करीब दो दशक मुझे इस बात को समझने में लग गए कि यह वैचारिक और व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। मैंने अपना डॉक्टरेट शोध प्रबंध ‘हिमालय में किसान विरोध आंदोलन’, जिसे ‘चिपको’ के नाम से जाना जाता है, पर लिखा था। इसमें सामाजिक न्याय की चिंता को खत्म करते हुए वन परिदृश्यों की बहाली में रुचि को शामिल किया गया था। ‘चिपको आंदोलन’ की शुरुआत 1973 में हुई। इस आंदोलन ने जंगलों, पानी और चारागाहों में सामुदायिक अधिकारों की रक्षा के लिए पूरे भारत में इसी तरह के आंदोलनों को प्रेरित किया।
‘चिपको आंदोलन’ पर शोध मुझे पारिस्थितिकी विज्ञानी माधव गाडगिल के संपर्क में लाया। उनका मानना था कि भारत जैसे देश के पास पर्यावरणीय स्थिरता की चिंता के अन्य भी कई कारण हैं। भारत उच्च जनसंख्या घनत्व, औपनिवेशिक अधीनता के इतिहास और अपनी नाजुक पारिस्थितिकी के साथ यूरोप और उत्तरी अमेरिका द्वारा शुरू किए गए औद्योगीकरण के ऊर्जा, पूंजी और संसाधन-गहन मॉडल की नकल नहीं कर सकता।
‘चिपको’ के बाद से भारत में इस बात पर जोरदार बहस चल रही है कि क्या देश को आर्थिक विकास के लिए अधिक पर्यावरण अनुकूल विकल्प तैयार करना चाहिए? यह बहस उच्च सिद्धांतों के स्तर पर न होकर छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटकर होती है। क्या जंगलों पर सामुदायिक नियंत्रण हो जाने से वुडलैंड पर राज्य के अधिकार वाले मौजूदा मॉडल की तुलना में अधिक पर्यावरण अनुकूल और न्यायसंगत परिणाम मिलेंगे? क्या राजमार्गों और बांधों जैसी बड़े बुनियादी ढांचे वाली परियोजनाओं की वजह से विस्थापित होने वाले किसानों और आदिवासियों को केवल मौद्रिक मुआवजा दिया जाना चाहिए या उनकी आजीविका और रोजगार के लिए वैकल्पिक उपाय किए जाने चाहिए? क्या शहरीकरण की इन प्रक्रियाओं से ग्रामीण इलाकों के संसाधनों का अत्यधिक दोहन हो जाएगा? क्या वन्यजीव संरक्षण ने दलदली जमीन, झाड़ीदार जंगलों और अन्य लुप्तप्राय आवासों की कीमत पर बाघ और हाथी जैसी बड़ी प्रजातियों पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित किया है? ऐसे ही सवालों पर वैज्ञानिक पत्रिकाओं, लोकप्रिय वेबसाइट्स और कार्यकर्ता मंचों पर चर्चा की जाती है। लेकिन भारत के प्रभावशाली वर्गों के बीच यह भ्रम बना हुआ है कि जंगलों के विकास के मामले में हम अब भी बहुत पीछे हैं। जब मैं छोटा था, मार्क्सवादी इतिहासकारों ने दावा किया था कि पर्यावरणवाद वर्ग संघर्ष में एक बुर्जुआ विचलन था। अब मैं बूढ़ा हो गया हूं तो मुझे लगता है कि यह मुक्त-बाजार अर्थशास्त्री ही हैं, जो पर्यावरणवाद को देश के वर्तमान और भविष्य के लिए कथित तौर पर अप्रासंगिक बताकर निंदा करते हैं।
यदि भारत के लोगों के मन में पर्यावरण से जुड़े मुद्दे उठते हैं तो इसका संबंध जलवायु परिवर्तन से है। यहां भी सिर्फ दावा करके इस मामले को किनारे कर दिया गया है कि अमीर देशों को जीवाश्म ईंधन पर हमारी निर्भरता को छोड़ने और उसे स्वच्छ ऊर्जा में स्थानांतरित करने के बारे में उपदेश देने का कोई मतलब नहीं है। इस बात में कोई संदेह नहीं कि यूरोप और उत्तरी अमेरिका के देश इस संबंध में काफी पाखंडी रहे हैं। जीवाश्म ईंधन का निष्कर्षण और उसका उपयोग कर अपनी संपत्ति बनाने के बाद अब वे वैश्विक दक्षिण के गरीब देशों से तेल क्षेत्रों और कोयला संयंत्रों को बंद करने के लिए तो कह रहे हैं, लेकिन वे ऊर्जा के स्वच्छ स्रोतों की ओर कैसे बढ़ें, इसके लिए पर्याप्त वित्तीय और तकनीकी सहायता की अनुमति प्रदान करने से इनकार कर रहे हैं।
