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घाटी के इस विनाश से सबक लेने की जरूरत

Thu, 11 Sep 2014 08:15 PM IST
अवधेश कुमार
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जम्मू कश्मीर में आजादी के बाद की सबसे भीषण बाढ़ ने तबाही मचा दी है। इस समय यह भी पता करना मुश्किल है कि न जाने कितने लोग पानी में डूबकर या बहकर काल कवलित हो गए, न यही पता है कि कितने गांव इसमें समा गए। इसका आकलन भी संभव नहीं कि आखिर इस जल प्लावन से क्षति कितनी हुई। पर यह साफ है कि हमारे सामने विनाश के जो अनुमानित आंकड़े आ रहे हैं, वे वास्तविकता से काफी कम होंगे।
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अगर दो-दो, तीन-तीन मंजिल के मकान डूब चुके हों, सेना के कैम्प तक पानी के शिकार हों, सचिवालय डूबा हो, अस्पताल तक जलमग्न हों, तो फिर इससे बदतर स्थिति और क्या हो सकती है! इस समय पूरे देश की भावना कश्मीरियों के साथ है।  इसमें कोई मजहब, जाति या राजनीतिक मतभेद सामने नहीं है। यही वह ताकत है, जो ऐसी आपदाओं से जूझने की शक्ति देती है। लेकिन इससे जुड़े कई पक्ष हैं, जिनको ध्यान में लाना आवश्यक है।

जिस ढंग से केंद्र सरकार ने आपदा का त्वरित प्रत्युत्तर दिया, उसकी सराहना विपक्ष के नेताओं ने भी की है। सरकार ने हर संभव संसाधन वहां झोंका है और हमारी सेनाएं वहां युद्धस्तर पर काम कर रही हैं। सेना, वायु सेना, एनडीआरएफ और राज्य पुलिस द्वारा चलाए जा रहे अभियान में अब तक एक लाख से ज्यादा लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा दिया गया है। राज्य में यह अब तक का सबसे बड़ा बचाव ऑपरेशन है। सेना के जवान वहां लोगों को निकालने के लिए भारी जोखिम उठा रहे हैं। जाहिर है, जो सेना कल तक घाटी में खलनायक समझी जाती थी, वह इस समय नायक बनकर उभरी है।
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इस विवरण के बाद यह बताने की आवश्यकता नहीं कि केंद्र ने किस तरह इस बाढ़ को लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि यह किसी राष्ट्रीय आपदा से कम नहीं है। उनके इस ऐलान के बाद बचाव, राहत व पुनर्वास का मुख्य दायित्व केंद्र का हो गया है। प्रदेश के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला संभवतः अपने लोगों की और विशेषकर राजधानी के जलमग्न होने की चिंता के बावजूद केंद्र के रवैये से राहत महसूस कर रहे होंगे। लेकिन जिस तरह के विनाश की हालत है, उसमें राहत, बचाव और बाद में पुनर्वास आसान नहीं होगा।

घाटी के हालत बता रहे हैं कि पानी की निकासी का मार्ग जैसा होना चाहिए, नहीं है। गौर करने वाली बात यह है कि पहाड़ों पर वजन बढ़े हैं। आप देखेंगे कि विकास के नाम पर जो हालत दूसरे पहाड़ी, वनीय व नदीय इलाकों की बना दी गई है, वही जम्मू कश्मीर में भी हुआ है। हालांकि वहां बाहरी लोगों के लिए जमीन खरीदने का निषेध है, बावजूद इसके वहां बेतरतीब ढंग से भवन विकसित हुए हैं।

जानकार 1948 की बाढ़ को याद करते हैं। अंग्रेज इंजीनियरों की मदद से झेलम का पानी बाहर निकालने के लिए श्रीनगर के पदशाही बाग से वुल्लर तक 42 किलोमीटर लंबी फ्लड यानी बाढ़ नहर बनाई गई थी। अगर वह उसी रूप में रहती, तो राजबाग जलमग्न होता ही नहीं। अगर पानी निकासी की व्यवस्था पहले के अनुरूप विकसित नहीं की गई, तो आगे इससे भी ज्यादा विनाशकारी दृश्य पैदा हो सकते हैं।
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