसे कार्य भी ऐसे ही विमर्श के आधार पर आगे बढ़े हैं। जैविक खेती नए सिरे से पनपी है। मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने, मिट्टी और जल-संरक्षण का महत्व भी बेहतर ढंग से समझा जा रहा है। फलों के पेड़ तो बढ़े ही हैं, साथ ही चारे, बांस, आदि को भी बढ़ाया जा रहा है।
बैलों का अभी स्थानीय कृषि में महत्वपूर्ण स्थान बना हुआ है। बकरी पालन पहले भी महत्वपूर्ण था, आज भी है। अनेक किसान अब भैंस भी पाल रहे हैं। ‘मोटे अनाजों’ व ‘मिलेट’ के महत्त्व को नए सिरे से पहचाना जा रहा है। सब्जियों के उत्पादन में महत्त्वपूर्ण वृद्धि हुई है व पोषण वाटिकाएं, ‘किचन गार्डन’ भी बहुत हरे-भरे हैं। एक बड़ा प्रयास यह है कि कृषि व पोषण में बहुत सामंजस्य हो। रासायनिक खाद, कीटनाशक दवा आदि खरीदने की प्रवृत्ति अब कृषि में पहले से बहुत कम है।
'सच्चा बचपन' के अंतर्गत विभिन्न गांवों में ‘बाल अधिकार मंच’ स्थापित करने, सभी बच्चों को स्कूली शिक्षा सुनिश्चित कराने, शोषण से प्रभावित बच्चों की रक्षा करने, अनाथ बच्चों तक जरूरी सुविधाएं पहुंचाने, शिक्षा व बाल-विकास संबंधी मामलों में बच्चों की भागीदारी बढ़ाने व विशेष पोषण अभियानों जैसे कार्य निरंतरता से किए जाते हैं।
‘सच्चे लोकतंत्र’ सिद्धांत के अंतर्गत स्थानीय स्तर पर विभिन्न तरह के स्वराज व आत्म-निर्भरता बढ़ाने वाले संगठन बनाए गए हैं, जैसे–‘जनजातीय स्वराज संगठन’ व ‘जनजातीय विकास मंच।’ ‘स्वराज मित्र’ भी इन प्रयासों से जुड़ा है। साथ ही जनजातीय स्वावलंबन के लिए शिविर आयोजित किए गए हैं। सरकार की विभिन्न परियोजनाओं व कार्यक्रमों के बेहतर क्रियान्वयन के भी निरंतर प्रयास किए जाते हैं। (सप्रेस)