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सीमित साधनों में कोरोना से लड़ता पूर्वोत्तर

सायंतिका भुवाल
Updated Tue, 04 Aug 2020 02:25 AM IST
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कोरोना वायरस (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : PTI

मई की शुरुआत में लॉकडाउन के तीसरे चरण के दौरान केंद्र सरकार ने पूर्वोत्तर राज्यों को ग्रीन जोन में दिखाया था। इसका पता ही नहीं था कि मात्र दो महीने में मामले बढ़ जाएंगे। भारत के आठ फीसदी भूभाग और कुल आबादी में 3.6 फीसदी की हिस्सेदारी रखने वाले पूर्वोत्तर राज्यों में से अकेले असम में अब तक 34,000 मामले सामने आए हैं।



यह आंकड़ा देश के बाकी हिस्सों की तेज वृद्धि और गंभीरता से बेशक मेल न खाती हो, पर स्वास्थ्य व्यवस्था तक असमान पहुंच के कारण यह आंकड़ा भी चिंताजनक है। यह अनियमित स्क्रीनिंग का नतीजा हो सकता है। असम के अलावा पूर्वोत्तर के सबसे बड़े राज्य अरुणाचल प्रदेश में 1,330, त्रिपुरा में 4,269, मणिपुर में 2,317, मिजोरम में 384, नगालैंड में 1,460 और मेघालय में 779 मामले अब तक सामने आए हैं।


स्वास्थ्य व्यवस्था तक असमान पहुंच महामारी से लड़ने में बड़ी बाधा है। स्वास्थ्य कर्मचारियों की भारी कमी इस असमानता को और बढ़ा रही है। आजादी के बाद से ही पूर्वोत्तर में स्वास्थ्य सेवा का बुनियादी ढांचा तैयार करना राष्ट्रीय नेताओं की प्राथमिकता में नहीं था। जबकि महामारी से निपटने के लिए मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की जरूरत होती है।


पूर्वोत्तर के कुछ ही प्रमुख अस्पतालों में जांच की सुविधा उपलब्ध है। यहां हालांकि क्वारंटीन सेंटर हैं, पर आपातकाल के लिए बुनियादी चिकित्सा सहायता का अभाव है। ज्यादातर सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली अविकसित हैं। 15 मई को पहली बार समाचारों में यह दावा किया गया कि सभी सात राज्यों में जांच की सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है।


असम और त्रिपुरा, दोनों राज्यों में क्रमशः 50 और 17 फीसदी प्राथमिक स्वास्थ्य प्रणाली की कमी है। जबकि तृतीय श्रेणी के अस्पताल या चिकित्सा संस्थान ज्यादातर बड़े शहरों में है, जो पहुंच को सीमित करते हैं। पहाड़ी इलाका होने के कारण भी स्वास्थ्य सेवा तक लोगों की पहुंच बाधित होती है।


तृतीय श्रेणी के कई चिकित्सा संस्थानों में वेंटिलेटर और विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी है। मसलन, सिलचर मेडिकल कॉलेज में, जो दक्षिणी असम का एक प्रमुख रेफरल संस्थान है और त्रिपुरा, मिजोरम व मणिपुर के कुछ हिस्सों की जरूरतें भी पूरी करता है, कार्डियोलॉजिस्ट और न्यूरो सर्जन नहीं हैं।


स्थानीय लोग पहले से ही यह मानते रहे हैं कि अगर महामारी फैलती है, तो उस पर अंकुश लगाने के पर्याप्त उपाय नहीं हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्वोत्तर भारत में 36,009 पंजीकृत डॉक्टरों और 66 फीसदी प्रशिक्षित नर्सों की कमी है। यहां एक नर्स पर 1,483 लोगों की जिम्मेदारी है, जो न केवल राष्ट्रीय औसत (890) से ज्यादा है, बल्कि यह विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय मानक (प्रति एक हजार लोगों पर दो नर्स) से भी मेल नहीं खाता।
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मात्र दो महीने में संक्रमण में आई तेजी से लोग हैरान हैं। इस पर मीडिया में भी काफी चर्चा हुई कि क्यों ये आंकड़े इतनी तेजी से बढ़े, हालांकि ये मामले शेष भारत के मुकाबले कम हैं। इस बात के लिए इन राज्यों की प्रशंसा की जा सकती है कि संसाधनों की कमी के बावजूद बगैर हंगामे के इन्होंने अपने स्तर पर महामारी से लड़ाई लड़ी, पर इनकी रिकवरी रेट कम है।


अरुणाचल में ठीक होने की दर 35 फीसदी है, जबकि राष्ट्रीय औसत 64.5 फीसदी है। यह गनीमत है कि स्वास्थ्य केंद्रों तक मुश्किल पहुंच और खराब संपर्क वाले इन राज्यों में मृत्यु दर कम होने के कारण लोगों में उतनी घबराहट नहीं है। बदतर स्वास्थ्य प्रणाली के कारण इन राज्यों में जांच भी अनियमित रही है। हालांकि जांच के मामले में राष्ट्रीय औसत भी कम (प्रति दस लाख लोगों पर 12,859) ही है।


विशेषज्ञ संक्रमण के कम आंकड़े का एक कारण यह भी बताते हैं कि इस क्षेत्र में मलेरिया और डेंगू का ज्यादा खतरा होने के कारण लोगों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ गई होगी। स्वास्थ्य प्रणाली पर दबाव बढ़ाने के साथ कोरोना वायरस ने समाज की सुरक्षा को भी नुकसान पहुंचाया है। बेरोजगारी बढ़ने से अपराध की घटनाएं बढ़ी हैं। छात्रों की पढ़ाई को भी भारी नुकसान पहुंचा है। इंटरनेट की पर्याप्त पहुंच न होने के कारण शेष भारत की तरह पूर्वोत्तर के छात्रों की भी मुश्किलें बढ़ी हैं।

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