प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी संभालने जा रहे नरेंद्र मोदी की सरकार के लिए देश में बदलाव लाने के मद्देनजर जो सबसे महत्वपूर्ण चुनौती होगी, वह है, रक्षा मंत्रालय और राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र का पुनरुद्धार करना। हालांकि इसके लिए किसी अतिरिक्त व्यय या निवेश की नहीं, बल्कि दृढ़ राजनीतिक नेतृत्व, अंतर्दृष्टि और प्रतिबद्धता की जरूरत होगी। पिछले डेढ़ दशक के दौरान 2001 और 2008 में ऐसी नौबत आई, जब भारत के खिलाफ आतंकवादी कृत्यों को अंजाम देने में पाकिस्तान की संभावित भूमिका को देखते हुए भारतीय सेना से कड़े कदम उठाने की दरकार थी। मगर दोनों ही मौकों पर अगर हमारी सेनाएं समुचित कार्रवाई करने में कामयाब नहीं हुईं, तो इसकी वजह उनमें साहस की कमी होना नहीं था। सच तो यह है कि वे तैयार नहीं थीं। इसके पीछे की प्रमुख वजह देश के रक्षा मंत्रालय और इससे संबद्ध तीनों सेनाओं की गतिविधियों और संगठन का कुप्रबंधन थी। और आज भी हालत कमोबेश जस की तस है।
इसके अलावा ज्यादा महत्वपूर्ण चुनौती उभरते हुए चीन की भी है। इसलिए अगर आगामी मोदी सरकार को एक मजबूत विदेश नीति बनानी है, तो इसे मजबूत राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र पर आधारित होना होगा। दरअसल ऐसी व्यवस्था का अभाव आजादी के बाद से ही भारत की ऐतिहासिक कमजोरी बना हुआ है। इसी वजह से न सिर्फ 1962 में हमें चीन के हाथों हार का सामना करना पड़ा, बल्कि पाकिस्तान के भारत विरोधी मंसूबों से भी हमें लगातार दो-चार होना पड़ता है। दुखद है कि आज भी भारत एक कमजोर सैन्य ताकत बना हुआ है, जो सीमाओं के बाहर अपनी ताकत का प्रदर्शन करने में बिल्कुल नाकामयाब रहा है।
वैसे हालात में सुधार करने के लिए नई सरकार के पास सुझावों की कमी नहीं होगी। राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र में सुधार के मद्देनजर उसके पास विचारार्थ कुल 400 सिफारिशों वाली 178 पृष्ठों की एक रिपोर्ट होगी। यह करीब 2,500 छोटी-छोटी कार्ययोजना का संग्रह है। ये सिफारिशें 2011 में यूपीए सरकार द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा पर पूर्व कैबिनेट सचिव नरेश चंद्रा की अध्यक्षता में गठित टास्क फोर्स (एनएसटीएफ) ने की थीं। गौरतलब है कि शुरू से ही इस टास्क फोर्स को, खासकर रक्षा मंत्रालय के संदर्भ में, नौकरशाही से जुड़ी तमाम अड़चनों का सामना करना पड़ा था। हालांकि अमूमन हाथ पर हाथ धर कर बैठे रहने वाले मंत्री ए के एंटनी की बदौलत, टास्क फोर्स की सिफारिशें अंत में ठंडे बस्ते में डाल दी गई थीं।
गौरतलब है कि टास्क फोर्स की सिफारिशें उन प्रस्तावों की अगली कड़ी थीं, जिन्हें पहले तत्कालीन एनडीए सरकार के मंत्रियों के समूह ने 2001 में प्रस्तुत किया था। दरअसल एक दशक के बाद यह महसूस किया जाने लगा था कि चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की नियुक्ति जैसे जरूरी मसलों का समाधान खोजा जाए। साथ ही, 2000 के दशक और 2008-09 की मंदी के दौरान चीन के नाटकीय उदय को देखते हुए यह जरूरी भी था कि देश के सैन्य तंत्र में उपयोगी सुधार किए जाएं। इसके अलावा यह भी जरूरी है कि नई सरकार एनएसटीएफ की सिफारिशों को जल्द से जल्द लागू करे। दरअसल एनएसटीएफ ने चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी के स्थायी चेयरमेन की नियुक्ति के एक फॉर्मूले की सिफारिश की है। हालांकि सूत्रों की मानें, तो रक्षा मंत्रालय में काम कर रहे बाबू ऐसी किसी नियुक्ति के सख्त खिलाफ हैं।
व्यवस्था के लिए यह समझना जरूरी है कि अगर भारतीय सैन्य बल आधुनिक तौर-तरीकों से युद्ध लड़ना चाहते हैं, तो यह समन्वित तरीके से ही संभव है। दुनिया की जितनी भी अत्याधुनिक सेनाएं हैं, उनमें चीफ ऑफ डिफेंस स्टॉफ के नेतृत्व में समन्वित नियोजन और निर्देशन का एकीकृत तंत्र है। अगर हम इस बदलाव को नकारते हैं, तो हमारी सेनाएं परेड ग्राउंड लायक ही बनी रहेंगी। इसके अलावा जब बात रक्षा अनुसंधान, विकास और उत्पादन की हो, तो रक्षा मंत्रालय की बेरुखी चिंता पैदा करती है। सार्वजनिक क्षेत्र के नौ उपक्रमों और 39 आयुध फैक्टरियों के साथ हमारे देश में रक्षा उत्पादन का एक व्यापक आधार मौजूद है। अकेले डीआरडीओ के पास 50 से ज्यादा प्रयोगशालाएं हैं, बावजूद इसके हमें अपने रक्षा उत्पादन के लिए उपयोगी सैन्य सामग्री का 70 प्रतिशत आयात करना पड़ता है। इसकी वजह यह है कि डीआरडीओ, आयुध फैक्टरियां और सार्वजनिक क्षेत्र के तमाम उपक्रम अकुशलता और भ्रष्टाचार के गढ़ बन गए हैं। अब विशाखापट्टनम की हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड का ही उदाहरण लें। पिछले आठ वर्षों से यह आईएनएस सिंधुकीर्ति की मरम्मत के काम में लगा हुआ है, जबकि इसे महज तीन वर्ष में पूरा हो जाना चाहिए था। तमाम विशेषज्ञों का मानना है कि सिंधुकीर्ति की उमर पूरी हो चुकी है, और अब समय आ गया है कि रक्षा उत्पादन और विकास में निजी क्षेत्र का व्यापक दखल होना चाहिए। वैसे भी भारत को रक्षा उद्योग में बड़ी मात्रा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की जरूरत पड़ेगी।
दरअसल पूरे एशिया की मांग है कि भारत अपने आकार और हितों के अनुकूल एक सक्रिय भूमिका का निवर्हन करे। मगर ऐसा कर पाने में हमारे सामने दो चुनौतियां खड़ी हो जाती हैं। पहली समस्या तो हमारी अर्थव्यवस्था से जुड़ी है, और दूसरी यह कि हमारी सेना सीमाओं के बाहर किसी भी भूमिका को निभाने में नितांत अयोग्य साबित होती है। और इसका सम्मिलित असर हमारी विदेश नीति पर पड़ता है। नरेंद्र मोदी इन हालात में जरूर सुधार करना चाहेंगे, मगर इसके लिए उन्हें सुनिश्चित करना होगा कि उनके उपकरण दुरुस्त हों।
(लेखक, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के जाने-माने फेलो हैं)