क्या दक्षिण एशिया के इस क्षेत्र में तीसरी बार भी ऐसी घटना होगी? क्या अगला नंबर पाकिस्तान का है? यह सवाल पूर्व मंत्री और सांसद सैयद मुशाहिद हुसैन ने पूछा, जो पीएमएल (एन) के सदस्य हैं और कई दशक पहले ढाका में रह चुके हैं। मुशाहिद हुसैन यह सवाल इसलिए पूछ रहे हैं, क्योंकि इस समय पाकिस्तान में भी कई आंदोलन चल रहे हैं। पिछले एक हफ्ते से ज्यादा समय से रावलपिंडी शहर के मुख्य केंद्र मुर्री रोड पर सड़क को बंद करके जमात-ए इस्लामी का धरना चल रहा है, जहां हजारों लोग बैठे हैं और मांग कर रहे हैं कि शहबाज शरीफ सरकार बेरोजगारी, मुद्रास्फीति का तत्काल समाधान करे और विशेष रूप से नागरिकों के बिजली बिलों में वृद्धि को कम करे। विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे जमात-ए इस्लामी के नवनिर्वाचित प्रमुख हाफिज नईमुर्रहमान ने शहबाज शरीफ को चेतावनी दी कि यदि वह उनकी पार्टी की मांगें नहीं मानेंगे, तो उनका हश्र शेख हसीना से भी बुरा होगा, क्योंकि उन्हें मुल्क छोड़ने की इजाजत भी नहीं दी जाएगी।
इस बीच बलूचिस्तान के एकमात्र बंदरगाह शहर ग्वादर सहित कई अन्य शहरों में पिछले दो हफ्ते से धरना-प्रदर्शन जारी है। रावलपिंडी के विरोध प्रदर्शन के विपरीत बलूचिस्तान में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़पें भी देखी गई हैं, जहां गोलीबारी में कई लोग मारे गए, दर्जनों घायल हुए और कई लोगों को सरकारी एजेंसियों द्वारा उठा लिया गया। इन विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व एक युवा बलोच महिला डॉ. महरंग बलोच कर रही हैं, जो मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। उन्होंने उस पुरानी बलोच परंपरा को तोड़ा है, जिसमें महिलाओं को घरों तक ही सीमित रखा जाता था। वह अब नागरिक अधिकारों की मांग करने वाले हजारों पुरुष एवं महिलाओं का नेतृत्व कर रही हैं। हजारों बलोच नागरिक मांग कर रहे हैं कि पुरुषों को लगातार सरकारी एजेंसियों द्वारा उठाकर गायब किया जाना हमेशा के लिए बंद हो। गौरतलब है कि उठाकर गायब किए जाने वाले लोगों में ज्यादातर युवा हैं। वे यह भी मांग कर रहे हैं कि सभी चेकपोस्ट हटा लिए जाएं, ताकि लोग आसानी से आ-जा सकें। इसके अलावा बलोच प्रदर्शनकारियों की सबसे महत्वपूर्ण मांग है कि बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधन उन्हें उपलब्ध कराए जाएं, न कि दूसरे प्रांतों को भेजे या निर्यात किए जाएं।
इस बीच उत्तरी इलाकों में भी लोग कई दिनों से प्रदर्शन कर रहे हैं और उन्होंने काराकोरम हाईवे को जाम कर दिया है, जो खुंजराब दर्रे के माध्यम से पाकिस्तान को चीन से जोड़ रहा है। वे संघीय राजस्व बोर्ड और पाकिस्तान सीमा शुल्क के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं, जिन्होंने हाल ही में व्यापारियों पर कर लगाया है। पाकिस्तान से चीन जाने के इच्छुक कई विदेशी भी यहां फंस गए हैं और उन्हें प्रदर्शनकारियों के साथ बैठे देखा जा सकता है। इस तरह से देखा जा सकता है कि पाकिस्तान के हर हिस्से में विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं।
बांग्लादेश में जारी घटनाएं इस क्षेत्र एवं पश्चिम में अब भी सुर्खियों में हैं। इसलिए पाकिस्तान में यह सवाल पूछा जा रहा है कि क्यों कई मुस्लिम देश गंभीर राजनीतिक अस्थिरता का सामना कर रहे हैं। सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल तलत मसूद कहते हैं, 'ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे सत्ता बरकरार रखने के लिए लोगों से शक्ति प्राप्त करने के बजाय सेना या सुरक्षा संगठनों पर ज्यादा निर्भर हैं। इससे उनकी प्रगति में बाधा आई है और वे महत्वपूर्ण नीतिगत फैसले लेने के लिए प्रमुख वैश्विक शक्तियों पर ज्यादा निर्भर हो गए हैं।'
बांग्लादेश में जारी उथल-पुथल में एक और महत्वपूर्ण बात यह उभर कर आई है कि क्षेत्रीय और पड़ोसी देशों ने ढाका के साथ अपनी विदेश नीति को किस तरह आगे बढ़ाया है। भारत को शेख हसीना का एक मजबूत सहयोगी माना जाता है, लेकिन ढाका स्थित सैन्य सूत्रों के हवाले से रॉयटर में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, नई दिल्ली ने शेख हसीना से कहा कि उन्हें भारत में अस्थायी तौर पर ही रहने का ठिकाना मिल सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इसका कारण यह है कि ढाका की ओर से मांग की जा रही है कि शेख हसीना को उनके मुल्क वापस भेजा जाए। जाहिर है, भारत बांग्लादेश और वहां बनने वाली नई सरकार के साथ अपने भावी संबंधों का भी आकलन करना चाहेगा और वह नहीं चाहेगा कि उसे बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री का पक्ष लेते हुए देखा जाए। हालांकि पाकिस्तान के लोगों को ऐसा लग रहा था कि मोदी सरकार की विदेश नीति का झुकाव व्यक्ति विशेष यानी शेख हसीना के प्रति है, न कि एक सरकार का दूसरे सरकार के प्रति।
प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में ढाका में नई अंतरिम सरकार के गठन के साथ ही पाकिस्तान ने बांग्लादेश के लोगों के लिए सद्भावना संदेश भेजा है, जबकि बांग्लादेश में विरोध प्रदर्शन के दौरान पाकिस्तान ने आधिकारिक तौर पर इसे बांग्लादेश का घरेलू मुद्दा मानकर चुप्पी साध रखी थी। पाकिस्तान ने अपने संदेश में कहा कि वह बांग्लादेश के लोगों के साथ एकजुटता से खड़ा है तथा ईमानदारी से शांतिपूर्ण एवं शीघ्र सामान्य स्थिति बहाली की उम्मीद करता है। पाकिस्तान की तरह बांग्लादेश में भी तख्तापलट और सैन्य शासन का इतिहास रहा है। हालांकि छात्र नेताओं के बयानों से यह साफ है कि वे सैन्य शासन का विरोध करेंगे और बांग्लादेश में जनता की ताकत ही शासन करेगी।