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खोखली राजनीति का नया दौर

मनीषा प्रियम
Updated Tue, 28 Nov 2017 07:07 PM IST
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विरोध प्रदर्शन
गुजरात में राज्य विधानसभा चुनाव भारतीय राजनीति के नए दौर का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। 2012 में इसी राज्य में चुनाव के समय विकासवाद की बात भाजपा ने बहुत दावे के साथ राष्ट्रीय पटल पर रखी थी। मोदी के समय में गुजरात में किए गए विकास को बाद में भाजपा ने एक राष्ट्रव्यापी चुनाव का मुद्दा बनाकर पेश किया। लघु सिंचाई, बिजली वितरण (विशेष रूप से कृषि के लिए), मृदा स्वास्थ कार्ड निर्माण, गरीब कल्याण मेला, इन सबके साथ-साथ मोदी ने गुजरात को निवेश का आकर्षक गंतव्य बना दिया। हालांकि मोदी के आलोचक 2002 के दंगे की गुहार लगाते रहे, पर उन दंगों के एक दशक बाद मोदी ने विकासवाद के नाम पर सिक्का जमा ही लिया। यह एक ऐसा युग था, जब कई राज्यों में विकासवादी मुख्यमंत्री सीईओ की भांति कमान संभाले हुए थे। मोदी मॉडल की तुलना बिहार के नीतीश मॉडल से भी की गई। नीतीश ने स्कूली शिक्षा और सड़कों पर भरपूर मेहनत की थी। यही नहीं, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह को जन वितरण प्रणाली में सुधार के लिए चावल बाबा की उपाधि दी गई, तो शिवराज सिंह चौहान को लाडली लक्ष्मी जैसी कन्या उन्मुख योजनाओं के लिए मामा कहा गया। ऐसा लगा, जब नरेंद्र मोदी देश की गद्दी पर बैठेंगे, तो विकासवाद की राजनीति का नया दौर देखने को मिलेगा। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भी गरीबों का भरोसा नरेंद्र मोदी पर कुछ इन्हीं कारणों से बना-नौकरियां मिलें, महंगाई कम हो, और लोक कल्याण सेवा में इजाफा हो। कुछ इसी आस के सहारे उत्तर प्रदेश में भी नरेंद्र मोदी ने दो क्षेत्रीय दलों को झटका दे डाला। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी पर मोदी ने यह आरोप लगाया कि उन्होंने विकासवाद को बनवास दे दिया।


अब गुजरात का चुनाव फिर से आ पहुंचा है। वह धरती, जो मोदी की राजनीति की जननी है, और जहां विकास के मुद्दों का प्रखर समर्थन होना चाहिए था, वहां विधानसभा चुनाव के आते ही इस पूरी बहस को एक स्थानीय चुनौती मिल रही है। तेईस वर्षीय युवा नेता हार्दिक पटेल संभ्रांत घरों के युवाओं के बेरोजगार होने का मुद्दा बखूबी उठाते हैं और आसरा आज भी आरक्षण का ही है। यानी जितनी नौकरियां हैं, उन्हें जाति के आधार पर बांट-बखरा कर दो। जिस समाज में विकासवाद की लहर के साथ जातिगत अस्मिता कम होनी चाहिए थी, वहां अब लोग अपनी उप-जाति का भी ब्योरा देकर यह कहने में भी हिचकिचाते कि वे अमुक जाति की अमुक भाग के मूल वंशज हैं। यानी केवल पटेल नहीं, उनके भीतर नेउआ और कड़वा पटेल नामक उप-जातियां सामाजिक परिभाषा के आधार पर नौकरियों के बांट-बखरे की बात सांविधानिक डंडे के सहारे से करने की बात करती हैं। कहां गया वह विकास, जिसमें 23 -24 साल के युवाओं (और आशा करती करती हूं युवतियों) को भी सहारा अब केवल एक मिथक-इतिहास का है, जिसमें उनके पूर्वज किसी उप-जाति की गोद में पैदा हुए।


