दिल्ली में हुए दंगे ने एक बार फिर पुलिस सुधार की आवश्यकता को रेखांकित किया है। शाहीन बाग धरने के विरुद्ध दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने टिप्पणी की कि दिल्ली पुलिस को पेशेवर तरीके से स्थिति को संभालना चाहिए था। इसका गहरा अर्थ है। दिल्ली में पुलिस कमिश्नर व्यवस्था लागू है, जिसमें पुलिस को मजिस्ट्रेट वाली शक्तियां तथा अधिकार प्राप्त हैं, जिनका प्रयोग करके वह स्वयं कानून व्यवस्था की स्थिति को नियंत्रण में ला सकती है। इसके लिए उसे किसी की इजाजत की आवश्यकता नहीं। फिर दिल्ली पुलिस यह क्यों कह रही है कि वह आदेश का इंतजार कर रही थी? यह पुलिस की उदासीनता और लापरवाही थी कि समय रहते उसने दंगों के विरुद्ध कोई रणनीति तैयार नहीं की और न ही दंगे रोकने का प्रयास किया।
पुलिस व्यवस्था का उद्देश होता है क्षेत्र में शांति व्यवस्था बनाकर कानून का राज सुनिश्चित करना। इसके लिए वह उन तत्वों और स्थानों पर नजर रखती है, जिनके द्वारा शांति भंग या असामाजिक कृत्य होने की आशंका रहती है। आसपास के माहौल को ध्यान में रखते हुए वह धारा 144 का प्रयोग कर शांति और व्यवस्था लागू करती है तथा जरूरत पड़ने पर असामाजिक तत्वों को शांति भंग होने की आशंका में हिरासत में भी लेती है।
शाहीन बाग, जामिया तथा जाफराबाद जैसे क्षेत्रों में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में प्रदर्शन पिछले काफी दिनों से चल रहे थे। लेकिन पुलिस ने इन इलाकों को दंगों से सुरक्षित रखने के लिए पहले से कोई कदम नहीं उठाया। जबकि इन्हीं क्षेत्रों में 1984 में भी दंगे हुए थे। यह शोचनीय विषय है कि दिल्ली सरकार के शासन तंत्र ने जस्टिस ढींगरा जांच कमेटी की, जो 1984 दंगों की जांच के लिए बनाई गई थी, रिपोर्ट पर न तो विचार किया और न ही कोई कार्रवाई की।
इस प्रकार की स्थितियों को ध्यान में रखते हुए ही सर्वोच्च न्यायालय ने 2006 में छह सूत्रीय पुलिस सुधारों का निर्देश देश के सभी राज्यों तथा केंद्र सरकार को दिए थे। इनमें से एक निर्देश हर प्रांत में राज्य सिक्योरिटी कमीशन के गठन का था, जिसके द्वारा राज्य में समय-समय पर स्थिति का आकलन कर कानून व्यवस्था को मजबूत बनाने के उपाय सुझाना था। यदि राज्यों में इस कमीशन का गठन हो गया होता, तो यह दिल्ली जैसी स्थिति का पहले ही आकलन कर इनसे निपटने की योजना बनाकर कार्रवाई करता। पर अभी तक देश में पुलिस सुधारों की दिशा में कोई संतोषजनक प्रयास किया ही नहीं गया है। दिल्ली में पुलिस तथा कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी केंद्र सरकार की है, पर दिल्ली सरकार अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकती। दोनों ही सरकारों ने अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन संतोषजनक तरीके से नहीं किया।
जैसा कि अक्सर होता है, दिल्ली के दंगों पर एक जांच आयोग का गठन होगा, जो अगले तीन साल में रिपोर्ट देगा। पर तब तक जनता इन दंगों को भूल जाएगी। जबकि इन दंगों की सच्चाई खुली आंखों से सबको नजर आ रही है, जिसको देखते हुए दंगा कराने के जिम्मेदार लोगों को कानून के हवाले किया जाना चाहिए। यदि सरकार जांच आयोग गठित करना ही चाहती है, तो इसका कार्यकाल तीन महीने से ज्यादा नहीं होना चाहिए और रिपोर्ट मिलने पर उसे सार्वजनिक कर आपराधिक तत्वों को सबक सिखाना चाहिए, ताकि ऐसे दंगों की पुनरावृत्ति न हो सके। इसके अलावा पुलिस कानून को सैन्य कानून की तरह बनाने की भी जरूरत है, ताकि लापरवाह पुलिसकर्मियों के खिलाफ भी कार्रवाई हो सके।
-लेखक सेवानिवृत्त कर्नल हैं।