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एक नई दुनिया बन रही है: विश्वयुद्ध होना तय नहीं, हथियारों से लैस ताकतों के बीच विनाशकारी टकराव का खतरा करीब

मार्गरेट मैकमिलन (द न्यूयॉर्क टाइम्स) Published by: ज्योति भास्कर Updated Sun, 27 Sep 2026 08:35 AM IST

सार

बड़ी ताकतें ऐसे देशों के साथ असमान युद्धों में फंसी हुई हैं, जो नई टेक्नोलॉजी का भरपूर फायदा उठा रहे हैं। विश्वयुद्ध होना तय नहीं है, लेकिन बड़े और भारी हथियारों से लैस ताकतों के बीच किसी विनाशकारी टकराव का खतरा दशकों के मुकाबले अब ज्यादा करीब है। हम अव्यवस्था के एक नए दौर में पहुंच गए हैं। हमें खुद को तैयार करना होगा; इसकी शुरुआत इस बात को ईमानदारी से स्वीकारने से होगी कि हम एक बेहद गंभीर समय से गुजर रहे हैं।
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इतिहास में जितनी बार भी युदध हुआ, प्लेग फैला है - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स


जब कोई तूफान आने वाला होता है, तो उसके संकेत मिलने लगते हैं। हो सकता है कि हम उन्हें गलत समझें या उन पर ध्यान न दें, जैसे बारिश शुरू होने पर हम सोचते हैं कि यह बस थोड़ी देर की बौछार है, लेकिन बाद में पता चलता है कि यह किसी बड़े तूफान का संकेत था। असल परेशानी तभी शुरू होती है। जो बात मौसम के बारे में सच है, वही मनुष्यों पर भी लागू होती है। सरकारें तब तक मजबूत लगती हैं, जब तक वे अचानक कमजोर नहीं पड़ जातीं। देश के अंदर होने वाली क्रांतियां और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में उथल-पुथल, दोनों अक्सर साथ-साथ चलते हैं। इन्हें बाद में तो आसानी से समझा जा सकता है, पर इनके होने का पहले से अंदाजा लगाना हमेशा संभव नहीं होता। फिर भी, अगर हम बारीकी से देखें, तो अक्सर इसके संकेत मिल ही जाते हैं।


हममें से जो लोग स्थिर व व्यवस्थित समाजों में रहते हैं, वे वोल्टेयर के डॉ. पैंग्लॉस की तरह (जो एक मुसीबत से दूसरी मुसीबत में फंसते रहते हैं) यह मानना चाहेंगे कि ‘सब कुछ अच्छे के लिए ही हो रहा है।’ हम अर्थव्यवस्था या किसी युद्ध की आशंका को लेकर शिकायत कर सकते हैं, पर हमें यह यकीन नहीं होता कि हमारी दुनिया पूरी तरह उलट-पुलट हो जाएगी। बेहतर होगा कि हम एक और फ्रेंच लेखक की चेतावनी पर ध्यान दें। अल्बेयर कामू के युद्ध के बाद के उपन्यास द प्लेग में, जब अल्जीरिया के शहर ओरान की सड़कों पर मरे हुए चूहे दिखाई देते हैं और लोग एक रहस्यमयी बीमारी की चपेट में आने लगते हैं, तो स्थानीय सरकार और नागरिक इन संकेतों को तब तक नजरअंदाज करते रहते हैं, जब तक कि बहुत देर नहीं हो जाती। कामू का कथावाचक कहता है, ‘इतिहास में जितनी बार युद्ध हुए हैं, उतनी ही बार प्लेग भी फैला है, फिर भी प्लेग और युद्ध हमेशा लोगों को चौंका देते हैं।’


आज चारों तरफ मरे हुए चूहे पड़े हैं। इस गर्मी में तापमान के नए रिकॉर्ड बने और टूटे हैं, जमीन सूखे की मार झेल रही है और जंगलों में आग लगी हुई है। विकसित अर्थव्यवस्थाओं पर कर्ज ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच रहा है। चिकित्सा और खाने-पीने की मदद में कटौती (खासकर अमेरिका की तरफ से) के कारण बेवजह मौतें हुई हैं और बीमारियां फैली हैं। इनमें से कोई एक बीमारी कभी-न-कभी एक और महामारी बन सकती है। एआई तेजी से और बिना किसी नियम-कानून के बढ़ रहा है, जिससे नौकरियों और सुरक्षा को खतरा है। कुछ बुरे अनुमानों के अनुसार, मनुष्यों के अस्तित्व पर भी खतरा मंडरा रहा है। संशोधनवादी ताकतें नियमों और मानदंडों का खुलेआम उल्लंघन करती हैं। मतदाता नाराज व अस्थिर हैं। धीमी, सोची-समझी और विवेकपूर्ण कूटनीति, जो विश्वास तथा समझ का निर्माण करती है, अब एक दिखावटी, उद्दंड शैली में बदल गई है।


बड़ी ताकतें ऐसे देशों के साथ असमान युद्धों में फंसी हुई हैं, जो नई तकनीकों का भरपूर फायदा उठा रहे हैं। यूक्रेन में रूस का युद्ध पांचवें साल भी खिंच रहा है। ईरान ने अमेरिकी सेनाओं और सहयोगियों पर हमले के लिए सस्ते और बड़े पैमाने पर बनने वाले ड्रोन का इस्तेमाल करके, विश्व व्यापार के एक अहम मार्ग होर्मुज पर कब्जा कर लिया है, अमेरिका के मिसाइल भंडार को कम कर दिया है और राष्ट्रपति ट्रंप को उनकी अपनी पसंद के युद्ध में फंसा दिया है। विश्वयुद्ध होना तय नहीं है, लेकिन बड़े और भारी हथियारों से लैस ताकतों के बीच किसी विनाशकारी टकराव का खतरा दशकों के मुकाबले अब ज्यादा करीब है।