भारत के सामने जो पर्यावरणीय चुनौतियां मौजूद हैं, जलवायु परिवर्तन उनमें से एक है। दिल्ली और अन्य उत्तर भारतीय शहरों में वायु प्रदूषण का स्तर दुनिया में सबसे अधिक है। अधिकांश भारतीय नदियों का पानी मनुष्यों और घरेलू जानवरों के पीने लायक नहीं है। देश में प्राकृतिक जल स्रोत तेजी से कम हो रहे हैं, जिसमें पंजाब जैसे राज्य भी शामिल हैं, जिसे लंबे समय से देश के लिए ‘रोटी की टोकरी’ माना जाता रहा है। खेती वाली जमीन अनुमान से अधिक रसायनों से दूषित है। हर जगह के प्राकृतिक जंगलों में बड़ी मात्रा में ‘लैंटाना’ जैसे विदेशी खरपतवार पाए गए हैं, जिनसे जैव विविधता में तेजी से कमी आई है।
पर्यावरण दुरुपयोग के विभिन्न रूपों के बारे में समझने के लिए चार महत्वपूर्ण बातें हैं। पहली, उनका जलवायु परिवर्तन से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि वे गलत आर्थिक नीतियों के उत्पाद हैं, जो राज्य के भ्रष्टाचार और कॉर्पोरेट लालच के कारण और खराब हो गई हैं। दूसरी, पश्चिमी घाट और हिमालय जैसी बड़ी पर्वत शृंखलाओं में भूस्खलन की बढ़ती तीव्रता इसे स्पष्ट करती है, जहां पानी के साथ जैविक विविधता का अमूल्य भंडार है। ये भूस्खलन अनियमित खनन, रिसॉर्ट्स के अनियमित विस्तार और खराब डिजाइन वाली सड़कों के कारण होते हैं। तीसरी, इस पर्यावरणीय प्रदूषण का खामियाजा गरीबों को भुगतना पड़ता है। लोगों के पास घर पर हाईटेक एयर प्यूरीफायर हैं, झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोग ही शहर की हानिकारक हवा में सीधे सांस लेते हैं। ओपन-कास्ट खनन से छोटे किसानों की कृषि भूमि खराब हो जाती है, जबकि दूर के शहरी उपभोक्ताओं और शेयरधारकों को लाभ होता है। अमीरों के पास पानी घरेलू नलों से जुड़े वाटर प्यूरीफायर से सीधे पहुंच जाता है। श्रमिक वर्ग ही पेयजल के लिए प्रदूषित नदी, झरने या कुएं पर निर्भर रहता है। खरपतवारों के कारण जंगल खत्म हो रहे हैं। ऐसे में चरवाहे चारे से वंचित हो गए हैं और लकड़ी के कारीगरों के पास भी उपयोगी सामग्री की कमी हो गई है। अंतिम बात यह कि देश के विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों में अंतरराष्ट्रीय मानक के पेशेवर क्षमता वाले पारिस्थितिकी, सामाजिक, कृषि, जल विज्ञानी, शहरी योजनाकार, परिवहन और ऊर्जा विशेषज्ञ हैं, लेकिन सत्ता में बैठे राजनेताओं द्वारा शायद ही कभी इन विशेषज्ञों से सलाह ली जाती है। भारतीय राजनेताओं की पर्यावरणीय स्थिरता के प्रति उपेक्षा विश्वव्यापी है। दूसरी ओर, भारतीय राजनेता उन खनन दिग्गजों, इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपर्स और फैक्ट्री मालिकों के आभारी रहते हैं, जो उनके चुनाव अभियानों के लिए पैसों का जुगाड़ करते हैं।
11 जनवरी, 2025 के ‘इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली’ के हालिया अंक में संपादक शरच्चंद्र लेले और गीतांजॉय साहू ‘पर्यावरण और विकास’ पर लिखते हैं- “बढ़ते नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र और बाघों की बढ़ती आबादी के बावजूद देश की पारिस्थितिक अखंडता और हाशिए पर रहने वाले लाखों लोगों की आजीविका से समझौता किया जा रहा है। विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के लिए कानूनों में खुले तौर पर ढील दी जाती है।”
निकट भविष्य में भारत का पर्यावरणीय संकट और भी विकट हो जाएगा, जिसका नकारात्मक असर कम विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों के स्वास्थ्य और आजीविका पर पड़ेगा। यह भी संभव है कि युवा पीढ़ी, अतीत के पूर्वाग्रहों और पूर्व धारणाओं से मुक्त होकर समय के साथ अपने देश को आधी सदी पहले चिपको अग्रदूतों द्वारा बहादुरी से बताए गए रास्ते पर ले जाने के लिए अपनी ऊर्जा इकट्ठा करें- एक ऐसा रास्ता, जो स्थिरता को सामाजिक न्याय के साथ जोड़ना चाहता है।