इतना लाइव हास्य-व्यंग्य हो गया है कि अलग से कुछ भी लिखने का कौशल ही बेकार गया। भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल में पड़े लोग जेल से ही क्रांतिकारी हो रहे हैं, जमानत पर बाहर घूम रहे लोग वायरल सत्य के उद्घोषक हो रहे हैं और चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिए गए लोग सीना चीरकर सैद्धांतिक सहयोगियों के मंच पर लोकतंत्र के शूरवीर हुए जा रहे हैं।
कोई तिनका कल तक बाढ़ में बहता किसी शिवलिंग पर जा उतरा था, आज वह किसी और ठिकाने पर नई बाढ़ और नए शंकरजी के लिए बाढ़ और तिनके के मुहावरे पर तालियां ठोक रहा है। सबसे दिलचस्प व्हाट्स एप क्रांति है। ये आपके फोन पर उतर ही आती है। एक धुरंधर जो कभी किसी के भयंकर समर्थक हुआ करते थे, अब भयंकर रूप से उनसे देश बचाना चाहते हैं। वजह? पांच साल होने को आए उनका कोई समर्थन मूल्य ही तय नहीं हुआ।
अभी वे जातिविहीन समाज के विप्लवी प्रवक्ता हैं। कल उन्होंने व्हाट्स एप संदेश भेजा, ‘अपने क्षेत्र में जातियों का जो गणित है, उस हिसाब से कुल जातियां यों बैठती हैं- ब्राह्मण, वैश्य, राजपूत, एससी-एसटी और मुसलमान।’ मुसलमान एक साथ वोट करेंगे ही और अगर ब्राह्मणों में टूट हो जाए, तो एससी-एसटी और मुसलमान मिलकर हवा बदल देंगे।
उनके हिसाब से मुसलमान धर्म नहीं, एक जाति थी और बाकी चार जातियां एक हिंदू धर्म नहीं, चार समुदाय थे। और इनको हिलाकर वे लोकतंत्र का धर्म बचा लेना चाहते थे। पर थे पक्के धर्म निरपेक्ष, पक्के जाति विरोधी। क्रांति का हुक्का ऐसा ही होता है, गुड़गुड़ाते कहीं हैं, आग कहीं लगी है, और धुआं जो है, कहीं और रखे पानी से छनकर आ रहा है।
अभी कल तक प्रियंका चतुर्वेदी कांग्रेस में बैठी, स्मृति ईरानी की डिग्री जांच रही थीं, बड़ी क्रांतिकारी लग रही थीं। शिवसेना में पहुंचते ही क्रांति को मोक्ष प्राप्त हो गया। एक महान सज्जन भाजपा से निकले, कांग्रेस में गए और सपा में अपनी श्रीमतीजी को भेजकर क्रांति की अवधारणा समझाने लगे। इसे राजनीति की आध्यात्मिक साधना में शक्तिपात कहते हैं। यह परमावस्था के अनुभव का परिणाम है।