कामू के ओरान शहर के लोगों की तरह, हम भी यह मानने से हिचकिचाते हैं कि दुनिया कितनी बदल गई है। समस्याएं मुश्किल, पेचीदा और थकाऊ हैं, और उनसे मुंह मोड़ लेना आसान है। इसलिए, जब जंगल की आग फैल रही होती है, तब हम समुद्र के किनारे छुट्टियां मनाते हैं। हम चाहते हैं कि एआई ही हमारे लिए सोचे। हम उम्मीद करते हैं कि युद्ध खत्म हो जाएंगे। दुनिया वैसी ही बनी रहेगी और चलती रहेगी, जैसी हम उसे समझते हैं। लेकिन, तेजी से एक नई वास्तविकता सामने आई है। हम अव्यवस्था के एक नए दौर में पहुंच गए हैं। हमें खुद को तैयार करना होगा; इसकी शुरुआत इस बात को ईमानदारी से समझने से होगी कि हम एक बेहद गंभीर समय से गुजर रहे हैं और यह मानना होगा कि हमारा कमजोर सिस्टम लड़खड़ा रहा है। आज जनता नाराज है। ऐसे अमीर और प्रभावशाली लोग भी हैं, जिन्हें जनता ने नहीं चुना है, पर उनके पास इतनी दौलत और ताकत है कि वे सरकारों के फैसलों को प्रभावित कर सकते हैं। वहीं कुछ नेता दूसरों की राय सुनने या सबकी सहमति से फैसले लेने से बचते हैं।


जो लोग चेतावनी के संकेतों को नजरअंदाज करते हैं और इतिहास को बेकार मानकर छोड़ देते हैं, वे तब हैरान और परेशान हो सकते हैं, जब उनके साथ अनचाही घटनाएं घटती हैं। शीत युद्ध के अंत और सोवियत संघ के खत्म होने के बाद, अमेरिका 1945 के बाद बनी व्यवस्था को बनाए रखने की जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार लग रहा था, पर ट्रंप के दौर में ऐसा नहीं है। हो सकता है कि किसी दूसरे राष्ट्रपति के दौर में, अमेरिका फिर से दुनिया की सबसे बड़ी ताकत की भूमिका निभाए। शायद दुनिया फिर से उसी तरह शांति से चले, जैसे 1945 के बाद से चल रही थी। हो सकता है कि बड़ी ताकतें (जिनमें अब चीन और भारत भी शामिल हैं) आपस में मिल-जुलकर काम करें और ‘अंतरराष्ट्रीय समुदाय’ गरीबी, अन्याय, टकराव और जलवायु परिवर्तन को खत्म करने के लिए फिर से प्रतिबद्ध हो जाएं। लेकिन, फिलहाल तो स्थिति यह है कि नेपाल और तिब्बत में बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएं आती हैं, और यह साफ नहीं होता कि मदद के लिए कौन आ रहा है। टकराव होते हैं, तो उन्हें सुलझाने वाला कोई स्पष्ट मध्यस्थ नहीं होता। नाटो जैसे भरोसेमंद गठबंधनों की बार-बार परीक्षा हो रही है और हो सकता है कि वे टूट भी जाएं। यूरोप के साथ रूस का हाइब्रिड वॉर बढ़ रहा है; ताइवान को लेकर चीन और अमेरिका के बीच टकराव हो सकता है; गर्म और सूखे होते जा रहे इस संसार में संसाधनों के लिए हो रही होड़ पहले से ही हिंसा को बढ़ावा दे रही है।
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यह दुनिया अनिश्चितताओं से भरी है, जहां हम अपनी उम्मीद से कहीं ज्यादा अपने नेताओं की मर्जी पर निर्भर हैं। ये नेता बाहरी नियमों या बंधनों से कम बंधे होते हैं और हालात के हिसाब से फैसले लेने में खुद को ज्यादा स्वतंत्र महसूस करते हैं। ऐसे में, हमें इन फैसले लेने वालों को पहले से कहीं ज्यादा सावधानी से चुनना चाहिए, जबकि देखा यह जा रहा है कि मतदाता ऐसा करने में कम दिलचस्पी ले रहे हैं। ये काले बादल हैं।


हमारे पास अब भी एक असरदार विश्व व्यवस्था के कई हिस्से मौजूद हैं। हमारे पास वैश्विक संस्थाओं का एक बड़ा नेटवर्क है, जो देशों के बीच नागरिक उड्डयन से लेकर इंटरनेट तक के संबंधों को संभालती हैं। अंतरराष्ट्रीय जनमत का होना ही हमारे नेताओं पर दबाव डाल सकता है। कमजोर पड़ते ढांचों वाले कई संगठनों (जिनमें संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन और विश्व बैंक शामिल हैं) के संसाधन और महत्व लगातार कम हो रहे हैं, लेकिन वे अब भी मौजूद हैं। बदलाव मुश्किल होता है, लेकिन पुराने तरीकों से चिपके रहना एक खतरनाक भ्रम हो सकता है।

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