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निवेश के नए विकल्प

नारायण कृष्णमूर्ति Updated Fri, 22 Dec 2017 09:24 AM IST
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निवेश के नए विकल्प
यह साल भी बीत रहा है और यदि अपने आसपास हो रही हलचल पर गौर करें, तो अब उम्मीद से कहीं अधिक लोग शेयर बाजारों में निवेश और उससे मिलने वाले रिटर्न पर बात कर रहे हैं। ठीक इसी समय आप बचत दरों में गिरावट की वजह से छोटे-छोटे निवेशकों में बढ़ती मायूसी को भी महसूस कर सकते हैं।


घरेलू बचत की दर 37 फीसदी से घटकर हाल के समय में 30 फीसदी से भी कम हो गई है। लोग यदि पहले जैसी बचत नहीं कर पा रहे हैं, तो उनका पैसा आखिर जा कहां रहा है? बचत घटने का एक कारण तो बढ़ती महंगाई है, जिसके कारण लोगों को अपनी जरूरतों के लिए पहले से कहीं अधिक खर्च करना पड़ रहा है। 


यदि इसमें आर्थिक सुस्ती को भी जोड़ दिया जाए, तो और अधिक निराशाजनक तस्वीर उभरेगी। जीडीपी में अपेक्षाकृत सुस्त वृद्धि का असर कॉरपोरेट निवेश में भी दिखता है, मगर घरेलू बचत में गिरावट कहीं अधिक तेज है। यदि घरेलू खर्च पर गौर किया जाए, तो पता चलेगा कि रियल एस्टेट या वाहनों पर होने वाला खर्च कम हो गया है, जिसका असर इनसे जुड़े सीमेंट और लोहे जैसे सहयोगी उद्योगों पर भी पड़ रहा है। 


असल बात यह है कि कॉरपोरेट भारत की क्षमता के दोहन में कमी आई है। बढ़ती लागत ने बचत में सेंध लगाई है, जिसके कारण उसमें गिरावट आ रही है और इसका कोई विकल्प भी सामने नजर नहीं आ रहा है। लोगों पर बैंक जमा और छोटी बचत योजनाओं में गिरती ब्याज दर की भी दोहरी मार पड़ रही है।


घरेलू बचत के ये दोनों औजार अब अपना महत्व खो रहे हैं, क्योंकि इनमें पहले जैसा रिटर्न नहीं रहा। दरअसल अब ऐसी बचत दरों का प्रबंधन सरकार नहीं करती, बल्कि इन्हें प्रचलित दरों से जोड़ दिया गया है। इसके साथ ही सोने के बढ़ते दाम और भूसंपत्ति और आवास से संबंधित निवेश से संबंधित कर के मुद्दे ने ऐसी भौतिक संपत्तियों पर निवेश के आकर्षण को फीका कर दिया है। 


विगत पांच वर्षों में धीरे-धीरे घरेलू बचत भौतिक संपत्ति के बजाय वित्तीय संपत्ति की ओर बढ़ रही है। म्युचुअल फंड इसे अवसर की तरह देख रहे हैं और बहुत ही आक्रामक तरीके से बैंक की बचत के बरक्स शेयरों में छोटे-छोटे निवेश से होने वाले फायदे बता रहे हैं।


सिस्टमैटिक इन्वस्टेमेंट प्लान (एसआईपी) बचत का ऐसा पर्यायवाची बन गया है, जैसे फोटोकॉपी के लिए जेरॉक्स! हकीकत यह है कि शेयर बाजार के नियामक ने म्युचुअल फंड के लिए जारूकता फैलाना अनिवार्य कर दिया है, जिससे म्युचुअल फंड निवेश के नए औजार के रूप में तेजी से उभरा है। 
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आम आदमी की मदद के लिए 'फिनटेक' यानी वित्तीय और प्रौद्योगिकी का तालमेल करने वाली कंपनियां मौजूद हैं। ऐसी कंपनियों ने म्युचुअल फंड में निवेश को आसान बना दिया है। वास्तविकता यह है कि स्मार्टफोन के जरिये लोग बहुत आसानी से निवेश कर सकते हैं। लोग स्मार्ट फोन के जरिये अपने बैंक खाते को म्युचुअल फंड से जोड़ सकते हैं।


