हॉलीवुड में पुरानी, अच्छी और क्लासिक फिल्मों को डिजिटल तकनीक से पुनर्जीवित करने का चलन पुराना है। अभी हिंदुस्तान में यह नहीं है। परंतु धीरे-धीरे इस तरफ काम हो रहा है। हाल के वर्षों में कुछ क्लासिक फिल्में डिजिटल तकनीक से संवर कर थियेटरों में आई हैं। गरम हवा (1973) को हमने हाल में डिजिटली री-स्टोर कर देश के नौ बड़े शहरों में रिलीज किया है और आगे इसे अन्य शहरों में रिलीज करने की योजना है। यह देखना रोचक होगा कि जब क्लासिक फिल्में फिर आएंगी, तो इनका नई पीढ़ी पर क्या प्रभाव पड़ेगा। सिनेमा की खूबी यह है कि वह अपने समय के साथ-साथ अतीत और भविष्य में समान रूप से झांक सकता है। जैसे मैंने अपनी फिल्म गरम हवा 1947 में हुए बंटवारे के 25 साल बाद बनाई। साफ है कि किसी भी विषय पर कभी भी फिल्म बनाई जा सकती है।
देश के बंटवारे के दौरान कुछ ऐतिहासिक गलतियां हुई थीं, जो तत्काल नजर नहीं आई थीं। बंटवारे ने लाखों-करोड़ों लोगों को तकलीफ पहुंचाई थी। कुछ नेताओं की वजह से और कुछ सरमायेदारों की वजह से देश का विभाजन हुआ था। हमने इस देश के साथ हुई ऐतिहासिक घटना को अपनी फिल्म में एक परिवार की त्रासदी के बहाने दिखाया है। हमने विभाजन का माहौल नहीं दिखाया, बल्कि हमारी कहानी में आगरा में रहने वाला एक भाई हिंदुस्तान में रह जाना चाहता है और दूसरा पाकिस्तान जाना चाहता है। गरम हवा एक मानवीय कहानी है, जो बताती है कि बंटवारे का आम इंसान पर क्या असर हुआ? गरम हवा को बने 40 साल से ज्यादा हो चुके हैं और आज भी यह फिल्म प्रासंगिक है। सांप्रदायिक-सामाजिक स्थितियां और लोगों की सोच इतने बरसों में भी बहुत नहीं बदली है। उस वक्त हमें यह फिल्म बनाने के 11 महीने के बाद सेंसर प्रमाणपत्र मिला था। तब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं और इंद्र कुमार गुजराल सूचना और प्रसारण मंत्री थे। उन्हें डर था कि फिल्म के प्रदर्शन से दंगे न हो जाएं। समाज का माहौल खराब न हो जाए। बहुत सारे लोग फिल्म के खिलाफ थे। मुझे याद है कि लालकृष्ण आडवाणी साहब ने फिल्म बगैर देखे ही इसकी समीक्षा लिख दी थी। उन्होंने यह भी कह दिया था कि इस फिल्म को बनाने के लिए शायद पाकिस्तान से पैसा मिला है। जबकि वह जिम्मेदार नेता थे। मुंबई में तब बाल ठाकरे थे और शिवसेना ने धमकी दी थी कि जिस थियेटर में फिल्म लगेगी, उसे जला देंगे। लेकिन जब ठाकरे साहब ने गरम हवा देखी, तो उन्हें यह पसंद आई। दुनिया के अनेक देशों और फिल्म महोत्सवों में इसे दिखाया गया है। यहां तक कि पाकिस्तान में भी इसका पायरेटेड संस्करण खूब देखा गया।
ईमानदारी की बात यह है कि उस दौर में अगर हम यह फिल्म बना सके थे, तो सिर्फ इसलिए कि इसके लिए फाइनेंस मिल गया था। फिल्म फाइनेंस कॉरपोरेशन से हमें पैसा मिला था। तब यह सोच बिल्कुल नहीं थी कि फिल्म विवादों में आ जाएगी या इसकी खूब तारीफ होगी। यह क्लासिक कहलाने लगेगी। फिल्म की कहानी भी उस वक्त हमारे पास नहीं थी और हम ढूंढ रहे थे कि क्या बनाया जाए। तब शमा जैदी ने इस्मत चुगताई और राजेंद्र सिंह बेदी जैसे अफसानानिगारों से बात की थी। जब उन्हें इस्मत आपा से इस कहानी के नोट्स मिले, तो उन्होंने उनसे ही स्क्रिप्ट बनाई। डायलॉग लिखते हुए कैफी आजमी साहब ने कुछ दृश्य बदले। कुछ राजनीतिक संवाद इसमें जोड़े। हमारा पूरा ध्यान इस पर था कि राजनीतिक रूप से इसमें कुछ गलत नहीं होना चाहिए। बलराज साहनी जी का भी इस फिल्म की रचना में बहुत योगदान था। इस तरह से सबके प्रयास से यह फिल्म बन सकी थी। इप्टा, दिल्ली और आगरा के कलाकार इसमें आए थे। फिल्म की शूटिंग हमने आगरा और फतेहपुर सीकरी में की थी। मुझे दुख है कि इस फिल्म से जुड़े ज्यादातर लोग अब संसार में नहीं हैं। फारूक शेख साब इनमें से विदा लेने वाले आखिरी शख्स थे।
मुझे लगता है कि राजनीतिक फिल्में हमारे यहां लगातार बनती हैं, मगर कम संख्या में। दो साल पहले आई शंघाई भी पॉलिटिकल फिल्म थी। बॉर्डर, रिफ्यूजी और रंग दे बसंती भी राजनीतिक फिल्में थीं। परंतु ये फिल्में मुख्यधारा की थीं। गरम हवा बनने के दो साल बाद 1975 में देश में आपातकाल लागू कर दिया था, जो बहुत गलत बात थी। लेकिन फिल्मकारों ने उसके खिलाफ भी फिल्में बनाई थीं। देश में आज भी राजनीतिक उथल-पुथल हो रही है। आज सांप्रदायिक ताकतों की शक्ति बढ़ चुकी है। इस वजह से राजनीतिक सिनेमा का महत्व ज्यादा बढ़ गया है।
(रवि बुले से बातचीत पर आधारित)