भाजपा के विरोधियों ने गुजरात में 'विकास गांडो थायो छे' का नारा दिया। जवाब में भाजपा ने फिर से दोहराया, ‘हम हैं विकास, हम हैं गुजरात। ‘यानी विकास के नाम पर बहुत कुछ करने के बाद भी जनमानस को आंदोलित करने का सबसे पुख्ता हथियार अब भी जाति, उपजाति, जनजाति का मिथक या विवादित इतिहास ही रह गया है। जहां कांग्रेस पार्टी ने जवाब में फिर से वही उत्तर पेश किया, जो लगभग चार-पांच वर्षों से वह कहती आ रही है कि उसके युवा नेता राहुल गांधी युवाओं के सहारे नवसृजन करेंगे, वहीं एक अद्भुत राजनीतिक खेल विषयांतर रणनीति की तरह खेला गया। जहां संघर्ष चुनावी रणभूमि में विकास के मुद्दों पर होना था, वहां एक फिल्म के पोस्टर फाड़ने और उसके अभिनेता, अभिनेत्रियों, निर्देशक आदि पर शारीरिक हमले की धमकी की आड़ में जाति और धर्म की विभाजक रेखाओं को जगाने का काम किया गया। इक्सीसवीं सदी के इस दूसरे दशक में फिल्म पद्मावती के बहाने म्यान से तलवारें ऐसे निकल पड़ी हैं, जैसे अलाउद्दीन खिलजी चित्तौड़गढ़ के दरवाजे पर खड़ा हो। कई राजघराने अपनी वंशावली का दो सौ-तीन सौ साल पूर्व का ब्योरा दिखलाते हैं और मान-मर्यादा की मूंछ को फिल्म के पोस्टर से लगी चोट को चीख-चीखकर जनमानस पर अंकित करते हैं। भारतीय सेना के बदले करणी सेना और महिला विकास मंत्रालय के बदले जौहर सम्मान और संरक्षण संस्था की आवाज ज्यादा सुनने को मिलती है। समझ में यह नहीं आता कि विकास के मायने समय की गति में आगे बढ़ना है या घड़ी की सूई ही नहीं, कालखंड में कहीं पीछे चले जाना है। फिल्म पद्मावती के मामले पर उत्तर प्रदेश, राजस्थान के मुख्यमंत्री सेंसर बोर्ड को यह कह रहे हैं कि फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगा दी जाए। कांग्रेसी मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह भी इसका समर्थन करते नजर आ रहे हैं। यानी भारत के मुख्यमंत्रियों में आज यदि कोई सबसे बड़ी सहमति है, तो वह है पद्मावती  के प्रदर्शन पर रोक लगाने की।


शायद मलिक मुहम्मद जायसी ने जब पद्मावत की रचना की थी, तब भी ऐसा विरोध न हुआ होगा, जैसा कथित विकासवाद के इस नए दौर में हो रहा है। एक ऐसा दौर चल पड़ा है, जिसमें खोखली नीतियों को विकासवाद के नाम पर पेश किया जा रहा है। बिहार में नीतीश कुमार ने नशाबंदी लागू की है और गुजरात में यह बहुत पहले से लागू है। इसी तरह अरविंद केजरीवलाल ने ऑड-ईवन शुरू किया था। इन सबके साथ ही मोदी की विमुद्रीकरण को भी इसी क्रम में रखा जा सकता है। इन सभी में सत्ता प्रतिष्ठान को कुछ नहीं करना होता है, पर नागरिकों को इन पर अमल करने के लिए सब कुछ करना होता है। और फिर भी यदि लोक कल्याण का उद्देश्य प्राप्त नहीं हो, तो मिथक-इतिहास के नाम पर गली-नुक्कड़ में सर-फुटौव्वल का सहारा लिया जाता है। संविधान की अक्षुण्णता को कायम रखना यानी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संरक्षण करना राज्य की जिम्मेदारी है। मगर पद्मावती पर एक कैमरे की टिप्पणी आज इस संरक्षण की मोहताज है।
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