फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

अमृतकाल : यह अब सिर्फ 'आकाशवाणी' है, भारत की सार्वजनिक रेडियो प्रसारण सेवा का नया नाम

उमेश चतुर्वेदी
Updated Thu, 18 May 2023 06:52 AM IST

सार

भारत के सार्वजनिक रेडियो प्रसारण सेवा को ‘ऑल इंडिया रेडियो’ के नाम से जाना जाता रहा है, पर अब इसे सिर्फ आकाशवाणी के नाम से जाना जाएगा।
विज्ञापन
विज्ञापन
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : सोशल मीडिया


हालांकि 1957 में इसके नाम का भारतीयकरण करके आकाशवाणी कर दिया गया था। हिंदी फिल्मों के मशहूर गीतकार और निराला के समकालीन कवि पंडित नरेंद्र शर्मा के सुझाव पर यह नाम रखा गया। पर रेडियो प्रसारण के लिए हिंदी समेत कुछ ही भारतीय भाषाओं में आकाशवाणी नाम का प्रयोग होता था। आजादी के अमृतवर्ष में अब ऑल इंडिया रेडियो बीते दिनों की बात होने की तरफ बढ़ चला है। तीन मई, 2023 से अब सार्वजनिक प्रसारक को सिर्फ आकाशवाणी नाम से ही जाना जाएगा।


तीन मई को जब सार्वजनिक प्रसारण सेवा नियंत्रक प्रसार भारती ने अपनी रेडियो प्रसारण सेवा के लिए सिर्फ आकाशवाणी नाम का प्रयोग करने का निर्देश दिया, तब संयोग से कर्नाटक में विधानसभा चुनाव चल रहे थे। जैसी कि 1937 से ही रवायत है, जब भी हिंदी का प्रयोग शुरू होता है, दक्षिण भारत से जानबूझकर विरोध की कुछ आवाजें उठती हैं। लेकिन आवाज उठाने वाले शायद एक तथ्य से अनजान रहे। सार्वजनिक रेडियो प्रसारण के लिए आकाशवाणी नाम भले ही 1957 में दिया गया, पर भारत में आजादी से काफी पहले ही आकाशवाणी नाम से एक रेडियो स्टेशन शुरू हो चुका था।


दिलचस्प यह है कि 10 सितंबर, 1935 को शुरू हुआ यह स्टेशन अंग्रेज सरकार या किसी राजपरिवार का नहीं था, बल्कि यह मैसूर के अवकाश प्राप्त प्रोफेसर एमवी गोपालस्वामी का था। मैसूर राजमहल से करीब दो सौ मीटर दूर स्थित अपने घर से उन्होंने यह स्टेशन शुरू किया था। कर्नाटक के चुनाव में मुद्दा बनाने की कोशिश में जुटे लोगों को जैसे ही पता चला कि आकाशवाणी नाम से उनके ही राज्य के प्रमुख शहर मैसूर में आजादी के पहले ही रेडियो स्टेशन प्रसारण कर रहा था, तो जैसे उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। प्रोफेसर एमवी गोपालस्वामी ने अपने रेडियो स्टेशन का नाम ‘आकाशवाणी मैसूर’ रखा था। आकाशवाणी मैसूर का प्रसारण शुरू होने के ठीक आठ महीने 28 दिन बाद आठ जून, 1936 को भारत सरकार ने ऑल इंडिया रेडियो शुरू किया था।


जब भी हिंदीकरण की शुरुआत होती है, या उसे बढ़ावा देने की बात होती है, दक्षिण के अलावा पश्चिम बंगाल से भी विरोध की आवाज उठती है। यह हैरत की ही बात है कि जिस पश्चिम बंगाल की धरती पर हिंदी पत्रकारिता परवान चढ़ी, जिस बंगाल के मनीषी केशवचंद्र सेन ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का सुझाव दिया, जिसकी माटी से उपजे सुभाषचंद्र बोस ने राष्ट्र के संबोधन के लिए हिंदी को चुना, उस बंगाल की धरती से भी हिंदीकरण की प्रक्रिया का विरोध होता है।


शुक्र की बात यह है कि ऑल इंडिया रेडियो के आकाशवाणीकरण की प्रक्रिया का कोई विरोधी सुर बंगाल की धरती से नहीं उठा। बहुत कम लोगों को पता होगा कि साल 1939 में ऑल इंडिया रेडियो के कलकत्ता केंद्र से शॉर्ट वेब के प्रसारण की शुरूआत हुई थी। उस समय नोबेल पुरस्कार विजेता गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर से रेडियो के लिए संदेश मांगा गया था। तब उन्होंने एक कविता के माध्यम से शुभकामना संदेश भेजा था। आकाशवाणी नामक उस कविता का भावार्थ हैः धरती से आसमान तक/नाप ली गईं दूरियां/प्रकाश की लहरों में.../पूर्व और पश्चिम तक जुबान/ सूरज की किरणों सी पहुंचीं/स्वर्ग की सीमा तक पहुंचा/ मानव का मन/जीत गई मन की आजादी।


प्रसार भारती अधिनियम में भी आकाशवाणी नाम ही देने की बात कही गई है। 15 नवंबर, 1997 से प्रसार भारती कानून लागू हुआ, पर इसे नौकरशाही की अंग्रेजीपरस्ती कहें या कुछ और, आकाशवाणी शब्द को सार्वजनिक रेडियो प्रसारक के तौर पर मुकम्मल इस्तेमाल की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया।
विज्ञापन


-लेखक प्रसार भारती के कंसल्टेंट हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next