पांच दशक पहले 22 अप्रैल, 1970 को पहली बार पृथ्वी दिवस मनाया गया था, ताकि पर्यावरण को हो रहे नुकसान के रूप में हमारे अपने ग्रह के भविष्य को मिल रही चुनौतियों की ओर गंभीरता से ध्यान आकर्षित किया जा सके। यहां तक कि उस समय भी बेहिसाब ढंग से लैंड यूज बदले जा रहे थे, प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन, पारिस्थितिकी के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्रों में अतिक्रमण, वन्यजीवों के प्रति अपराध और अंधाधुंध विकास शुरू हो चुका था, जिससे पृथ्वी के सीमित संसाधनों को नुकसान पहुंचने लगा।
दुर्भाग्य से ये सारी चिंताएं और मुद्दे कम होने के बजाय बरस दर बरस कई गुना बढ़ते चले गए। यह ग्रह, जिसे हम अपना घर कहते हैं, नष्ट हो रहा है। पृथ्वी सचमुच गंभीर संकट से गुजर रही है। लेकिन यह सुन कौन रहा है? धरती की सर्वाधिक बुद्धिमान प्रजाति होने के बावजूद हम हमेशा की तरह 'यह सब तो चलता रहता है' वाले रवैये पर कायम हैं।
पर्यावरण, वन्यजीव और प्राकृतिक संसाधन हमारी प्राथमिकताओं में सबसे निचले क्रम पर हैं। मगर हमारा ग्रह आज किस संकट में है और इसका हम पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह सवाल मौजूं हो गया है। विकास के नाम पर बड़े औद्योगिक घराने और नेतागण धरती का उसकी क्षमता से परे जाकर शोषण कर रहे हैं।
जलवायु परिवर्तन, गर्म होते हमारे महासागर, समुद्र तल का बढ़ता स्तर और बढ़ती अम्लीयता आज ऐसी सच्चाई है, जिससे हमारी खाद्य सुरक्षा और धरती के पूरे जीवन पर खतरा मंडरा रहा है। ऑस्ट्रेलिया की प्रवाल भित्ति की महान दीवार के एक बड़े हिस्से को पहले ही काफी नुकसान हो चुका है।
इसी तरह से दुनिया भर के 70 फीसदी प्रवाल या मूंगा को बढ़ते तापमान से नुकसान हो सकता है। जबकि कोरल या प्रवाल मछली की चार हजार प्रजातियों के प्रजनन का आधार हैं। मछली एक बड़ा खाद्य संसाधन है। मछली उद्योग हमारे समुद्रों से सालाना 12 करोड़ टन मछली निकालता है।
मगर यह दुखद है कि इसमें से चार करोड़ टन बाई-कैच यानी ऐसी प्रजातियां भी बाहर आ जाती हैं, जिन्हें दोबारा फिर समुद्र में डालना पड़ता है। जाल में फंसी ये ऐसी मछलियां या समुद्री प्रजातियां होती हैं, जिनसे बहुत लाभ नहीं होता। इसके बाद झींगा और अन्य आकर्षक प्रजाति के लिए दोबारा नेट डालना पड़ता है।