म्युचुअल फंड में निवेश करने वालों की बढ़ती संख्या इस बात का प्रमाण है कि बचत का धन किस तरह से बड़े निवेश में जा रहा है। खपत बढ़ाने के लिए सरकार और रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों में कटौती जैसे कदम उठाए जरूर, मगर इससे कोई मदद नहीं मिली। इसकी वजह यह है कि दरों में कटौती कॉरपोरेट खर्चों में वृद्धि में कोई मदद नहीं कर सकी।


मसलन, 2009-10 के दौरान छठे वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के साथ ही बाजार में तेजी लाने के लिए सरकार ने कई उपाय किए थे, जिससे खासतौर से सरकारी कर्मचारियों को अपनी बचत को वाहनों, इलेक्ट्रॉनिक सामानों और आवास जैसी संपत्ति पर खर्च करने के लिए कुछ समय तक मोड़ा जा सका था। मगर जब करीब डेढ़ साल पहले सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू की गईं, तो बाजार में ऐसा कोई प्रभाव नजर नहीं आया। 


नौकरियों में कटौती तो हो ही रही है, नए रोजगार का सृजन भी उत्साहजनक नहीं है, इसका मतलब यह भी है कि किसी भी विशेष तरह के खर्च में कटौती। आर्थिक विकास दर में गिरावट के साथ ही निर्यात क्षेत्र में प्रदर्शन बदतर है, क्योंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था की स्थिति भी कोई बेहतर नहीं है। इन सब कारणों का असर भी खर्चों और बचतों पर पड़ा है। कच्चे तेल के निचले स्तर के बावजूद पेट्रोल और डीजल के दामों में अपेक्षित राहत नहीं मिलने के कारण भी लोग पहले जैसी बचत नहीं कर पा रहे हैं। 


तो फिर रास्ता क्या है? वास्तव में रियल एस्टेट और सोना जैसे बचत के साधन पहले से अधिक कागजी कार्रवाई के कारण अपना आकर्षण खो रहे हैं। वहीं वित्तीय संपत्ति के मामले में कर ढांचा उत्साह नहीं जगाता। लिहाजा छोटे निवेशकों का रुझान भी शेयर बाजारों और दूसरे विकल्पों की ओर बढ़ रहा है।


म्युचुअल फंड और आईपीओ के जरिये नए निवेशक शेयर बाजार की ओर आ रहे हैं। वास्तव में भौतिक संपत्तियों की तुलना में वित्तीय उपायों में निवेश कहीं अधिक आकर्षक साबित हो रहा है। बैंकों में सावधि जमा (एफडी) पर ब्याज दरों में आई गिरावट के कारण आम भारतीयों का यह पसंदीदा बचत का तरीका भी आकर्षक नहीं रहा, इसके बजाए लोग म्युचुअल फंड के लिक्विड फंड में निवेश करना चाहते हैं। छोटी अवधि की बचत के लिए यह बेहतर विकल्प है। पांच साल तक की अवधि की बचत के लिए इक्विटी फंड घरेलू बचत का नया गंतव्य है, जहां लोग तेजी से निवेश कर रहे हैं। 


भारतीयों के बचत के व्यवहार में आए इस बदलाव से सरकार भी उत्साहित है और वह खुद भी वित्तीय उपायों को बढ़ावा दे रही है। भविष्य निधि अंशदान से शेयरों का आवंटन बढ़ाया जाना इसका प्रमाण है। इसी तरह से सरकार ने कुछ महीने पहले सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में निवेश के लिए ईटीएफ की शुरुआत भी की थी। जाहिर है, निवेश के इन तरीकों पर अगले कुछ वर्षों तक नजर रखनी होगी, ताकि घरेलू बचत के व्यवहार में आ रहे बदलाव को समझा जा सके। 
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